लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम
पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ
✦ प्रकाशित: • समीक्षित:
✦ मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित ✦
गोवर्धन-पूजा — दीपावली के अगले-दिन (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा)। श्रीकृष्ण ने इन्द्र-गर्व-भंग करने हेतु गोवर्धन-पर्वत उठाया। उसी-स्मृति में।
अन्य-नाम: अन्नकूट। 56-भोग कृष्ण को अर्पित।
गोवर्धन-पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, अर्थात् दीपावली-अमावस्या के ठीक अगले दिन सम्पन्न होने वाला वैष्णव महोत्सव है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के चौबीसवें एवं पच्चीसवें अध्यायों में वर्णित है कि बालक श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को इन्द्र-यज्ञ छोड़कर गिरिराज गोवर्धन के पूजन की प्रेरणा दी, क्योंकि गोवर्धन ही गायों को तृण, जल और छाया देकर वास्तविक रूप से उनका पालन करता है। यह पर्व अन्नकूट के नाम से भी विख्यात है, जिसमें छप्पन-भोग की परम्परा का उद्भव हुआ।
गर्ग-संहिता के गिरिराज-खण्ड के तृतीय अध्याय में गोवर्धन-धारण की लीला का अत्यन्त रसमय वर्णन उपलब्ध है, जहाँ श्रीकृष्ण ने सात दिन तक कनिष्ठा अंगुली पर पर्वत उठाकर इन्द्र के कोप से व्रज की रक्षा की। विष्णु-पुराण के पञ्चम अंश के बारहवें अध्याय के अनुसार, इसी घटना के पश्चात् देवराज इन्द्र ने स्वयं श्रीकृष्ण का सुरभि-गौ के दूध से अभिषेक कर उन्हें 'गोविन्द' पद से अभिहित किया। इस प्रकार गोवर्धन-पूजा केवल कृषि-पर्व नहीं अपितु अहंकार-नाश एवं भक्ति-विजय का शाश्वत स्मरण है।
✦ पौराणिक-कथा
वृन्दावन के गोप इन्द्र की पूजा करते।
कृष्ण ने कहा: "इन्द्र-नहीं, गोवर्धन-पर्वत और गाय हमारे आधार।"
इन्द्र क्रोधित। 7 दिनों की मूसलाधार-वर्षा।
कृष्ण ने 7 वर्ष की आयु में गोवर्धन कनिष्ठा-अंगुली पर उठाया।
सम्पूर्ण-वृन्दावन को आश्रय।
7 दिन बाद इन्द्र पराजित-स्वीकार। कृष्ण-चरणों में।
✦ 2026 गोवर्धन
तिथि: 9 नवम्बर 2026 (सोमवार)।
दीपावली से अगला-दिन।
भाई-दूज से एक-दिन पहले।
✦ पूजा-विधि
गाय के गोबर से गोवर्धन-आकृति आँगन में।
गोवर्धन के ऊपर-कृष्ण-मूर्ति।
फूल, धूप, दीप।
56-भोग: 56 प्रकार के व्यंजन (अन्नकूट)।
दूध-दही-खीर अनिवार्य।
परिक्रमा: 7/11 बार।
आरती: "गोवर्धन-धरण-गिरि" आरती।
सायं: गाय-पूजन।
✦ विशेष-स्थल
गोवर्धन-पर्वत (मथुरा से 22 किमी): 21 किमी परिक्रमा।
दण्डवत-परिक्रमा: 7-15 दिन में पूर्ण।
नन्द-गाँव, बरसाना, गोकुल — साथ-यात्रा।
✦ पौराणिक पृष्ठभूमि — गोवर्धन-धारण लीला का शास्त्रीय आख्यान
श्रीमद्भागवत-पुराण के दशम स्कन्ध के चतुर्विंशति अध्याय में आख्यान है कि व्रजवासी प्रतिवर्ष शरद-ऋतु के अन्त में देवराज इन्द्र की महायज्ञ-पूर्वक आराधना करते थे। बालक श्रीकृष्ण ने नन्द-बाबा तथा गोप-वृद्धों से प्रश्न किया — 'यदि वर्षा का देवता इन्द्र है तो भी गौओं को घास, जल और आश्रय तो गिरिराज गोवर्धन ही देता है; अतः वास्तविक पूजा-योग्य तो वही है।' इस तर्क से प्रेरित होकर व्रजवासियों ने इन्द्र-यज्ञ का सामान गोवर्धन को समर्पित कर दिया।
