पितृ पक्ष / श्राद्ध 2026

श्री पितृ पक्ष श्राद्ध

१६ दिन पूर्वजों के प्रति समर्पित श्रद्धा एवं तर्पण

🕯️१६ दिन

पितृ पक्ष — श्राद्ध काल

२८ सितम्बर — १३ अक्टूबर २०२६

🌑 १६ दिन🪔 तर्पण काल
🕯️

क्या है पितृ पक्ष?

भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक के १६ दिन "पितृ पक्ष" कहलाते हैं। इस काल में तर्पण, पिण्ड दान एवं ब्राह्मण भोज से पितरों की आत्मा को शान्ति मिलती है। प्रत्येक पितर के मृत्यु तिथि पर विशेष श्राद्ध किया जाता है।

🕯️ ✦ पंचदश श्राद्ध तिथियाँ ✦ 🕯️

26सितम

पूर्णिमा श्राद्ध

पितृ पक्ष प्रारम्भ

🕯️ मुख्य
27सितम

प्रतिपदा

प्रतिपदा तिथि के पितर

28सितम

द्वितीया

29सितम

तृतीया

30सितम

चतुर्थी

1अक्ट

पंचमी (भरणी श्राद्ध)

अकाल मृत्यु के पितर

2अक्ट

षष्ठी

3अक्ट

सप्तमी

4अक्ट

अष्टमी / नवमी (मातृ नवमी)

अष्टमी क्षय — मातृ नवमी पर मातृ श्राद्ध

5अक्ट

दशमी

6अक्ट

एकादशी

संन्यासी का श्राद्ध

7अक्ट

द्वादशी

संन्यासी श्राद्ध

8अक्ट

त्रयोदशी (माघी)

9अक्ट

चतुर्दशी

दुर्घटना/शस्त्र मृत्यु का श्राद्ध

10अक्ट

सर्वपितृ अमावस्या

सर्वाधिक महत्वपूर्ण — सभी पितरों हेतु

🕯️ मुख्य
📜

श्राद्ध विधि

📅पितृ की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करें।
🌑तिथि न ज्ञात हो तो सर्वपितृ अमावस्या पर करें।
💧कुश, तिल एवं जल से तर्पण करें।
🍽ब्राह्मण भोज एवं दक्षिणा अर्पण करें।
🐦कागा, कुत्ते एवं गाय को भोजन दें।
🪔पिण्ड दान करें (गया में सर्वोत्तम)।
🧭दक्षिण दिशा में मुख कर तर्पण करें।
🌾काले तिल, जौ एवं कुश आवश्यक हैं।

पितृ पक्ष में क्या न करें

  • नये कार्य आरम्भ एवं शुभ कार्य
  • गृह प्रवेश, वाहन या भूमि क्रय
  • विवाह, सगाई एवं मुंडन
  • पर्व, उत्सव एवं मनोरंजन
  • नये वस्त्र, आभूषण क्रय
  • मांस, मदिरा एवं तामसिक भोजन

पितृ देवो भव · पूर्वजों को प्रणाम · उन्हीं से सब कल्याण

श्राद्ध (पितृ-पक्ष) — अश्विन-कृष्ण-पक्ष के 16 दिन, जब हम पितरों (मृत-पूर्वजों) का स्मरण करते हैं — तर्पण, पिण्ड-दान, ब्राह्मण-भोज द्वारा। यह वर्ष का सबसे पवित्र पितृ-काल। मनुस्मृति, गरुड़-पुराण, हरिवंश-पुराण में विस्तृत-वर्णन।

2026 पितृ-पक्ष: 7 सितम्बर (पूर्णिमा-श्राद्ध) से 22 सितम्बर (सर्व-पितृ-अमावस्या) तक। प्रत्येक तिथि पर उन पितरों का श्राद्ध जिनका मृत्यु उसी तिथि पर हुआ। अमावस्या को सर्व-पितृ-श्राद्ध — सबके लिए। यदि तिथि न मालूम हो तो अमावस्या पर श्राद्ध।

पितृ-पक्ष क्या है?

