श्राद्ध (पितृ-पक्ष) — अश्विन-कृष्ण-पक्ष के 16 दिन, जब हम पितरों (मृत-पूर्वजों) का स्मरण करते हैं — तर्पण, पिण्ड-दान, ब्राह्मण-भोज द्वारा। यह वर्ष का सबसे पवित्र पितृ-काल। मनुस्मृति, गरुड़-पुराण, हरिवंश-पुराण में विस्तृत-वर्णन।
2026 पितृ-पक्ष: 7 सितम्बर (पूर्णिमा-श्राद्ध) से 22 सितम्बर (सर्व-पितृ-अमावस्या) तक। प्रत्येक तिथि पर उन पितरों का श्राद्ध जिनका मृत्यु उसी तिथि पर हुआ। अमावस्या को सर्व-पितृ-श्राद्ध — सबके लिए। यदि तिथि न मालूम हो तो अमावस्या पर श्राद्ध।
✦ पितृ-पक्ष क्या है?
भाद्रपद-पूर्णिमा से अश्विन-अमावस्या तक 16 दिन = "पितृ-पक्ष" / "महालय-पक्ष"। पुराण-कथा: यमराज प्रति-वर्ष पितरों को 16 दिन के लिए मुक्त करते हैं — पृथ्वी पर अपने वंशजों के पास जाने को। वंशज तर्पण-श्राद्ध से उन्हें तृप्त करते हैं।
महाभारत-कथा: कर्ण मरने के बाद स्वर्ग गये पर सोना खाने को मिला (केवल सोने का दान किया था)। यमराज से पूछा — "मैंने तो जीवन-भर सोना दान किया। पर पितरों के लिए कभी अन्न-दान नहीं किया।" फिर 16 दिन पृथ्वी पर भेजे गये — पितरों के लिए अन्न-दान करने को। तब से पितृ-पक्ष परम्परा।
खगोल: सूर्य कन्या-राशि में होता है इस-काल — पितृ-तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ-समय। दक्षिणायन का प्रारम्भ। पितर "पितृ-लोक" से पृथ्वी की ओर — "पितृ-श्राद्ध-काल"।
✦ 2026 श्राद्ध-तिथियाँ — पूर्ण सूची
पूर्णिमा-श्राद्ध: 7 सितम्बर 2026 (सोमवार) — भाद्रपद-पूर्णिमा। प्रतिपदा: 8 सितम्बर। द्वितीया: 9 सितम्बर। तृतीया: 10 सितम्बर। चतुर्थी (भरणी-श्राद्ध, नाना-नानी): 11 सितम्बर। पंचमी (कुंवारा-पंचमी, अविवाहित मृतक): 12 सितम्बर।
षष्ठी: 13 सितम्बर। सप्तमी: 14 सितम्बर। अष्टमी: 15 सितम्बर। नवमी (अविधवा-नवमी, सधवा माताएँ): 16 सितम्बर। दशमी: 17 सितम्बर। एकादशी (वैष्णव-श्राद्ध): 18 सितम्बर। द्वादशी (संन्यासी-श्राद्ध): 19 सितम्बर।
त्रयोदशी (बाल-श्राद्ध): 20 सितम्बर। चतुर्दशी (अकाल-मृत्यु, दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या): 21 सितम्बर। अमावस्या (सर्व-पितृ-अमावस्या / महालया): 22 सितम्बर — सबसे महत्त्वपूर्ण।
15 सितम्बर 2026 को मघा-श्राद्ध (मातृ-नवमी) — सर्व-मातृ-श्राद्ध। 16 सितम्बर अविधवा-नवमी।
✦ श्राद्ध-तिथि कैसे चुनें?