इन्द्र-कोप से सात दिन तक मूसलाधार साम्वर्तक मेघों ने व्रज पर वज्र-वृष्टि की। तब सात-वर्षीय श्रीकृष्ण ने अपनी वाम-हस्त की कनिष्ठा अंगुली पर समस्त गोवर्धन-पर्वत को कमलनाल के समान उठा लिया और सम्पूर्ण व्रज, गौ-धन तथा गोप-गोपिकाओं को सात अहोरात्र तक उसके नीचे आश्रय दिया। हरिवंश-पुराण के विष्णु-पर्व के सत्रहवें से उन्नीसवें अध्यायों में इस लीला का विस्तृत वर्णन है।
अन्ततः इन्द्र को अपने गर्व का बोध हुआ। विष्णु-पुराण के पञ्चम अंश के द्वादश अध्याय अनुसार, इन्द्र ने कामधेनु सुरभि के साथ श्रीकृष्ण के समीप आकर उनके चरणों में नतमस्तक होकर सुरभि-दुग्ध तथा आकाश-गङ्गा के जल से उनका अभिषेक किया तथा 'गोविन्द' एवं 'उपेन्द्र' नामों से सम्बोधित किया। इसी कारण यह पर्व देवताभिमान-नाशक एवं भक्त-वत्सलता का परम-प्रतीक माना जाता है।
✦ पूजा-विधि — गोवर्धन-निर्माण से अन्नकूट तक का क्रम
प्रातःकाल स्नान-सन्ध्या के पश्चात् घर के आँगन अथवा द्वार पर गोबर से गोवर्धन-पर्वत की आकृति बनाई जाती है। मध्य में लेटे हुए श्रीकृष्ण की मूर्ति, चारों ओर गायों, बछड़ों, ग्वालों, कदम्ब-वृक्षों एवं यमुना की प्रतिकृति निर्मित कर पुष्प, दूर्वा, गन्ध, अक्षत और कुंकुम से अलंकृत करते हैं। गर्ग-संहिता के गिरिराज-खण्ड में इसी रीति से 'पार्थिव-गिरिराज' की स्थापना का विधान है।
तदनन्तर षोडशोपचार-पूजन सम्पन्न किया जाता है — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, प्रदक्षिणा एवं नमस्कार। मूल मन्त्र 'गोवर्धनधराधार गोकुलत्राणकारक। विष्णोर्बाहु-कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥' का उच्चारण विशेष फलप्रद कहा गया है।
पूजा के पश्चात् 'अन्नकूट' अर्थात् छप्पन-भोग का आयोजन होता है — जिसमें कढ़ी-भात, पूरी, खीर, हलवा, लड्डू, दही-वड़ा, पञ्च-मेवा एवं ऋतु-फलों का विशाल नैवेद्य पर्वत के समान संचित किया जाता है। तत्पश्चात् गोवर्धन की सात बार परिक्रमा करके दीप-आरती सम्पन्न कर प्रसाद का वितरण किया जाता है। संध्या-काल में गौ-पूजन, गौ-दान एवं गौ-ग्रास का विधान शास्त्र-सम्मत माना गया है।
✦ अन्नकूट-महोत्सव — छप्पन-भोग की परम्परा का तात्पर्य
अन्नकूट का शाब्दिक अर्थ है 'अन्न का पर्वत'। परम्परा के अनुसार बालक श्रीकृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन-धारण-काल में न तो भोजन ग्रहण किया, न जल। अष्टम दिवस पर्वत-स्थापन के पश्चात् व्रजवासियों ने आठ प्रहर के अष्ट भोजन, अर्थात् ५६ (आठ × सात) व्यञ्जन एकत्र कर श्रीकृष्ण को अर्पित किए — यही 'छप्पन-भोग' की रूढ़ि का मूल है।
इसमें छह रस — मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त एवं कषाय — के समस्त व्यञ्जन सम्मिलित होते हैं; तीन प्रकार के अन्न — भोज्य, भक्ष्य एवं लेह्य; तथा दुग्ध-व्यंजन, मिष्टान्न, फल, सूखे मेवे एवं पकवान। नाथद्वारा (राजस्थान), श्रीनाथ-मन्दिर एवं वृन्दावन में आज भी पुष्टिमार्गीय परम्परा के अनुसार अन्नकूट उत्सव अत्यन्त वैभव से सम्पन्न होता है।
