वसन्त सम्पात (मेष संक्रान्ति)

वसन्त सम्पात (मेष संक्रान्ति)

सूर्य का भूमध्य रेखा पर — दिन-रात्रि बराबर

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वसन्त सम्पात (मेष संक्रान्ति) क्या है?

वसन्त सम्पात (Vernal Equinox) = वर्ष का वह दिन जब सूर्य भूमध्य रेखा को दक्षिण से उत्तर पार करता है। दिन एवं रात्रि की लम्बाई बराबर — १२ घंटे प्रत्येक। तिथि लगभग प्रत्येक वर्ष २० अथवा २१ मार्च।

खगोलीय रूप से इसी दिन सायन (पाश्चात्य) सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है — पाश्चात्य ज्योतिष का "नव वर्ष"। ईरानी "नवरोज़", चीनी एवं जापानी आदि-वसन्त त्यौहार इसी समय। उत्तरी गोलार्ध में वसन्त ऋतु का खगोलीय आरम्भ।

भारतीय वैदिक परम्परा में निरयन (सिडरियल) मेष संक्रान्ति लगभग १४ अप्रैल पर होती है — अयनांश-अन्तर के कारण। यह "सौर नव-वर्ष" है — पंजाब में "बैसाखी", तमिल में "विषु/पुथान्डु", बंगाली "पोइला बोइशाख", असमी "बिहु"। इसी कारण वैदिक सौर-कैलेण्डर का प्रारम्भ चैत्र मास से।

वसन्त सम्पात पर्यावरण-पुनर्जन्म, नवीनता, सन्तुलन का प्रतीक है। दिन-रात्रि का सन्तुलन = प्रकृति का संतुलन। सूर्य-नमस्कार एवं प्राण-शक्ति की वृद्धि हेतु इस दिन साधना अति-फलदायी।

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अवधारणा एवं नियम

खगोलीय आधार: पृथ्वी की धुरी २३.५° झुकी है। २० मार्च के निकट सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर लम्बवत् पड़ती हैं। पृथ्वी का कोई गोलार्ध सूर्य की ओर अधिक झुका नहीं — दोनों गोलार्धों में दिन-रात्रि बराबर। सूर्य ठीक पूर्व में उदित एवं ठीक पश्चिम में अस्त। उत्तरी गोलार्ध में दिन-लम्बाई बढ़ने लगती है, दक्षिणी में घटने लगती है।

करने योग्य कार्य

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सूर्य नमस्कार — १०८ बार
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गायत्री-जप एवं ध्यान
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प्रकृति-दर्शन एवं पर्यावरण रक्षा संकल्प
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दान — विशेष नई वस्तु एवं वसन्त-फल
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गृह-शुद्धि एवं नवीनीकरण
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विद्या-आरम्भ एवं नये कार्य की योजना