मृत्यु-तिथि के अनुसार: यदि पिता का मृत्यु तृतीया को हुआ — तो तृतीया-श्राद्ध (10 सितम्बर)। यदि माता का दशमी को — दशमी (17 सितम्बर)। तिथि याद नहीं? — सर्व-पितृ-अमावस्या (22 सितम्बर) पर सब के लिए।
विशेष-तिथि वाले: 1) मातृ-नवमी (15 सितम्बर) — माता, सासू-माँ, दादी, नानी (अविधवा सधवा)। 2) चतुर्दशी (21 सितम्बर) — अकाल-मृत्यु (युवा-मृत्यु, दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या)। 3) चतुर्थी (11 सितम्बर) — नाना, नानी, संस्कृत-शिष्य।
पुरुष-स्त्री भिन्न-तिथि: पिता-दादा शुक्ल-तिथि से, माता-दादी कृष्ण-तिथि से। अधिकांश पंडित — मृत्यु-तिथि (कृष्ण/शुक्ल भेद के बिना) मानते। स्थानीय पंडित से परामर्श।
✦ श्राद्ध-विधि (पूर्ण)
पूर्व-तैयारी: एक-दिन पूर्व ब्राह्मण-निमन्त्रण। घर-शुद्धि। मृतक-वस्त्र (केसरी या श्वेत), यज्ञोपवीत, जल, तिल, कुश, चांदी का सिक्का, गाय-घी, खीर-पूड़ी (जो पितर को प्रिय थे), केला-पत्ता।
विधि: 1) प्रातः-स्नान, सफेद-वस्त्र, यज्ञोपवीत बायें-कन्धे से दायें-कमर तक (अप्रासव्य)। 2) कुश का आसन। 3) तिलोदक-तर्पण — तिल मिले जल पितरों को अंजलि से 3 बार दें। "ॐ पितृभ्यः नमः"। 4) पिण्ड-दान — चावल-तिल-घी-शहद का 6 पिण्ड (पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही)।
5) ब्राह्मण-भोज — कम-से-कम 1 ब्राह्मण को सात्विक-भोजन (खीर-पूड़ी-कद्दू-चना-दाल), दक्षिणा, वस्त्र। 6) कौवा-गाय-कुत्ता को भोजन (पंच-बलि)। 7) गायत्री-मन्त्र पाठ। 8) पितृ-गायत्री: "ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥"
पिण्ड-विसर्जन: श्राद्ध समाप्त होने पर पिण्ड को गाय को खिला दें, या तीर्थ में विसर्जित करें (गंगा, यमुना, गया-तट)।
✦ श्राद्ध-काल में नियम
क्या न करें: 1) कोई शुभ-कार्य (विवाह, गृह-प्रवेश, नया कार्य, कपड़े-गहने खरीदना)। 2) मांस-मदिरा। 3) नाई-कटाई (बाल-दाढ़ी)। 4) नये कपड़े पहनना। 5) घर में लड़ाई-झगड़ा। 6) किसी का अपमान। 7) रात्रि में श्राद्ध-कार्य।
क्या करें: 1) सात्विक-शाकाहार। 2) ब्रह्मचर्य। 3) घर-स्वच्छता। 4) पितरों का स्मरण। 5) "गरुड़-पुराण" पाठ। 6) भगवद्-गीता पाठ (पितरों को मुक्ति)। 7) दीपक जलाएँ — पितरों को मार्ग। 8) गाय-कौवे-कुत्ते-चींटी-मछली को भोजन (पंच-बलि)।
दान-सूची: तिल, चावल, गुड़, गाय-घी, चांदी, सफेद-वस्त्र, छाता, जूते, गाय (सर्वोत्तम — गोदान), भूमि (अति-सर्वोत्तम)। ब्राह्मण को पैसा अधिक से अधिक — श्रद्धानुसार।
✦ गया, बद्रीनाथ — पितृ-तीर्थ
गया (बिहार): विश्व-प्रसिद्ध पितृ-तीर्थ। फल्गु-नदी-तट पर पिण्ड-दान। मान्यता — गया में एक श्राद्ध = कोटि श्राद्ध-फल। श्री राम ने पिता दशरथ का गया में श्राद्ध किया (वाल्मीकि-रामायण)। पितर "गयांगयामिति" से तृप्त।