तत्त्वतः अन्नकूट अन्न-पूर्णता तथा कृतज्ञता का प्रतीक है — कृषक, गौ, पर्वत, मेघ एवं भगवान् सभी इस अन्न-चक्र के सहभागी हैं। प्रसाद-वितरण द्वारा 'जो स्वयं भोगे बिना भगवान् को अर्पित करे, वह वस्तु ब्रह्म-रूप हो जाती है' — इस गीतोक्त सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप प्रकट होता है।
✦ तिथि-निर्णय एवं प्रतिपदा-व्याप्ति का नियम
धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु में स्पष्ट विधान है कि गोवर्धन-पूजा कार्तिक-शुक्ल-प्रतिपदा को सम्पन्न होती है, जो दीपावली-अमावस्या के अनन्तर आती है। यदि प्रतिपदा दो दिन तक व्याप्त हो, तो जिस दिन प्रातःकाल में प्रतिपदा हो — उसी दिन पूजा करनी चाहिए, क्योंकि प्रातः-व्यापिनी प्रतिपदा प्रशस्त मानी गई है।
यदि किसी वर्ष सूर्य-ग्रहण अथवा चन्द्र-ग्रहण के कारण पञ्चांग-गणना में तिथि-क्षय या तिथि-वृद्धि हो, तो स्थानीय पञ्चांग-निर्णय का अनुसरण करना चाहिए। प्रादोष-काल (सायं संध्या के पश्चात्) में भी गोवर्धन-पूजा का विधान अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है, विशेषतः व्रज-मण्डल एवं गुजरात में।
गोवर्धन-पूजा के दिन ही गुजराती परम्परा में 'विक्रम-संवत्' का नववर्ष-आरम्भ (बेस्तु-वरस) माना जाता है तथा व्यापारी-वर्ग 'चोपड़ा-पूजन' के पश्चात् नए बही-खातों का प्रारम्भ करते हैं। महाराष्ट्र एवं उत्तर-भारत में इसी दिन 'बलि-प्रतिपदा' का भी पर्व-योग होता है, जिसमें राजा बलि की पूजा का विधान है।
✦ दार्शनिक तात्पर्य — अहंकार-नाश एवं शरणागति का सन्देश
श्रीधर-स्वामी की भागवत-व्याख्या 'भावार्थ-दीपिका' में निरूपित है कि इन्द्र-यज्ञ का निवारण वस्तुतः 'देव-केन्द्रित कर्मकाण्ड' पर 'भगवत्-केन्द्रित भक्ति' की विजय है। इन्द्र पद-गर्व का प्रतीक है; गोवर्धन प्रकृति, गौ-सम्पदा एवं सजीव-पर्यावरण का प्रतीक है; तथा श्रीकृष्ण समस्त का अधिष्ठान-ब्रह्म हैं।
गोवर्धन को कनिष्ठा अंगुली पर उठाना — यह दर्शाता है कि भगवान् अपने अनन्त सामर्थ्य से भक्तों की रक्षा सहज ही कर देते हैं; भक्त को केवल अनन्य-शरणागति का यष्टि-दण्ड समर्पित करना है। चैतन्य-सम्प्रदाय में गोवर्धन-शिला को साक्षात् श्रीकृष्ण-स्वरूप मानकर पूजा जाती है, जैसा कि श्रीसनातन गोस्वामी ने रघुनाथ-दास को शिक्षित किया था।
पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्रीवल्लभाचार्य ने गोवर्धन-नाथजी (श्रीनाथजी) को अपने 'सेव्य-स्वरूप' के रूप में प्रतिष्ठित किया तथा अन्नकूट-सेवा को नित्य-नियम बनाया। इस प्रकार गोवर्धन-पूजा वैष्णव दर्शन में 'शरण-भक्ति' का साक्षात् क्रियात्मक रूप है, जहाँ अहंकारी इन्द्र भी अन्ततः गोविन्द-चरणों में नतमस्तक होता है।
📊गोवर्धन-पूजा का दैनिक क्रम (मुहूर्त-दृष्टि से)
| समय | कृत्य | शास्त्रीय आधार |
|---|---|---|
| ब्राह्म-मुहूर्त (4-6 बजे) | स्नान, सङ्कल्प, सूर्य-अर्घ्य | धर्मसिन्धु |
| प्रातःकाल (6-9 बजे) | गोबर से गोवर्धन-निर्माण एवं अलंकरण | गर्ग-संहिता |
| पूर्वाह्ण (9-12 बजे) | षोडशोपचार-पूजन एवं मूल-मन्त्र-जप | भागवत-दशम-स्कन्ध |
