कर्णवेधन संस्कार

6-7 मास, 1, 3, 5 वर्ष (विषम-वर्ष)

पुत्र-क्रम

दाहिना पहले

पुत्री-क्रम

बायाँ पहले

श्रेष्ठ-आयु

6-7 मास

कर्णवेधन-संस्कार — हिन्दू 16 संस्कारों में से 9वाँ। बच्चे (पुत्र-पुत्री दोनों) के कान में छेद-निर्माण। पुत्र — दाहिने कान पहले। पुत्री — बायें कान पहले।

आयु: 6-7 मास, 1 वर्ष, 3 वर्ष, 5 वर्ष (विषम-वर्ष श्रेष्ठ)। दिशा-वार-नक्षत्र-तिथि-मुहूर्त सब अनिवार्य।

कर्णवेधन के लिए शुभ-समय

आयु: सर्वोत्तम 6 मास या 7 मास। अन्य विकल्प: 1 वर्ष, 3 वर्ष, 5 वर्ष। सम-वर्ष (2, 4, 6) वर्जित।

मास: माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ। चातुर्मास वर्जित।

वार: सोम, बुध, गुरु, शुक्र। मंगल/शनि/रवि वर्जित।

नक्षत्र: मृगशिरा, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती।

तिथि: द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी।

कर्णवेधन की विधि

मुहूर्त-दिन: प्रात: बच्चे को स्नान। नये-वस्त्र। पूजा-स्थल पर रखें।

गणेश-स्मरण। मन्त्र-पाठ। बच्चे के मुख में मधु (शहद) की एक-बूँद।

सोने/चांदी की पतली-सूई से कान-छिद्र। आधुनिक-काल में bal-rog-डॉक्टर/नर्स से करवाना सुरक्षित।

पुत्र — दाहिने कान पहले, फिर बायें। पुत्री — बायें कान पहले, फिर दाहिने।

सूई-छेद के बाद हल्दी-तेल लगायें। संक्रमण-निवारण।

आधुनिक: सोने/चांदी के छोटे-कुण्डल। 6 हफ्ते में पूर्ण-ठीक।

📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ

इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्णवेधन का धार्मिक-वैज्ञानिक महत्त्व?

धार्मिक: 16-संस्कार। ज्ञान-इन्द्रियों का जागरण। वैज्ञानिक: कान-लोब पर "एक्यूपंक्चर-बिन्दु" — मस्तिष्क-विकास, स्मरण-शक्ति, श्रवण-शक्ति बढ़ती। आधुनिक-शोध भी पुष्टि करते।

🔗सम्बन्धित विषय

सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।