गया-श्राद्ध-विधि: 17 स्थानों पर पिण्ड-दान — फल्गु-तट, अक्षयवट, विष्णुपद, ब्रह्म-कुण्ड, नागकूप, सूर्य-कुण्ड आदि। 3-दिन का अनुष्ठान। पंडा-समुदाय का योगदान। शुल्क ₹5,000-50,000 (श्रद्धानुसार)।
अन्य पितृ-तीर्थ: बद्रीनाथ-ब्रह्म-कपाल (केवल बद्रीनाथ खुलने-काल में), कुरुक्षेत्र, पुष्कर, वाराणसी (मणिकर्णिका-घाट), नासिक (त्र्यम्बकेश्वर-गोदावरी), उज्जैन (राम-घाट)। पितृ-पक्ष में जाना सर्वोत्तम।
📊2026 पितृ-पक्ष — 16 दिन की पूर्ण-तालिका
| क्रम | तिथि | दिनांक | किनके लिए श्राद्ध? |
|---|---|---|---|
| 1 | पूर्णिमा | 7 सितम्बर (सोम) | पूर्णिमा को मृत पितर |
| 2 | प्रतिपदा | 8 सितम्बर (मंगल) | प्रतिपदा को मृत |
| 3 | द्वितीया | 9 सितम्बर (बुध) | द्वितीया को मृत |
| 4 | तृतीया | 10 सितम्बर (गुरु) | तृतीया को मृत |
| 5 | चतुर्थी | 11 सितम्बर (शुक्र) | भरणी-श्राद्ध — नाना-नानी |
| 6 | पंचमी | 12 सितम्बर (शनि) | अविवाहित मृत (कुंवारा-पंचमी) |
| 7 | षष्ठी | 13 सितम्बर (रवि) | षष्ठी को मृत |
| 8 | सप्तमी | 14 सितम्बर (सोम) | सप्तमी को मृत |
| 9 | अष्टमी | 15 सितम्बर (मंगल) | मघा-श्राद्ध, सर्व-मातृ |
| 10 | नवमी | 16 सितम्बर (बुध) | अविधवा-नवमी — सधवा माताएँ |
| 11 | दशमी | 17 सितम्बर (गुरु) | दशमी को मृत |
| 12 | एकादशी | 18 सितम्बर (शुक्र) | वैष्णव-श्राद्ध |
| 13 | द्वादशी | 19 सितम्बर (शनि) | संन्यासी-श्राद्ध |
| 14 | त्रयोदशी | 20 सितम्बर (रवि) | बाल-श्राद्ध — मृत बच्चे |
| 15 | चतुर्दशी | 21 सितम्बर (सोम) | अकाल-मृत्यु — दुर्घटना/हत्या/आत्महत्या |
| 16 | अमावस्या | 22 सितम्बर (मंगल) | सर्व-पितृ-अमावस्या (महालया) — सबके लिए |
महालया (22 सितम्बर) — सबसे महत्त्वपूर्ण-दिन। तिथि याद न हो तो इसी दिन श्राद्ध।
📊श्राद्ध-दान — क्या दान करें (श्रेष्ठता-क्रम)
| वस्तु | महत्त्व | फल | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| गाय (गोदान) | सर्वोत्तम (★★★★★) | पितरों को वैतरणी-नदी पार-कराने वाली | सच्ची-गाय या प्रतीकात्मक-गोदान |
| भूमि-दान | अति-सर्वोत्तम (★★★★★) | पितरों को स्थायी-स्थान | समर्थ-व्यक्ति ही |
| तिल | अत्यधिक (★★★★) | पाप-निवारण | काले-तिल विशेष — पितरों को सीधे-पहुँचते |
| चांदी | उच्च (★★★★) | चन्द्र-स्थान सम्बन्ध — पितरों के निकट | चांदी-सिक्का या आभूषण |
| गाय का घी | उच्च (★★★) | अग्नि-शुद्धि — पितरों को आहुति | देसी-घी श्रेष्ठ |
