लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम
पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ
✦ प्रकाशित: • समीक्षित:
✦ मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित ✦
मौनी-अमावस्या — माघ-अमावस्या। मौन-व्रत + पवित्र-स्नान। 2026 में 17 फरवरी (मंगलवार) — सूर्य-ग्रहण भी। महाकुम्भ-स्नान-तिथि।
"मौनी" = "मौन-धारक"। ऋषि-मुनियों का दिन। प्रयागराज-संगम पर करोड़ों श्रद्धालु।
मौनी अमावस्या माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को कही जाती है, जिसे शास्त्रों में 'माघी अमावस्या' भी कहा गया है। पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में माघ-माहात्म्य (अध्याय 121-129) में दत्तात्रेय जी द्वारा वर्णित है कि इस तिथि पर त्रिवेणी संगम अथवा किसी पवित्र नदी में स्नान, मौन-व्रत और विष्णु-पूजन करने से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। 'मौन' शब्द से ही 'मुनि' की उत्पत्ति मानी जाती है, और इस दिन इन्द्रिय-संयम सहित मौन धारण करने वाला साधक स्वयं मुनि-पद को प्राप्त करता है।
मनुस्मृति के प्रथम अध्याय (श्लोक 32-36) के अनुसार स्वायम्भुव मनु और शतरूपा का प्रादुर्भाव इसी तिथि पर हुआ था, इसलिए परम्परा इस अमावस्या को मानवजाति के आदि-पुरुष मनु के अवतरण-दिवस के रूप में स्मरण करती है। यही 'मौनी अमावस्या' का नाम भी इस मान्यता से जुड़ा है कि सृष्टि के आरम्भ में सर्वत्र मौन व्याप्त था। इसी कारण माघ-स्नान, पितृ-तर्पण, अन्न-दान और मौन-व्रत — इन चार अंगों का समुच्चय इस तिथि की मुख्य साधना मानी गई है।
✦ मौनी-अमावस्या 2026 — विशेष
अमावस्या प्रारम्भ: 16 फरवरी रात्रि 11 PM। समाप्त: 17 फरवरी रात्रि 9 PM।
सूर्य-ग्रहण भी इसी-दिन — दोगुना-पुण्य।
पवित्र-स्नान-समय: सूर्योदय से दोपहर 12 PM।
✦ विधि
मौन-व्रत: सूर्योदय से दोपहर 12 तक।
पवित्र-स्नान: गंगा/यमुना/संगम। तिल-मिश्रित जल।
तिल-तर्पण पितरों को।
दान: तिल, गुड़, वस्त्र, गाय।
मन-ही-मन गायत्री-मन्त्र, ॐ नमः शिवाय।
✦ पौराणिक उद्भव एवं माघ-माहात्म्य का सिद्धान्त
पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में दत्तात्रेय जी सौभरि मुनि को माघ-स्नान का माहात्म्य सुनाते हुए कहते हैं कि माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित रहने पर समस्त तीर्थ प्रयाग में निवास करते हैं। मौनी अमावस्या उस माघ-कल्प की पराकाष्ठा का दिन है — इस तिथि पर ब्रह्म-मुहूर्त में किया गया स्नान अश्वमेध-यज्ञ के तुल्य फल देता है। यही कारण है कि कुम्भ-पर्व में मौनी अमावस्या को 'अमृत-योग' अथवा 'मुख्य शाही-स्नान' कहा गया है।
मत्स्य पुराण के प्रयाग-माहात्म्य (अध्याय 102-112) में स्पष्ट उल्लेख है कि त्रिवेणी संगम पर मौनी अमावस्या को किया गया स्नान सप्त-जन्मों के संचित पापों का क्षय करता है। स्कन्द पुराण के काशी-खण्ड एवं प्रभास-खण्ड में भी यही विधि वर्णित है — स्नान से पूर्व संकल्प, फिर सूर्य को अर्घ्य, फिर तर्पण, और अन्त में दान। मौन-व्रत के विना यह स्नान अधूरा माना गया है।
मनुस्मृति के अनुसार स्वायम्भुव मनु की उत्पत्ति इसी दिन हुई, अतः सनातन परम्परा इस अमावस्या को मानव-सृष्टि का प्रारम्भ-दिवस मानती है। पुराण-वचन है — 'मौनेन प्राप्यते मुनित्वम्' — अर्थात् मौन से ही मुनि-पद प्राप्त होता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार इस दिन का मौन केवल वाक्-संयम नहीं, अपितु मन-वाणी-काया तीनों का संयम है।
✦ मौन-व्रत की शास्त्रीय विधि एवं स्तर