भाद्रपद-पूर्णिमा से अश्विन-अमावस्या तक 16 दिन = "पितृ-पक्ष" / "महालय-पक्ष"। पुराण-कथा: यमराज प्रति-वर्ष पितरों को 16 दिन के लिए मुक्त करते हैं — पृथ्वी पर अपने वंशजों के पास जाने को। वंशज तर्पण-श्राद्ध से उन्हें तृप्त करते हैं।

महाभारत-कथा: कर्ण मरने के बाद स्वर्ग गये पर सोना खाने को मिला (केवल सोने का दान किया था)। यमराज से पूछा — "मैंने तो जीवन-भर सोना दान किया। पर पितरों के लिए कभी अन्न-दान नहीं किया।" फिर 16 दिन पृथ्वी पर भेजे गये — पितरों के लिए अन्न-दान करने को। तब से पितृ-पक्ष परम्परा।

खगोल: सूर्य कन्या-राशि में होता है इस-काल — पितृ-तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ-समय। दक्षिणायन का प्रारम्भ। पितर "पितृ-लोक" से पृथ्वी की ओर — "पितृ-श्राद्ध-काल"।

2026 श्राद्ध-तिथियाँ — पूर्ण सूची

पूर्णिमा-श्राद्ध: 7 सितम्बर 2026 (सोमवार) — भाद्रपद-पूर्णिमा। प्रतिपदा: 8 सितम्बर। द्वितीया: 9 सितम्बर। तृतीया: 10 सितम्बर। चतुर्थी (भरणी-श्राद्ध, नाना-नानी): 11 सितम्बर। पंचमी (कुंवारा-पंचमी, अविवाहित मृतक): 12 सितम्बर।

षष्ठी: 13 सितम्बर। सप्तमी: 14 सितम्बर। अष्टमी: 15 सितम्बर। नवमी (अविधवा-नवमी, सधवा माताएँ): 16 सितम्बर। दशमी: 17 सितम्बर। एकादशी (वैष्णव-श्राद्ध): 18 सितम्बर। द्वादशी (संन्यासी-श्राद्ध): 19 सितम्बर।

त्रयोदशी (बाल-श्राद्ध): 20 सितम्बर। चतुर्दशी (अकाल-मृत्यु, दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या): 21 सितम्बर। अमावस्या (सर्व-पितृ-अमावस्या / महालया): 22 सितम्बर — सबसे महत्त्वपूर्ण।

15 सितम्बर 2026 को मघा-श्राद्ध (मातृ-नवमी) — सर्व-मातृ-श्राद्ध। 16 सितम्बर अविधवा-नवमी।

श्राद्ध-तिथि कैसे चुनें?

मृत्यु-तिथि के अनुसार: यदि पिता का मृत्यु तृतीया को हुआ — तो तृतीया-श्राद्ध (10 सितम्बर)। यदि माता का दशमी को — दशमी (17 सितम्बर)। तिथि याद नहीं? — सर्व-पितृ-अमावस्या (22 सितम्बर) पर सब के लिए।

विशेष-तिथि वाले: 1) मातृ-नवमी (15 सितम्बर) — माता, सासू-माँ, दादी, नानी (अविधवा सधवा)। 2) चतुर्दशी (21 सितम्बर) — अकाल-मृत्यु (युवा-मृत्यु, दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या)। 3) चतुर्थी (11 सितम्बर) — नाना, नानी, संस्कृत-शिष्य।

पुरुष-स्त्री भिन्न-तिथि: पिता-दादा शुक्ल-तिथि से, माता-दादी कृष्ण-तिथि से। अधिकांश पंडित — मृत्यु-तिथि (कृष्ण/शुक्ल भेद के बिना) मानते। स्थानीय पंडित से परामर्श।

श्राद्ध-विधि (पूर्ण)

पूर्व-तैयारी: एक-दिन पूर्व ब्राह्मण-निमन्त्रण। घर-शुद्धि। मृतक-वस्त्र (केसरी या श्वेत), यज्ञोपवीत, जल, तिल, कुश, चांदी का सिक्का, गाय-घी, खीर-पूड़ी (जो पितर को प्रिय थे), केला-पत्ता।

विधि: 1) प्रातः-स्नान, सफेद-वस्त्र, यज्ञोपवीत बायें-कन्धे से दायें-कमर तक (अप्रासव्य)। 2) कुश का आसन। 3) तिलोदक-तर्पण — तिल मिले जल पितरों को अंजलि से 3 बार दें। "ॐ पितृभ्यः नमः"। 4) पिण्ड-दान — चावल-तिल-घी-शहद का 6 पिण्ड (पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही)।

5) ब्राह्मण-भोज — कम-से-कम 1 ब्राह्मण को सात्विक-भोजन (खीर-पूड़ी-कद्दू-चना-दाल), दक्षिणा, वस्त्र। 6) कौवा-गाय-कुत्ता को भोजन (पंच-बलि)। 7) गायत्री-मन्त्र पाठ। 8) पितृ-गायत्री: "ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥"

