✦ गायत्री माता ✦
✦ वेद-माता, सर्व-मन्त्रों की जननी, सावित्री ✦
✦ गायत्री माता परिचय ✦
अन्य नाम / उपाधियाँ: वेद-माता, सावित्री, मन्त्र-जननी, सूर्य-शक्ति, ब्रह्म-विद्या, पञ्च-मुखी
गायत्री माता हिन्दू धर्म की सर्वोच्च मन्त्र-शक्ति की प्रतीक देवी हैं। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल (३.६२.१०) में विश्वामित्र-दृष्ट गायत्री मन्त्र को "मन्त्र-राज" कहा गया है। यही मन्त्र इस देवी का स्वरूप है — गायत्री देवी एवं गायत्री मन्त्र अभिन्न।
गायत्री "वेद-माता" कहलाती हैं क्योंकि चार वेद उन्हीं से उत्पन्न माने जाते हैं। वे सूर्य की दिव्य प्रकाश-शक्ति की प्रतीक हैं — सावित्री। उनके पाँच मुख — पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), तथा दस हाथ — दश दिशाएँ।
द्विज (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के लिए गायत्री-दीक्षा (यज्ञोपवीत संस्कार) में सर्वप्रथम गायत्री मन्त्र दिया जाता है। प्रात:काल, मध्याह्न, सायंकाल — तीन सन्ध्या पर गायत्री-जप का विधान। आधुनिक गायत्री परिवार (आचार्य श्रीराम शर्मा) ने इसे जाति-वर्ग के बन्धन से मुक्त कर सबके लिए सुलभ बनाया है।
✦ स्वरूप एवं चित्रण ✦
पञ्च-मुखी, दश-भुजा रूप — पाँच मुख क्रमशः मुक्ता, स्वर्ण, हिर, धूम्र-वर्ण, श्वेत। प्रत्येक मुख तीन नेत्र युक्त। दश हाथों में शंख, चक्र, कमल, गदा, अंकुश, पाश, अक्षमाला, कमण्डलु, वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा। हंस वाहन, कमलासन। अरुणोदय की सूर्य-कान्ति के समान वर्ण।
✦ परिवार एवं सम्बन्ध ✦
✦ प्रमुख मन्त्र ✦
ॐ भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात्॥
Om Bhur Bhuvah Svah · Tat Savitur Varenyam · Bhargo Devasya Dhimahi · Dhiyo Yo Nah Prachodayat
अर्थ: हम तीन लोकों — भू, भुवः, स्वः — के सूर्य के परम-वरेण्य तेज का ध्यान करते हैं — जो हमारी बुद्धि को सत्-मार्ग पर प्रेरित करे। २४ अक्षरों का गायत्री महामन्त्र।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वसम्मोहिनि स्वाहा
Om Hreem Shreem Kleem Sarva-Sammohini Svaha
अर्थ: सर्व-सम्मोहिनी गायत्री-शक्ति को नमन — तान्त्रिक प्रयोग।
✦ दार्शनिक प्रतीक ✦
गायत्री = "गायन्तं त्रायते" — जो उच्चारण करने वालों की रक्षा करती है। २४ अक्षर = २४ ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ। तीन व्याहृतियाँ (भूर्भुवःस्वः) = त्रिकाल (भूत-वर्तमान-भविष्य) एवं त्रिलोक। सूर्य-शक्ति के ध्यान का अर्थ — आत्म-प्रकाश, ज्ञान-दीप का जागरण। नियमित जप से बुद्धि पर तमस् का आवरण हटता है — दिव्य प्रज्ञा प्रकट होती है।