आत्मा परमात्मा

व्यक्तिगत-आत्मा और सर्वव्यापी-ब्रह्म

मूल

उपनिषद्

सूत्र

तत्त्वमसि

लक्ष्य

मोक्ष

आत्मा-परमात्मा — हिन्दू-दर्शन का मूल-तत्त्व। आत्मा = व्यक्तिगत-चेतना। परमात्मा = सर्वव्यापी-ब्रह्म। दोनों मूलतः एक।

उपनिषद्-वर्णित: "तत्त्वमसि" (तू वही है)। आत्म-साक्षात्कार = परमात्म-साक्षात्कार।

आत्मा का स्वरूप

अमर: न जन्म न मृत्यु।

अविनाशी: शस्त्र-अग्नि-जल-वायु से अप्रभावित।

सूक्ष्मतम: आणविक से भी छोटी।

सर्वत्र: सब-जीवों में।

साक्षी: कर्म-साक्षी, कर्ता नहीं।

अनादि-अनन्त।

गीता 2.20-25 वर्णित।

परमात्मा का स्वरूप

सर्वव्यापी: सब-जगह।

सर्वज्ञ: सब जानने वाला।

सर्वशक्तिमान्।

सब-कारणों का कारण।

गुणातीत: 3 गुणों से परे।

निर्गुण-निराकार + सगुण-साकार दोनों।

आत्मा-परमात्मा-सम्बन्ध

**अद्वैत** (शंकर): एक ही। माया से भिन्न दिखती।

**विशिष्टाद्वैत** (रामानुज): एक किन्तु आत्मा परमात्मा का अंश।

**द्वैत** (माध्व): अलग। आत्मा सेवक, परमात्मा स्वामी।

**द्वैताद्वैत**: मध्यम-स्थिति।

सब वेदान्त-शाखाएँ।

अनुभव-मार्ग

ध्यान-योग।

कर्म-योग।

भक्ति-योग।

ज्ञान-योग।

गुरु-कृपा।

समाधि-स्थिति।

जीवन-मुक्त: देह-धारण-करते मुक्त।

📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ

इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आत्मा कितनी?

अद्वैत: एक (माया-भेद)। द्वैत: अनन्त। विशिष्टाद्वैत: अनन्त किन्तु ब्रह्म से जुड़ी।

मरण-पश्चात आत्मा क्या?

गीता: नया शरीर। कर्म-अनुसार। मोक्ष = परमात्मा से एक।

🔗सम्बन्धित विषय

सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।