शास्त्रों में मौन-व्रत के तीन स्तर बताये गये हैं — काष्ठ-मौन, अकार-मौन और सुषुप्ति-मौन। काष्ठ-मौन में साधक सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त वाणी का पूर्णतः त्याग करता है; अकार-मौन में संकेत और लेखन से भी संवाद नहीं किया जाता; सुषुप्ति-मौन सर्वोच्च स्तर है जिसमें मन के संकल्प-विकल्प भी विरत होते हैं। गृहस्थ-साधक के लिये काष्ठ-मौन पर्याप्त माना गया है।
पद्म पुराण की विधि के अनुसार मौनी अमावस्या को साधक ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर 'मकर-स्थे रवौ माघे...' संकल्प का उच्चारण करता है, फिर पवित्र नदी अथवा कूप-जल से स्नान करता है। स्नान-काल में 'गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति...' मन्त्र का ध्यान आवश्यक है। स्नान के पश्चात् सूर्य को तीन अञ्जलि जल का अर्घ्य देकर मौन-व्रत का संकल्प लिया जाता है।
मौन-काल में साधक भगवद्-नाम का मानसिक जप, गीता-पाठ अथवा विष्णु-सहस्रनाम का स्मरण करता है। मौन का पारण सूर्यास्त के पश्चात् ब्राह्मण-भोजन एवं दान के बाद किया जाता है। यदि पूर्ण-दिन का मौन सम्भव न हो तो ब्रह्म-मुहूर्त से मध्याह्न पर्यन्त का मौन भी विधि-सम्मत माना गया है।
✦ पितृ-तर्पण एवं श्राद्ध-कर्म का विधान
गरुड़ पुराण के प्रेत-खण्ड (अध्याय 5-13) में अमावस्या तिथि को पितरों की प्रिय तिथि कहा गया है, क्योंकि इस दिन सूर्य-चन्द्र की एक राशि में स्थिति से पितृ-लोक तक तर्पण-जल का प्रवाह सुगम होता है। मौनी अमावस्या को किया गया तर्पण सामान्य अमावस्याओं की अपेक्षा सहस्र-गुणा फल देता है, क्योंकि माघ-मास स्वयं पितरों का प्रिय मास है।
तर्पण-विधि में दक्षिणाभिमुख होकर जनेऊ अपसव्य करना, कुश-तिल-जल से तीन पीढ़ी तक के पितरों — पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता, पितामही, प्रपितामही — का नाम-गोत्र-सहित तर्पण करना आवश्यक है। मातृ-पक्ष का तर्पण भी इसी क्रम में पृथक् किया जाता है। नाना-नानी एवं गुरु-तर्पण भी इसी दिन पुण्य-प्रद माना गया है।
श्राद्ध-कर्म में पिण्ड-दान तब आवश्यक होता है जब किसी पितर की मृत्यु-तिथि अज्ञात हो — ऐसे पितरों का वार्षिक श्राद्ध मौनी अमावस्या को ही सम्पन्न किया जाता है। ब्राह्मण-भोजन, गौ-ग्रास, श्वान-ग्रास, काक-बलि एवं चींटी के लिये पिपीलिकाहार — ये पञ्च-यज्ञ इस दिन अवश्य करने योग्य हैं।
✦ त्रिवेणी संगम एवं प्रमुख तीर्थ-स्नान-स्थल
मत्स्य पुराण के अनुसार माघ-स्नान का परम क्षेत्र प्रयाग का त्रिवेणी संगम है — जहाँ गङ्गा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मिलती हैं। मौनी अमावस्या को कुम्भ-पर्व में यहाँ का स्नान शाही-स्नान कहलाता है और इसका माहात्म्य अश्वमेध-यज्ञ के सहस्र-गुणा बताया गया है। प्रयाग के अतिरिक्त हरिद्वार का हर-की-पौड़ी, काशी का दशाश्वमेध घाट, नासिक का रामकुण्ड और उज्जैन का रामघाट — ये चार स्थल भी विशेष-पुण्य-प्रद हैं।
स्कन्द पुराण के काशी-खण्ड में वर्णित है कि जो साधक प्रयाग नहीं पहुँच सकता वह घर पर ही गङ्गा-जल मिलाकर स्नान करे और 'गङ्गा-गङ्गेति यो ब्रूयात्' मन्त्र का तीन बार उच्चारण करे — ऐसा करने से प्रयाग-स्नान का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। कूप-जल, जलाशय-जल अथवा वर्षा-जल — सभी इस मन्त्र-संस्कार से तीर्थ-तुल्य हो जाते हैं।
स्नान के समय 'मकर-स्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव' इस संकल्प-मन्त्र का उच्चारण अनिवार्य है। स्नान के पश्चात् सूर्य-अर्घ्य देकर 'ॐ सूर्याय नमः' का जप, फिर पीपल वृक्ष की सात-प्रदक्षिणा, और अन्त में अन्न-वस्त्र का दान — यह पञ्च-अङ्ग विधि सम्पूर्ण मौनी अमावस्या-कर्म का सार है।
