✦ कुम्भ मेला ✦
✦ — विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम — ✦
✦ कुम्भ मेला क्या है? ✦
कुम्भ मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम है — गिनेस-बुक के अनुसार एकत्रित मानवों की सर्वाधिक संख्या। यह संस्कृत के "कुम्भ" (अमृत-कलश) से नामित है। समुद्र-मन्थन से प्राप्त अमृत-कलश के लिए देव-असुर युद्ध के समय अमृत की कुछ बूँदें चार तीर्थ-स्थलों — प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन — पर गिरी थीं। इन्हीं स्थलों पर कुम्भ का आयोजन होता है।
कुम्भ की तिथि बृहस्पति (गुरु) ग्रह की राशि-स्थिति से निर्धारित होती है — जब गुरु विशेष राशि में होते हैं, तब उस तीर्थ-स्थल पर कुम्भ होता है। यह सम्पूर्ण १२-वर्षीय गुरु-चक्र पर आधारित है।
मुख्य धार्मिक क्रिया है "शाही स्नान" — विशेष शुभ तिथियों पर साधु-संन्यासियों एवं श्रद्धालुओं द्वारा सामूहिक नदी-स्नान। मान्यता है — इस स्नान से अनेक जन्मों के पाप-भाव नष्ट होते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
✦ चार तीर्थ-स्थल ✦
प्रयागराज (इलाहाबाद)
नदी: गंगा-यमुना-सरस्वती संगम
गुरु स्थिति: गुरु — वृष राशि में
पूर्व कुम्भ: 2025 (महाकुम्भ) · 2013 · 2001
अगला कुम्भ: 2037
हरिद्वार
नदी: गंगा (गंगा-द्वार)
गुरु स्थिति: गुरु — कुम्भ राशि में, सूर्य मेष में
पूर्व कुम्भ: 2021 · 2010 · 1998
अगला कुम्भ: 2033
नासिक (त्र्यम्बकेश्वर)
नदी: गोदावरी (दक्षिण गंगा)
गुरु स्थिति: गुरु — सिंह राशि में
पूर्व कुम्भ: 2015 · 2003
अगला कुम्भ: 2027
उज्जैन (सिंहस्थ)
नदी: क्षिप्रा
गुरु स्थिति: गुरु — सिंह राशि में, सूर्य मेष में
पूर्व कुम्भ: 2016 · 2004
अगला कुम्भ: 2028
* २०२५ प्रयागराज महाकुम्भ — १४४ वर्षीय चक्र का पूर्ण-योग। २०२७ नासिक एवं २०२८ उज्जैन सिंहस्थ कुम्भ की तैयारी।
✦ कुम्भ चक्र ✦
पूर्ण कुम्भ
📅 प्रत्येक १२ वर्ष
१२ वर्ष का चक्र — गुरु (बृहस्पति) के एक राशि-चक्र पूर्ण करने पर। चारों तीर्थ-स्थलों पर बारी-बारी से। गुरु की राशि-स्थिति से तीर्थ निश्चित होता है।
अर्ध कुम्भ
📅 प्रत्येक ६ वर्ष
प्रयागराज एवं हरिद्वार पर दो पूर्ण-कुम्भों के बीच होता है। यह "आधा कुम्भ" कहलाता है — परन्तु आकार में बराबर का।
महा कुम्भ
📅 प्रत्येक १४४ वर्ष
१२ × १२ = १४४ वर्ष का चक्र — केवल प्रयागराज पर। पिछला महाकुम्भ २०२५ में सम्पन्न हुआ। अगला २१६९ ईस्वी में।
सिंहस्थ
📅 प्रत्येक १२ वर्ष (नासिक/उज्जैन)
नासिक एवं उज्जैन में होने वाला कुम्भ "सिंहस्थ" कहलाता है — क्योंकि गुरु सिंह राशि में होता है।
✦ पौराणिक कथा — समुद्र मन्थन ✦
क्षीर-सागर में देवों एवं असुरों ने मन्दार पर्वत को मथानी एवं वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र-मन्थन किया। चौदह रत्नों के साथ अन्तिम में अमृत-कलश लेकर भगवान् धन्वन्तरि प्रकट हुए। असुरों ने अमृत छीनने का प्रयास किया।
भगवान् विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत वितरण के समय बहाने से असुरों को विभ्रमित किया। इस संग्राम में अमृत-कलश से कुछ बूँदें — कथानुसार चार स्थानों पर — गिरीं। इसी अमृत-स्पर्श से वे चारों तीर्थ "मोक्ष-दायक" बन गये। इसी भौगोलिक कथा से कुम्भ-मेला परम्परा प्रारम्भ हुई।
✦ १३ अखाड़े ✦
अखाड़ा = साधु-संन्यासियों का सशस्त्र संगठन। आदि शंकराचार्य द्वारा ८वीं शताब्दी में स्थापित। प्रत्येक अखाड़े का अपना ध्वज, इष्ट-देव, परम्परा एवं स्नान-क्रम है।
महानिर्वाणी अखाड़ा
दशनामी / Dashanami
जूना अखाड़ा
दशनामी / Dashanami
निरंजनी अखाड़ा
दशनामी / Dashanami
आवाहन अखाड़ा
दशनामी / Dashanami
अटल अखाड़ा
दशनामी / Dashanami
आनन्द अखाड़ा
दशनामी / Dashanami
अग्नि अखाड़ा
ब्रह्मचारी / Brahmachari
दिगम्बर अनी अखाड़ा
वैष्णव / Vaishnava
निर्वाणी अनी अखाड़ा
वैष्णव / Vaishnava
निर्मोही अनी अखाड़ा
वैष्णव / Vaishnava
बड़ा उदासीन अखाड़ा
उदासीन / Udasin
नया उदासीन अखाड़ा
उदासीन / Udasin
निर्मल अखाड़ा
सिख / Sikh
✦ शाही स्नान ✦
शाही स्नान = प्रत्येक कुम्भ-काल में ३-४ अति-शुभ तिथियाँ जब साधु-संन्यासी (अखाड़े) पारम्परिक क्रम से शाही जुलूस के साथ नदी-स्नान करते हैं। साधारण श्रद्धालु इनके पश्चात् स्नान करते हैं। ये तिथियाँ मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसन्त पंचमी, माघी पूर्णिमा, महाशिवरात्रि — पंचांग के अनुसार निर्धारित।
इन तिथियों पर स्नान का फल सहस्त्र-गुना माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त एवं मध्याह्न में स्नान सर्वोत्तम। मन्त्र-जप एवं संकल्प के साथ स्नान करने से पूर्ण-फल प्राप्त।