कर्म सिद्धान्त

हिन्दू-दर्शन की मूल-नींव — गीता का सन्देश

प्रकार

3

मार्ग

3

लक्ष्य

मोक्ष

कर्म-सिद्धान्त — हिन्दू-धर्म की मूल-दार्शनिक-नींव। प्रत्येक-कर्म का फल। "जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।" गीता का मूल-सन्देश।

3-प्रकार: सञ्चित (पूर्व-जन्मों का संग्रह), प्रारब्ध (वर्तमान-जन्म-फल), क्रियमाण (अभी किया जा रहा)।

3 कर्म-प्रकार

1. **सञ्चित-कर्म**: सब पूर्व-जन्मों का संग्रह। बहु-जन्मों में फलने वाला।

2. **प्रारब्ध-कर्म**: सञ्चित का वह-अंश जो वर्तमान-जन्म में फलने वाला। अनिवार्य।

3. **क्रियमाण/आगामी**: अभी किया जा रहा। भविष्य-निर्धारक। हमारे हाथ में।

4-प्रकार-फल

**दैवी-कर्म**: देवों के लिए। यज्ञ, पूजा।

**पैत्र्य-कर्म**: पूर्वजों के लिए। श्राद्ध, तर्पण।

**मानुष-कर्म**: मनुष्यों के लिए। दान, सेवा।

**आत्म-कर्म**: स्वयं के लिए। अध्ययन, ध्यान।

कर्म-योग (गीता)

"कर्मण्येवाधिकारस्ते" — कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं।

निष्काम-कर्म = बिना-फल-इच्छा।

कर्मफल-त्याग = ईश्वर को।

सम-भाव: सुख-दुःख, लाभ-हानि एक।

योग = कर्म-कौशल।

पुनर्जन्म और मोक्ष

कर्म = जन्म-मरण-चक्र।

नया-कर्म = नया-जन्म।

कर्म-क्षय = मोक्ष।

3-मार्ग: कर्म, भक्ति, ज्ञान।

सब कर्म-भगवद्-अर्पण = कर्म-बन्धन-नाश।

जीवन-मुक्त: देह-धारण-करते मुक्त।

📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ

इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या भाग्य बदल सकते?

प्रारब्ध (वर्तमान-जन्म) पूर्ण-नहीं बदलता, कम कर सकते। क्रियमाण से भविष्य गढ़ें।

अच्छे-कर्म-वाला बीमार क्यों?

पूर्व-जन्म-कर्म-फल। वर्तमान-अच्छे-कर्म से मोक्ष-मार्ग। शीघ्र-राहत न मिले तो धैर्य।

🔗सम्बन्धित विषय

सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।