| मध्याह्न (12-3 बजे) | अन्नकूट-नैवेद्य एवं छप्पन-भोग अर्पण | पुष्टिमार्ग-परम्परा |
| अपराह्ण (3-6 बजे) | गोवर्धन-परिक्रमा एवं गौ-पूजन | विष्णु-पुराण |
| प्रादोष-काल (सायं) | दीप-आरती, प्रसाद-वितरण, गौ-ग्रास | निर्णयसिन्धु |
⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें
✗ केवल कार्तिक-अमावस्या को ही गोवर्धन-पूजा कर लेना
क्यों: गोवर्धन-पूजा अमावस्या को नहीं, अपितु उसके अगले दिन कार्तिक-शुक्ल-प्रतिपदा को ही शास्त्र-सम्मत है — अमावस्या लक्ष्मी-पूजन का दिवस है।
✓ सही उपाय: स्थानीय पञ्चांग देखकर प्रतिपदा-व्यापिनी तिथि पर ही पूजा सम्पन्न करें; प्रातः-व्यापिनी प्रतिपदा को प्रशस्त मानें।
✗ गोबर के स्थान पर केवल चित्र अथवा मूर्ति से पूजा करना
क्यों: गर्ग-संहिता एवं व्रज-परम्परा में 'पार्थिव-गिरिराज' अर्थात् गोबर-निर्मित आकृति का ही विशेष महत्त्व है, क्योंकि गोबर स्वयं गोवर्धन का प्रतिनिधि-द्रव्य माना गया है।
✓ सही उपाय: यथासम्भव गोबर से छोटी-सी गोवर्धन-आकृति अवश्य बनाएँ; उसमें श्रीकृष्ण की मूर्ति, गौ, ग्वाल आदि सजाएँ।
✗ अन्नकूट के बाद बचे प्रसाद को फेंक देना
क्यों: अन्नकूट का प्रसाद साक्षात् गिरिराज-प्रसाद माना जाता है; उसका अनादर पाप-जनक है।
✓ सही उपाय: समस्त प्रसाद को गौ, ब्राह्मण, निर्धन एवं परिवार-जनों में वितरित करें; एक कण भी अनादर-पूर्वक न त्यागें।
✗ गौ-पूजन एवं गौ-ग्रास का लोप कर देना
क्यों: गोवर्धन-पूजा का मूल उद्देश्य गौ-धन एवं प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है; गौ-पूजन के बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है।
✓ सही उपाय: इस दिन गौ-स्नान, तिलक, माला, गुड़-रोटी का ग्रास तथा यथाशक्ति गौ-दान अवश्य करें।
✗ बिना सङ्कल्प के पूजा प्रारम्भ कर देना
क्यों: शास्त्र-विधान के अनुसार बिना देश-काल-गोत्र-नाम-सहित सङ्कल्प के कोई व्रत-पूजा पूर्ण-फलदायक नहीं होती।
✓ सही उपाय: पूजा-आरम्भ में 'मम क्षेम-स्थैर्य-विजय-आयु-आरोग्य-ऐश्वर्याभिवृद्ध्यर्थम्' सहित विधिवत् सङ्कल्प अवश्य करें।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
- ▪श्रीमद्भागवत महापुराण — दशम स्कन्ध, अध्याय 24 (इन्द्र-यज्ञ निवारण) एवं अध्याय 25 (गोवर्धन-धारणम्) — गोवर्धन-पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव का मूल आख्यान
- ▪विष्णु पुराण — पञ्चम अंश (Book V), अध्याय 12 — गोवर्धन धारण के अनन्तर इन्द्र का कृष्ण-समीप आगमन तथा 'गोविन्द' अभिषेक का वर्णन
- ▪हरिवंश पुराण — विष्णु पर्व, अध्याय 17-19 (गोपों का उत्तर, इन्द्र का प्रकोप, इन्द्र द्वारा कृष्ण की स्तुति) — गोवर्धन-धारण लीला का विस्तृत वर्णन
- ▪गर्ग संहिता — गिरिराज-खण्ड (तृतीय स्कन्ध / कैण्टो 3), अध्याय 1 'श्रीगिरिराज-पूजनम्', अध्याय 2 'श्रीगिरिराज-महोत्सवः' एवं अध्याय 3 'गोवर्धन-धारणम्' — गोवर्धन-पूजा विधि का प्रामाणिक शास्त्रीय स्रोत
- ▪श्रीधर स्वामी कृत 'भावार्थ-दीपिका' टीका — श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध अध्याय 24-25 पर — गोवर्धन-यज्ञ एवं इन्द्र-गर्व-भङ्ग की पारम्परिक वैष्णव व्याख्या
