यज्ञोपवीत-संस्कार (उपनयन / जनेऊ) — हिन्दू-धर्म के 16 संस्कारों में से 10वाँ। ब्रह्मचर्य-आश्रम में प्रवेश। 7-12 वर्ष की आयु में बालक का जनेऊ-धारण। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य के लिए (पारम्परिक)।
जनेऊ = 3-धागे (ब्रह्मा-विष्णु-शिव), 96 अंगुल लम्बा (96 तत्त्व-स्मारक)। बायें-कन्धे पर — दायें-कमर तक। आजीवन-धारण।
✦ यज्ञोपवीत-संस्कार के लिए शुभ-समय
आयु: ब्राह्मण 7-8 वर्ष, क्षत्रिय 11-12, वैश्य 13-14। आधुनिक-काल में 8-12 वर्ष सर्वमान्य।
मास: माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष श्रेष्ठ। आषाढ़-कार्तिक चातुर्मास वर्जित। पौष-वर्जित।
तिथि: द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी।
वार: सोम, बुध, गुरु, शुक्र। मंगल/शनि/रवि वर्जित।
नक्षत्र: रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती।
विशेष: अक्षय-तृतीया (20 अप्रैल 2026) — सर्वोच्च-शुभ।
✦ यज्ञोपवीत की विधि
पूर्व-तैयारी (1 सप्ताह पूर्व): बालक का मुण्डन। पुजारी-निमन्त्रण। यज्ञ-कुण्ड तैयार।
मुहूर्त-दिन प्रात: स्नान। पीला-वस्त्र। पूजा-स्थल पर बैठें।
गणेश-कलश-नवग्रह-पूजन। यज्ञ-वेदी।
पिता या गुरु बालक के सिर पर हाथ रखें। गायत्री-मन्त्र-दीक्षा।
जनेऊ-धारण: बायें-कन्धे से दायें-कमर तक। मन्त्र: "यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥"
गायत्री-मन्त्र-जप: 108 बार। यह जीवन-भर का जप।
भिक्षा-मांगना: नये-ब्रह्मचारी को 3 घर भिक्षा माँगने का प्रतीक। माता पहले भिक्षा देती।
ब्राह्मण-भोज + दान।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
- ▪सूर्य सिद्धान्त — शास्त्रीय संस्कृत खगोलशास्त्र ग्रन्थ (~5वीं सदी ईसवी)
- ▪बृहत् पाराशर होरा शास्त्र — महर्षि पराशर रचित वैदिक ज्योतिष का मूल-ग्रन्थ
- ▪मुहूर्त चिन्तामणि — राम दैवज्ञ रचित (16वीं सदी), मुहूर्त-शास्त्र का मानक-ग्रन्थ
- ▪Astronomical Algorithms — Jean Meeus (Willmann-Bell, 1998); इस साइट के सभी खगोलीय गणनाओं का आधार
- ▪लाहिरी अयनांश — भारतीय कैलेण्डर सुधार समिति (1955) द्वारा अंगीकृत मानक सायन-निरयण रूपान्तरण
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जनेऊ कब बदलें?▼
पारम्परिक: हर 4 महीने (श्रावणी-पूर्णिमा पर अनिवार्य)। यदि टूट जाये — तुरन्त नया। मांस/अंतिम-संस्कार/शौच के बाद उतारें-धोयें-पुनः-धारण।
क्या स्त्रियाँ जनेऊ धारण कर सकती हैं?▼
पारम्परिक रूप से नहीं — स्त्रियाँ "मातृ-संस्कार" से ब्रह्म-ज्ञान पाती। पर वैदिक-काल में कुछ स्त्री-ऋषिकाओं ने भी जनेऊ धारण किया था (गार्गी, मैत्रेयी)। आधुनिक-समय में कुछ-संस्थाएँ स्त्रियों को भी अनुमति देती हैं।
🔗सम्बन्धित विषय
सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।