उपाकर्म

उपाकर्म (श्रावणी)

— वार्षिक यज्ञोपवीत-परिवर्तन एवं वेद-अध्ययन का संकल्प —

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उपाकर्म क्या है?

उपाकर्म — संस्कृत "उप + कर्म" से बना — अर्थात् "समीप-कर्म" अथवा "सहायक-कर्म"। यह वार्षिक संस्कार है जिसमें द्विज (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) पुराना यज्ञोपवीत त्याग कर नया धारण करते हैं, एवं नये वर्ष का वेद-अध्ययन प्रारम्भ करने का संकल्प लेते हैं।

दूसरा नाम "श्रावणी" है — क्योंकि यह संस्कार सामान्यतः श्रावण मास में होता है। तमिल परम्परा में इसे "आवणि अवित्तम्" कहते हैं। मराठी एवं उत्तर भारत में यह "रक्षाबन्धन" के साथ-साथ मनाया जाता है।

मुख्य उद्देश्य — वर्ष भर वेद-अध्ययन में हुई त्रुटियों के लिए प्रायश्चित्त, ब्रह्म-चर्य का नवीनीकरण, एवं नये वर्ष के अध्ययन का सङ्कल्प। साथ ही ऋषि-तर्पण, गायत्री-जप एवं यज्ञोपवीत-परिवर्तन।

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चार वेद-शाखाएँ — पृथक तिथियाँ

यद्यपि उपाकर्म एक ही संस्कार है, चारों वेदों के अनुयायी इसे भिन्न-भिन्न तिथियों पर करते हैं। तिथि शाखा-विशेष पर निर्भर है।

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यजुर्वेद / स्मार्त

तिथि: श्रावण पूर्णिमा

(श्रावणी)

सर्वाधिक प्रचलित परम्परा। श्रावण मास की पूर्णिमा को (रक्षाबन्धन के दिन) उपाकर्म होता है। गीगायती-जप, यज्ञोपवीत-परिवर्तन, ऋषि-तर्पण के मुख्य कार्य। यजुर्वेदी ब्राह्मण इस दिन का पालन करते हैं।

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ऋग्वेद

तिथि: श्रावण शुक्ल पंचमी

(हयग्रीव जयन्ती (श्रावण मास))

ऋग्वेदी ब्राह्मण श्रावण शुक्ल पंचमी को उपाकर्म करते हैं। यह "हयग्रीव जयन्ती" का दिन भी है — विष्णु के अश्व-मुखी अवतार जिन्होंने वेदों की रक्षा की।

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सामवेद

तिथि: भाद्रपद हस्त नक्षत्र

(सामवेदी उपाकर्म)

सामवेदी ब्राह्मण भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्र अथवा शुक्ल पंचमी को उपाकर्म करते हैं। यह तिथि अन्य परम्पराओं से कुछ सप्ताह बाद आती है।

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अथर्ववेद

तिथि: श्रावण पूर्णिमा / शुक्ल त्रयोदशी

(विकल्प श्रावण मास में)

अथर्ववेदी (आज लघु संख्या) श्रावण पूर्णिमा अथवा त्रयोदशी को उपाकर्म करते हैं — परम्परा के अनुसार।

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८ चरण विधि

1
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प्रात:काल स्नान एवं संकल्प

सूर्योदय से पूर्व नदी अथवा शुद्ध जल से स्नान करें। श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करें। पूर्वाभिमुख होकर संकल्प लें — "श्रावणी उपाकर्म" करने का।

2
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देव-पितृ-ऋषि तर्पण

देवों, पितरों एवं ऋषियों को क्रमशः जल-तर्पण। ऋषि-तर्पण में सात ऋषि — कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ — का स्मरण।

3
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पुराना यज्ञोपवीत त्याग

पुराने यज्ञोपवीत (जनेऊ) को विधि-पूर्वक उतारें। मन्त्र — "एकयोपवीतम्" बोलते हुए नदी में अथवा बहते जल में प्रवाहित करें।

4
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नया यज्ञोपवीत धारण

नये यज्ञोपवीत को नौ-धारी अथवा तीन-धारी बनाकर मन्त्र-पूर्वक धारण करें। मुख्य मन्त्र — "यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥"

5
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गायत्री जप — १००८ बार

गायत्री महामन्त्र का १००८ बार जप करें (न्यूनतम १०८)। रुद्राक्ष अथवा स्फटिक माला से। सूर्य की ओर मुख करके।

6
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वेद-अध्ययन का प्रारम्भ

अपनी शाखा का वेद-पाठ का संकल्प करें — आगामी वर्ष भर अध्ययन का प्रारम्भ। प्रथम पाठ "ब्रह्म-यज्ञ" से।

7
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दान एवं ब्राह्मण-भोज

अन्न, वस्त्र, गौ, स्वर्ण का दान। ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। यज्ञोपवीत-परिवर्तन के साथ नैवेद्य-वितरण।

8
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पुनः सायं सन्ध्या

उसी दिन सायं-सन्ध्या (सूर्यास्त के समय) पूर्ण विधि से करें। यह "उत्सर्जन-कर्म" से सम्बन्धित है — पुराने वर्ष की समाप्ति एवं नये का आरम्भ।

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यज्ञोपवीत — संरचना एवं अर्थ

यज्ञोपवीत = यज्ञ-उपवीत = "यज्ञ के निकट का"। तीन धागों का सूत्र — तीन गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) अथवा तीन ऋण (देव, ऋषि, पितृ)। प्रत्येक धागा तीन तार से बना — कुल नौ तन्तु। ब्रह्मसूत्र के मध्य में "ब्रह्म-गाँठ"।

धारण-स्थिति: बायें कन्धे से दायें हाथ की दिशा में (उपवीति), जो "ब्रह्म-यज्ञ" का सङ्केत। अनुष्ठान-समय: बायें कन्धे पर लटकाये जाने पर "उपवीति"; गले में हार के समान "निवीति"; दाहिने कन्धे पर "प्राचीनावीति" (पितृ-कर्म के समय)।

विशेष: यज्ञोपवीत मलिन हो जाने, तन्तु टूटने पर तत्काल बदलना चाहिए। उपाकर्म के अतिरिक्त — मरण-शोक, ग्रहण-काल, बच्चे का जन्म, अशौच के बाद नया धारण करें।