| सफेद-वस्त्र | मध्यम (★★★) | पितरों के लिए वस्त्र | धोती, चादर, अंगवस्त्र |
| छाता-जूते | मध्यम (★★) | पितर-यात्रा हेतु | काला-छाता, चमड़े के जूते |
| अन्न | मध्यम (★★) | पितर-तृप्ति | चावल, गेहूँ, दाल |
| धन-दक्षिणा | श्रेष्ठ (★★★★) | ब्राह्मण को सम्मान | श्रद्धानुसार — कम-से-कम ₹501 |
📋श्राद्ध-कर्म सम्पूर्ण विधि — 12-चरण
- 1
तिथि-निर्धारण
मृत्यु-तिथि के अनुसार उसी तिथि का श्राद्ध। याद न हो — सर्व-पितृ-अमावस्या (22 सितम्बर 2026)। माता का — मातृ-नवमी (15 सितम्बर)।
- 2
एक-दिन पूर्व ब्राह्मण-निमन्त्रण
कम-से-कम 1, अच्छा हो 3-5 ब्राह्मण। पितर-संख्या के अनुसार। यदि सम्भव न हो — किसी गरीब-व्यक्ति को भोजन।
- 3
प्रातः-स्नान + उत्तरीय
मुख्य-कर्ता (ज्येष्ठ-पुत्र) पीला/श्वेत-वस्त्र, यज्ञोपवीत बायें-कन्धे से दायें-कमर तक (अप्रासव्य रूप — पितृ-कर्म-स्थिति)।
- 4
कुश-आसन
पूजा-स्थल पर दक्षिण-दिशा (पितृ-दिशा) मुख। कुश का आसन। कुश-घास हाथ में पवित्री (अंगूठी)।
- 5
तिलोदक-तर्पण
जल में काले-तिल मिलायें। दोनों हाथ की अंजलि से 3 बार जल अर्पण। मन्त्र: "ॐ पितृभ्यः नमः"। पिता-पितामह-प्रपितामह तीनों के लिए अलग-अलग।
- 6
पिण्ड-निर्माण
चावल + तिल + घी + दूध + शहद मिलाकर 6 पिण्ड (छोटी-गेंद)। 3 पैतृक — पिता, पितामह, प्रपितामह। 3 मातृक — माता, पितामही, प्रपितामही।
- 7
पिण्ड-दान
पिण्डों को दर्भ-घास पर रखें। पुष्प, तिल, जल अर्पण। मन्त्र-पाठ। पितर-स्मरण।
- 8
ब्राह्मण-भोज
ब्राह्मणों को सात्विक-भोजन — खीर-पूड़ी-कद्दू-चना-दाल। पितरों के पसन्दीदा-व्यंजन। भोजन से पूर्व अग्नि को आहुति।
- 9
पंच-बलि
5 जीवों को भोजन: 1) कौवा (पितर का प्रतीक) 2) गाय 3) कुत्ता (यम का प्रतीक) 4) चींटी 5) मछली/जल। भोजन से पूर्व रखें।
- 10
गायत्री-पितृ-गायत्री-पाठ
"ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥" 11 या 21 बार।
- 11
दान-सम्पन्नता
ब्राह्मणों को दक्षिणा (न्यूनतम ₹501), वस्त्र, अन्न, छाता-जूते आदि। समर्थ-व्यक्ति गाय या भूमि।
- 12
पिण्ड-विसर्जन
पिण्ड को गाय को खिला दें (श्रेष्ठ) या तीर्थ में विसर्जित (गंगा/यमुना/गया-तट)। श्राद्ध-कार्य पूर्ण।
⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें
✗ श्राद्ध-काल में नये-कपड़े/मांगलिक-कार्य
क्यों: श्राद्ध-काल पितृ-स्मरण-काल। नये कपड़े, गहने, विवाह, गृह-प्रवेश सब वर्जित। उत्सव-स्थिति पितृ-कर्म के विपरीत।
✓ सही उपाय: 16 दिन तक नये कपड़े न पहनें। पुराने/धुले कपड़े। मांगलिक-कार्य 22 सितम्बर के बाद ही। केवल पूजा-तर्पण-दान करें।
✗ मांस-मदिरा-प्याज-लहसुन का सेवन
