गायत्री माता

गायत्री माता

वेद-माता, सर्व-मन्त्रों की जननी, सावित्री

गायत्री माता परिचय

अन्य नाम / उपाधियाँ: वेद-माता, सावित्री, मन्त्र-जननी, सूर्य-शक्ति, ब्रह्म-विद्या, पञ्च-मुखी

गायत्री माता हिन्दू धर्म की सर्वोच्च मन्त्र-शक्ति की प्रतीक देवी हैं। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल (३.६२.१०) में विश्वामित्र-दृष्ट गायत्री मन्त्र को "मन्त्र-राज" कहा गया है। यही मन्त्र इस देवी का स्वरूप है — गायत्री देवी एवं गायत्री मन्त्र अभिन्न।

गायत्री "वेद-माता" कहलाती हैं क्योंकि चार वेद उन्हीं से उत्पन्न माने जाते हैं। वे सूर्य की दिव्य प्रकाश-शक्ति की प्रतीक हैं — सावित्री। उनके पाँच मुख — पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), तथा दस हाथ — दश दिशाएँ।

द्विज (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के लिए गायत्री-दीक्षा (यज्ञोपवीत संस्कार) में सर्वप्रथम गायत्री मन्त्र दिया जाता है। प्रात:काल, मध्याह्न, सायंकाल — तीन सन्ध्या पर गायत्री-जप का विधान। आधुनिक गायत्री परिवार (आचार्य श्रीराम शर्मा) ने इसे जाति-वर्ग के बन्धन से मुक्त कर सबके लिए सुलभ बनाया है।

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स्वरूप एवं चित्रण

पञ्च-मुखी, दश-भुजा रूप — पाँच मुख क्रमशः मुक्ता, स्वर्ण, हिर, धूम्र-वर्ण, श्वेत। प्रत्येक मुख तीन नेत्र युक्त। दश हाथों में शंख, चक्र, कमल, गदा, अंकुश, पाश, अक्षमाला, कमण्डलु, वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा। हंस वाहन, कमलासन। अरुणोदय की सूर्य-कान्ति के समान वर्ण।

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परिवार एवं सम्बन्ध

पतिभगवान् ब्रह्मा (कुछ ग्रन्थों में सावित्री-स्वयम्भू)
अभिन्न मन्त्रगायत्री महामन्त्र (२४ अक्षरों का)
अभिन्न ग्रहसूर्य की दिव्य शक्ति (सावित्री)
धामसूर्य-मण्डल (सूर्य-केन्द्र)
पञ्च मुखपंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)
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प्रमुख मन्त्र

ॐ भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात्॥

Om Bhur Bhuvah Svah · Tat Savitur Varenyam · Bhargo Devasya Dhimahi · Dhiyo Yo Nah Prachodayat

अर्थ: हम तीन लोकों — भू, भुवः, स्वः — के सूर्य के परम-वरेण्य तेज का ध्यान करते हैं — जो हमारी बुद्धि को सत्-मार्ग पर प्रेरित करे। २४ अक्षरों का गायत्री महामन्त्र।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वसम्मोहिनि स्वाहा

Om Hreem Shreem Kleem Sarva-Sammohini Svaha

अर्थ: सर्व-सम्मोहिनी गायत्री-शक्ति को नमन — तान्त्रिक प्रयोग।

दार्शनिक प्रतीक

गायत्री = "गायन्तं त्रायते" — जो उच्चारण करने वालों की रक्षा करती है। २४ अक्षर = २४ ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ। तीन व्याहृतियाँ (भूर्भुवःस्वः) = त्रिकाल (भूत-वर्तमान-भविष्य) एवं त्रिलोक। सूर्य-शक्ति के ध्यान का अर्थ — आत्म-प्रकाश, ज्ञान-दीप का जागरण। नियमित जप से बुद्धि पर तमस् का आवरण हटता है — दिव्य प्रज्ञा प्रकट होती है।