पिण्ड-विसर्जन: श्राद्ध समाप्त होने पर पिण्ड को गाय को खिला दें, या तीर्थ में विसर्जित करें (गंगा, यमुना, गया-तट)।

श्राद्ध-काल में नियम

क्या न करें: 1) कोई शुभ-कार्य (विवाह, गृह-प्रवेश, नया कार्य, कपड़े-गहने खरीदना)। 2) मांस-मदिरा। 3) नाई-कटाई (बाल-दाढ़ी)। 4) नये कपड़े पहनना। 5) घर में लड़ाई-झगड़ा। 6) किसी का अपमान। 7) रात्रि में श्राद्ध-कार्य।

क्या करें: 1) सात्विक-शाकाहार। 2) ब्रह्मचर्य। 3) घर-स्वच्छता। 4) पितरों का स्मरण। 5) "गरुड़-पुराण" पाठ। 6) भगवद्-गीता पाठ (पितरों को मुक्ति)। 7) दीपक जलाएँ — पितरों को मार्ग। 8) गाय-कौवे-कुत्ते-चींटी-मछली को भोजन (पंच-बलि)।

दान-सूची: तिल, चावल, गुड़, गाय-घी, चांदी, सफेद-वस्त्र, छाता, जूते, गाय (सर्वोत्तम — गोदान), भूमि (अति-सर्वोत्तम)। ब्राह्मण को पैसा अधिक से अधिक — श्रद्धानुसार।

गया, बद्रीनाथ — पितृ-तीर्थ

गया (बिहार): विश्व-प्रसिद्ध पितृ-तीर्थ। फल्गु-नदी-तट पर पिण्ड-दान। मान्यता — गया में एक श्राद्ध = कोटि श्राद्ध-फल। श्री राम ने पिता दशरथ का गया में श्राद्ध किया (वाल्मीकि-रामायण)। पितर "गयांगयामिति" से तृप्त।

गया-श्राद्ध-विधि: 17 स्थानों पर पिण्ड-दान — फल्गु-तट, अक्षयवट, विष्णुपद, ब्रह्म-कुण्ड, नागकूप, सूर्य-कुण्ड आदि। 3-दिन का अनुष्ठान। पंडा-समुदाय का योगदान। शुल्क ₹5,000-50,000 (श्रद्धानुसार)।

अन्य पितृ-तीर्थ: बद्रीनाथ-ब्रह्म-कपाल (केवल बद्रीनाथ खुलने-काल में), कुरुक्षेत्र, पुष्कर, वाराणसी (मणिकर्णिका-घाट), नासिक (त्र्यम्बकेश्वर-गोदावरी), उज्जैन (राम-घाट)। पितृ-पक्ष में जाना सर्वोत्तम।

📊2026 पितृ-पक्ष — 16 दिन की पूर्ण-तालिका

क्रमतिथिदिनांककिनके लिए श्राद्ध?
1पूर्णिमा7 सितम्बर (सोम)पूर्णिमा को मृत पितर
2प्रतिपदा8 सितम्बर (मंगल)प्रतिपदा को मृत
3द्वितीया9 सितम्बर (बुध)द्वितीया को मृत
4तृतीया10 सितम्बर (गुरु)तृतीया को मृत
5चतुर्थी11 सितम्बर (शुक्र)भरणी-श्राद्ध — नाना-नानी
6पंचमी12 सितम्बर (शनि)अविवाहित मृत (कुंवारा-पंचमी)
7षष्ठी13 सितम्बर (रवि)षष्ठी को मृत
8सप्तमी14 सितम्बर (सोम)सप्तमी को मृत
9अष्टमी15 सितम्बर (मंगल)मघा-श्राद्ध, सर्व-मातृ
10नवमी16 सितम्बर (बुध)अविधवा-नवमी — सधवा माताएँ
11दशमी17 सितम्बर (गुरु)दशमी को मृत
12एकादशी18 सितम्बर (शुक्र)वैष्णव-श्राद्ध
13द्वादशी19 सितम्बर (शनि)संन्यासी-श्राद्ध
14त्रयोदशी20 सितम्बर (रवि)बाल-श्राद्ध — मृत बच्चे
15चतुर्दशी21 सितम्बर (सोम)अकाल-मृत्यु — दुर्घटना/हत्या/आत्महत्या
16अमावस्या22 सितम्बर (मंगल)सर्व-पितृ-अमावस्या (महालया) — सबके लिए

महालया (22 सितम्बर) — सबसे महत्त्वपूर्ण-दिन। तिथि याद न हो तो इसी दिन श्राद्ध।

📊श्राद्ध-दान — क्या दान करें (श्रेष्ठता-क्रम)