क्यों: श्राद्ध-काल पूर्ण-सात्विक। तामसिक-राजसिक भोजन से पितर-असन्तुष्ट। शास्त्र-वर्जना। मन-शुद्धि नहीं।
✓ सही उपाय: 16 दिन शुद्ध-शाकाहार। प्याज-लहसुन भी त्यागें। दूध, फल, सात्विक-भोजन। ब्रह्मचर्य-पालन।
✗ श्राद्ध-कर्म रात्रि में
क्यों: श्राद्ध केवल दिन में — सूर्योदय से दोपहर तक श्रेष्ठ। पारम्परिक रूप से "अपराह्न-काल" (दोपहर 12-3) सर्वोत्तम। रात्रि में पितृ-कर्म वर्जित।
✓ सही उपाय: श्राद्ध दोपहर 12-3 बजे पूरा करें। प्रातः 8-12 बजे तर्पण। रात्रि-श्राद्ध से बचें।
✗ ब्राह्मण-भोज छोड़कर केवल "online दान"
क्यों: श्राद्ध की मूल-आत्मा "ब्राह्मण-भोज"। पितर ब्राह्मण के माध्यम से तृप्त होते हैं। केवल पैसा भेजना — पूर्ण-फल नहीं।
✓ सही उपाय: कम-से-कम 1 ब्राह्मण/पुजारी को घर बुलाकर भोजन। यदि सम्भव न हो — मन्दिर में भोजन-सेवा (अन्न-दान)।
✗ श्राद्ध को "केवल पुत्र का काम" मानना
क्यों: पारम्परिक रूप से ज्येष्ठ-पुत्र। पर पुत्र न हो तो — पुत्री, बेटी का पति, भाई, भतीजा, यहाँ तक कि शिष्य भी कर सकते हैं। महाभारत-काल में स्त्रियाँ भी करती थीं।
✓ सही उपाय: पुत्र न हो तो पुत्री/भाई कर सकते हैं। यदि कोई न हो — किसी ब्राह्मण को नियुक्त करके। श्राद्ध छोड़ना नहीं चाहिए।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अगर तिथि याद नहीं तो श्राद्ध कब करें?▼
सर्व-पितृ-अमावस्या (2026 — 22 सितम्बर) पर श्राद्ध करें — सब पितरों के लिए। यह "महालया" है — सबसे महत्त्वपूर्ण-दिन। यदि अमावस्या भी छूटे — आगामी अमावस्या या नवमी पर।
क्या स्त्रियाँ श्राद्ध-कर्म कर सकती हैं?▼
पारम्परिक मत — पुरुष (पुत्र, पौत्र) ही पिण्ड-दान करें। पर पुत्र न हो तो — पुत्री, बेटी का पति, भाई, भतीजा भी कर सकते हैं। महाभारत-काल में स्त्रियाँ भी करती थीं। आधुनिक मत — किसी भी रक्त-सम्बन्धी से। पर तर्पण और पंच-बलि स्त्रियाँ अवश्य कर सकती हैं।
पितृ-दोष क्या है? कैसे शान्त करें?▼
जब पितरों का श्राद्ध न हो — पितृ-दोष। कुण्डली में सूर्य-शनि-राहु-केतु में पितृ-दोष। लक्षण: सन्तान-कष्ट, धन-हानि, पारिवारिक-कलह, असफलता। उपाय: पितृ-पक्ष में नियमित-श्राद्ध, गया-श्राद्ध, गाय-दान, पीपल-वृक्ष को जल, "पितृ-स्तोत्र" पाठ, ब्राह्मण-भोज।
गरुड़-पुराण का पाठ कब करें?▼
मृत्यु के बाद 13 दिन तक — मुख्य-पाठ। पितृ-पक्ष में दैनिक 1-2 अध्याय। माता-पिता की पुण्य-तिथि (मृत्यु-तिथि) पर। एकादशी पर। यह मरण के बाद के यम-लोक, पितर-गति, पुनर्जन्म का पूर्ण-वर्णन। पितरों की सद्गति के लिए श्रेष्ठ।
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सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।