- ▪गोवर्धन-पूजा (अन्नकूट) — कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को आयोजित उत्सव — विकिपीडिया सङ्ग्रह-लेख, शास्त्रीय एवं आधुनिक स्रोतों सहित
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
56-भोग की संख्या क्यों?▼
कृष्ण को बाल-काल में दिन में 8 बार भोजन। 7 दिन × 8 बार = 56 भोग गोवर्धन-धारण के दौरान न खा सके। फिर सब अर्पित।
गोवर्धन-परिक्रमा कब?▼
कार्तिक-पूर्णिमा से अमावस्या तक श्रेष्ठ। दीपावली-काल विशेष। 21 किमी, 5-7 घण्टे पैदल।
गोवर्धन-पूजा कब और किस तिथि को मनाई जाती है?▼
गोवर्धन-पूजा कार्तिक मास के शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सम्पन्न होती है, जो दीपावली-अमावस्या के ठीक अगले दिन आती है। यह सामान्यतः अक्टूबर के अन्त अथवा नवम्बर के प्रारम्भ में पड़ती है तथा स्थानीय पञ्चांग के अनुसार प्रातः-व्यापिनी प्रतिपदा को विशेष प्रशस्त माना जाता है।
अन्नकूट में छप्पन-भोग ही क्यों अर्पित किए जाते हैं?▼
मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन-धारण-काल में अन्न-जल नहीं ग्रहण किया था। प्रत्येक दिन के आठ प्रहर के आठ भोजनों की गणना करने पर सात × आठ = ५६ व्यञ्जन होते हैं, जिन्हें व्रजवासियों ने एक साथ अर्पित किया — यही छप्पन-भोग की परम्परा का मूल आधार है।
गोवर्धन-पर्वत वास्तव में कहाँ स्थित है?▼
गोवर्धन-पर्वत उत्तर-प्रदेश के मथुरा जनपद में, मथुरा से लगभग २२ किमी पश्चिम में अवस्थित है। यह आज लगभग ८० फीट ऊँचा एवं ८ किमी लम्बा बालू-पत्थर-निर्मित निम्न-गिरि है तथा सम्पूर्ण व्रज-यात्रा का प्रमुख तीर्थ-केन्द्र है, जहाँ श्रद्धालु २१ कोस की परिक्रमा करते हैं।
क्या गोवर्धन-पूजा घर पर बिना ब्राह्मण के की जा सकती है?▼
हाँ, गोवर्धन-पूजा गृह-स्थ पर्व है तथा प्रत्येक गृहस्थ इसे स्वयं सम्पन्न कर सकता है। गोबर से गोवर्धन-आकृति बनाकर, श्रीकृष्ण-मूर्ति स्थापित कर, षोडशोपचार-पूजन एवं अन्नकूट-नैवेद्य के साथ मूल-मन्त्र का जप करना सरल विधि है। ब्राह्मण-आचार्य की उपस्थिति वैकल्पिक है।
गोवर्धन-पूजा का मूल मन्त्र क्या है?▼
मूल मन्त्र है — 'गोवर्धनधराधार गोकुलत्राणकारक। विष्णोर्बाहु-कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥' इसका अर्थ है — 'हे गोवर्धन को धारण करने वाले, हे गोकुल की रक्षा करने वाले, विष्णु की बाहु से ऊँचे उठाए गए हे गिरिराज! मुझे करोड़ों गौओं का फल प्रदान करें।'
गोवर्धन-पूजा और बलि-प्रतिपदा में क्या सम्बन्ध है?▼
दोनों पर्व कार्तिक-शुक्ल-प्रतिपदा को ही सम्पन्न होते हैं किन्तु इनकी पौराणिक पृष्ठभूमि भिन्न है। गोवर्धन-पूजा श्रीकृष्ण द्वारा इन्द्र-गर्व-भङ्ग की स्मृति है, जबकि बलि-प्रतिपदा वामन-अवतार द्वारा राजा बलि को पाताल-राज्य प्रदान करने का स्मरण-दिवस है। महाराष्ट्र-गुजरात में बलि-पूजा प्रधान है, उत्तर-भारत में गोवर्धन-पूजा।
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सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।