तर्पण विधि

दैनिक + पितृ-पक्ष (7-22 सितम्बर 2026)

दिशा

दक्षिण

अनिवार्य-वस्तु

काले-तिल + जल

महालया

22 सितम्बर

तर्पण — पितरों (मृत-पूर्वजों) को जल-तिल-अर्पण-संस्कार। दैनिक-कर्म, पितृ-पक्ष, अमावस्या, ग्रहण-काल पर। ब्राह्मण-गृहस्थ का अनिवार्य-कर्तव्य।

तर्पण = "तृप्ति" + "अर्पण"। पितरों को जल से तृप्त करना। 3 पीढ़ी (पिता-पितामह-प्रपितामह) + मातृ-3-पीढ़ी = 6 पितृ-पुरुष + तीनों की पत्नियाँ।

तर्पण की 5-चरण-विधि

1. प्रातः-स्नान: पवित्र-नदी (गंगा, यमुना) श्रेष्ठ। यदि न-सम्भव — घर के जल में थोड़ा गंगाजल।

2. यज्ञोपवीत: बायें-कन्धे से दायें-कमर तक (अप्रासव्य) — पितृ-कर्म-स्थिति।

3. दक्षिण-दिशा-मुख: पितर-दिशा। कुश का आसन।

4. तिल-जल-तर्पण: हाथ की अंजलि में जल + काले-तिल। दक्षिण-दिशा में 3 बार अर्पण। मन्त्र: "ॐ पितृभ्यः नमः"।

5. क्रम: देव-तर्पण → ऋषि-तर्पण → पितृ-तर्पण। पिता → पितामह → प्रपितामह। फिर माता → पितामही → प्रपितामही।

तर्पण कब करें

दैनिक-तर्पण: ब्राह्मण-गृहस्थ के लिए सूर्योदय बाद नित्य।

अमावस्या-तर्पण: हर अमावस्या को विशेष। सर्व-पितृ।

पितृ-पक्ष: 16 दिन (7-22 सितम्बर 2026) — दैनिक-तर्पण।

महालया-अमावस्या: 22 सितम्बर 2026 — सबसे-शक्तिशाली।

ग्रहण-काल: सूर्य/चन्द्र-ग्रहण-समय में तर्पण विशेष-फलदायी।

तीर्थ-तर्पण: गंगा-यमुना-गोदावरी-कावेरी-नर्मदा में स्नान-बाद।

📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ

इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तर्पण में काले-तिल क्यों?

काले-तिल "पितृ-प्रिय"। पुराण-कथा: तिल विष्णु-शरीर के पसीने से उत्पन्न — सबसे-पवित्र। तिल-जल-तर्पण = पितरों की पूर्ण-तृप्ति।

क्या स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं?

पारम्परिक: पुरुष-कर्म। पर पुत्र न हो — पुत्री, पत्नी, बहू भी कर सकती हैं। महाभारत-काल में स्त्रियाँ करती थीं। आधुनिक: सब-स्वीकार्य।

🔗सम्बन्धित विषय

सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।