वस्तुमहत्त्वफलटिप्पणी
गाय (गोदान)सर्वोत्तम (★★★★★)पितरों को वैतरणी-नदी पार-कराने वालीसच्ची-गाय या प्रतीकात्मक-गोदान
भूमि-दानअति-सर्वोत्तम (★★★★★)पितरों को स्थायी-स्थानसमर्थ-व्यक्ति ही
तिलअत्यधिक (★★★★)पाप-निवारणकाले-तिल विशेष — पितरों को सीधे-पहुँचते
चांदीउच्च (★★★★)चन्द्र-स्थान सम्बन्ध — पितरों के निकटचांदी-सिक्का या आभूषण
गाय का घीउच्च (★★★)अग्नि-शुद्धि — पितरों को आहुतिदेसी-घी श्रेष्ठ
सफेद-वस्त्रमध्यम (★★★)पितरों के लिए वस्त्रधोती, चादर, अंगवस्त्र
छाता-जूतेमध्यम (★★)पितर-यात्रा हेतुकाला-छाता, चमड़े के जूते
अन्नमध्यम (★★)पितर-तृप्तिचावल, गेहूँ, दाल
धन-दक्षिणाश्रेष्ठ (★★★★)ब्राह्मण को सम्मानश्रद्धानुसार — कम-से-कम ₹501

📋श्राद्ध-कर्म सम्पूर्ण विधि — 12-चरण

  1. 1

    तिथि-निर्धारण

    मृत्यु-तिथि के अनुसार उसी तिथि का श्राद्ध। याद न हो — सर्व-पितृ-अमावस्या (22 सितम्बर 2026)। माता का — मातृ-नवमी (15 सितम्बर)।

  2. 2

    एक-दिन पूर्व ब्राह्मण-निमन्त्रण

    कम-से-कम 1, अच्छा हो 3-5 ब्राह्मण। पितर-संख्या के अनुसार। यदि सम्भव न हो — किसी गरीब-व्यक्ति को भोजन।

  3. 3

    प्रातः-स्नान + उत्तरीय

    मुख्य-कर्ता (ज्येष्ठ-पुत्र) पीला/श्वेत-वस्त्र, यज्ञोपवीत बायें-कन्धे से दायें-कमर तक (अप्रासव्य रूप — पितृ-कर्म-स्थिति)।

  4. 4

    कुश-आसन

    पूजा-स्थल पर दक्षिण-दिशा (पितृ-दिशा) मुख। कुश का आसन। कुश-घास हाथ में पवित्री (अंगूठी)।

  5. 5

    तिलोदक-तर्पण

    जल में काले-तिल मिलायें। दोनों हाथ की अंजलि से 3 बार जल अर्पण। मन्त्र: "ॐ पितृभ्यः नमः"। पिता-पितामह-प्रपितामह तीनों के लिए अलग-अलग।

  6. 6

    पिण्ड-निर्माण

    चावल + तिल + घी + दूध + शहद मिलाकर 6 पिण्ड (छोटी-गेंद)। 3 पैतृक — पिता, पितामह, प्रपितामह। 3 मातृक — माता, पितामही, प्रपितामही।

  7. 7

    पिण्ड-दान

    पिण्डों को दर्भ-घास पर रखें। पुष्प, तिल, जल अर्पण। मन्त्र-पाठ। पितर-स्मरण।

  8. 8

    ब्राह्मण-भोज

    ब्राह्मणों को सात्विक-भोजन — खीर-पूड़ी-कद्दू-चना-दाल। पितरों के पसन्दीदा-व्यंजन। भोजन से पूर्व अग्नि को आहुति।

  9. 9

    पंच-बलि

    5 जीवों को भोजन: 1) कौवा (पितर का प्रतीक) 2) गाय 3) कुत्ता (यम का प्रतीक) 4) चींटी 5) मछली/जल। भोजन से पूर्व रखें।

  10. 10

    गायत्री-पितृ-गायत्री-पाठ

    "ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥" 11 या 21 बार।

  11. 11

    दान-सम्पन्नता

    ब्राह्मणों को दक्षिणा (न्यूनतम ₹501), वस्त्र, अन्न, छाता-जूते आदि। समर्थ-व्यक्ति गाय या भूमि।

  12. 12

    पिण्ड-विसर्जन

    पिण्ड को गाय को खिला दें (श्रेष्ठ) या तीर्थ में विसर्जित (गंगा/यमुना/गया-तट)। श्राद्ध-कार्य पूर्ण।

⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें

  • श्राद्ध-काल में नये-कपड़े/मांगलिक-कार्य

    क्यों: श्राद्ध-काल पितृ-स्मरण-काल। नये कपड़े, गहने, विवाह, गृह-प्रवेश सब वर्जित। उत्सव-स्थिति पितृ-कर्म के विपरीत।

    सही उपाय: 16 दिन तक नये कपड़े न पहनें। पुराने/धुले कपड़े। मांगलिक-कार्य 22 सितम्बर के बाद ही। केवल पूजा-तर्पण-दान करें।

  • मांस-मदिरा-प्याज-लहसुन का सेवन

    क्यों: श्राद्ध-काल पूर्ण-सात्विक। तामसिक-राजसिक भोजन से पितर-असन्तुष्ट। शास्त्र-वर्जना। मन-शुद्धि नहीं।

    सही उपाय: 16 दिन शुद्ध-शाकाहार। प्याज-लहसुन भी त्यागें। दूध, फल, सात्विक-भोजन। ब्रह्मचर्य-पालन।

  • श्राद्ध-कर्म रात्रि में

    क्यों: श्राद्ध केवल दिन में — सूर्योदय से दोपहर तक श्रेष्ठ। पारम्परिक रूप से "अपराह्न-काल" (दोपहर 12-3) सर्वोत्तम। रात्रि में पितृ-कर्म वर्जित।

    सही उपाय: श्राद्ध दोपहर 12-3 बजे पूरा करें। प्रातः 8-12 बजे तर्पण। रात्रि-श्राद्ध से बचें।

  • ब्राह्मण-भोज छोड़कर केवल "online दान"

    क्यों: श्राद्ध की मूल-आत्मा "ब्राह्मण-भोज"। पितर ब्राह्मण के माध्यम से तृप्त होते हैं। केवल पैसा भेजना — पूर्ण-फल नहीं।

    सही उपाय: कम-से-कम 1 ब्राह्मण/पुजारी को घर बुलाकर भोजन। यदि सम्भव न हो — मन्दिर में भोजन-सेवा (अन्न-दान)।

  • श्राद्ध को "केवल पुत्र का काम" मानना

    क्यों: पारम्परिक रूप से ज्येष्ठ-पुत्र। पर पुत्र न हो तो — पुत्री, बेटी का पति, भाई, भतीजा, यहाँ तक कि शिष्य भी कर सकते हैं। महाभारत-काल में स्त्रियाँ भी करती थीं।

    सही उपाय: पुत्र न हो तो पुत्री/भाई कर सकते हैं। यदि कोई न हो — किसी ब्राह्मण को नियुक्त करके। श्राद्ध छोड़ना नहीं चाहिए।

📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ

इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अगर तिथि याद नहीं तो श्राद्ध कब करें?

सर्व-पितृ-अमावस्या (2026 — 22 सितम्बर) पर श्राद्ध करें — सब पितरों के लिए। यह "महालया" है — सबसे महत्त्वपूर्ण-दिन। यदि अमावस्या भी छूटे — आगामी अमावस्या या नवमी पर।

क्या स्त्रियाँ श्राद्ध-कर्म कर सकती हैं?

पारम्परिक मत — पुरुष (पुत्र, पौत्र) ही पिण्ड-दान करें। पर पुत्र न हो तो — पुत्री, बेटी का पति, भाई, भतीजा भी कर सकते हैं। महाभारत-काल में स्त्रियाँ भी करती थीं। आधुनिक मत — किसी भी रक्त-सम्बन्धी से। पर तर्पण और पंच-बलि स्त्रियाँ अवश्य कर सकती हैं।

पितृ-दोष क्या है? कैसे शान्त करें?

जब पितरों का श्राद्ध न हो — पितृ-दोष। कुण्डली में सूर्य-शनि-राहु-केतु में पितृ-दोष। लक्षण: सन्तान-कष्ट, धन-हानि, पारिवारिक-कलह, असफलता। उपाय: पितृ-पक्ष में नियमित-श्राद्ध, गया-श्राद्ध, गाय-दान, पीपल-वृक्ष को जल, "पितृ-स्तोत्र" पाठ, ब्राह्मण-भोज।

गरुड़-पुराण का पाठ कब करें?

मृत्यु के बाद 13 दिन तक — मुख्य-पाठ। पितृ-पक्ष में दैनिक 1-2 अध्याय। माता-पिता की पुण्य-तिथि (मृत्यु-तिथि) पर। एकादशी पर। यह मरण के बाद के यम-लोक, पितर-गति, पुनर्जन्म का पूर्ण-वर्णन। पितरों की सद्गति के लिए श्रेष्ठ।

🔗सम्बन्धित विषय

सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।