✦ दान-धर्म एवं आहार-संयम के नियम
पद्म पुराण कहता है कि मौनी अमावस्या को किया गया दान अन्य दिनों की अपेक्षा कोटि-गुणा फल देता है। विशेष-दान-द्रव्य हैं — काले तिल, कम्बल, गर्म वस्त्र, अन्न (विशेषतः चावल और दाल), घृत, गुड़, स्वर्ण और गौ-दान। तिल-दान शनि-दोष एवं पितृ-दोष दोनों का परिहार करता है, अतः इसका विशेष महत्त्व है।
आहार-नियम में इस दिन सात्त्विक एकाहार ही ग्राह्य है। दिन-भर निराहार रहकर सूर्यास्त के पश्चात् हविष्यान्न — दूध, फल, साबूदाना, सेन्धव-नमक से बना भोजन — ग्रहण करना श्रेष्ठ है। तामसिक अन्न, मसूर, चना, मांस, मद्य, लहसुन और प्याज सर्वथा वर्जित हैं। ब्रह्मचर्य-पालन भी इस दिन अनिवार्य कहा गया है।
वस्त्र-दान एवं अन्न-दान के साथ-साथ 'गौ-ग्रास' — गाय को पहली रोटी देना — इस दिन का मुख्य पुण्य-कर्म है। यदि सामर्थ्य हो तो ब्राह्मण-दम्पति को भोजन कराकर दक्षिणा देना उत्तम है। दान-काल में 'इदं न मम' — 'यह मेरा नहीं है' — इस भावना से दान करना ही वास्तविक त्याग है।
📊मौनी अमावस्या के पञ्च-अङ्ग कर्म
| कर्म | विधि | शास्त्रीय प्रमाण | फल |
|---|---|---|---|
| स्नान | ब्रह्म-मुहूर्त में पवित्र जल से, संकल्प-मन्त्र-सहित | पद्म पुराण उत्तर खण्ड 121-129 | सप्त-जन्म-पाप-क्षय |
| मौन-व्रत | ब्रह्म-मुहूर्त से सूर्यास्त पर्यन्त वाक्-संयम | पद्म पुराण माघ-माहात्म्य | मुनि-पद की प्राप्ति |
| तर्पण | दक्षिणाभिमुख, अपसव्य, कुश-तिल-जल से | गरुड़ पुराण प्रेत-खण्ड 5-13 | पितृ-तृप्ति एवं पितृ-दोष-नाश |
| दान | तिल, अन्न, वस्त्र, स्वर्ण, गौ-दान | स्कन्द पुराण काशी-खण्ड | अश्वमेध-यज्ञ-तुल्य पुण्य |
| जप-पाठ | विष्णु-सहस्रनाम, गीता-पाठ, सूर्य-स्तुति | मत्स्य पुराण प्रयाग-माहात्म्य | मोक्ष-मार्ग-प्राप्ति |
⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें
✗ मौन-व्रत के समय क्रोध अथवा मानसिक अशान्ति में रहना
क्यों: शास्त्र कहते हैं कि केवल वाणी का संयम काष्ठ-मौन है — परम-मौन तो मन-वाणी-काया तीनों का संयम है। मानसिक उद्वेग के साथ रखा मौन निष्फल माना जाता है।
✓ सही उपाय: मौन-काल में भगवद्-नाम का मानसिक जप, गीता-पाठ अथवा विष्णु-सहस्रनाम का स्मरण करें। मन को साधना में स्थिर रखें।
✗ तर्पण के समय दिशा अथवा जनेऊ की स्थिति का ध्यान न रखना
क्यों: गरुड़ पुराण के अनुसार पितृ-कर्म में दक्षिणाभिमुख होना और जनेऊ अपसव्य (दायें कन्धे से बायीं कमर) करना अनिवार्य है। दिशा-दोष से तर्पण-जल पितरों तक नहीं पहुँचता।
✓ सही उपाय: तर्पण से पूर्व दक्षिण दिशा निश्चित करें, जनेऊ अपसव्य करें, कुश-तिल-जल से नाम-गोत्र-सहित क्रमशः पितृ-पक्ष एवं मातृ-पक्ष का तर्पण करें।
✗ मौनी अमावस्या को तामसिक भोजन अथवा मसूर-चना का सेवन
क्यों: व्रत-तिथि पर तामसिक एवं वर्जित अन्न का सेवन व्रत-भङ्ग माना जाता है। मसूर, चना, मांस, मद्य, लहसुन और प्याज शास्त्र-निषिद्ध हैं।
✓ सही उपाय: केवल सात्त्विक हविष्यान्न — दूध, फल, साबूदाना, सेन्धव-नमक का प्रयोग करें। सूर्यास्त के पश्चात् एकाहार ग्रहण करें।
✗ दान-कर्म को केवल औपचारिकता मानकर बिना भाव के सम्पन्न करना
क्यों: पद्म पुराण कहता है कि 'इदं न मम' — यह मेरा नहीं है — इस भावना के बिना दिया गया दान वास्तविक त्याग नहीं होता। भाव-रहित दान केवल वस्तु-विनिमय है।
✓ सही उपाय: दान-काल में संकल्प-मन्त्र पढ़ें, ग्राहक की चरण-स्पर्श करके दान दें, और 'इदं न मम' की भावना से अहंकार-रहित होकर त्याग करें।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
- ▪पद्म पुराण — उत्तर-खण्ड, माघ-माहात्म्य अध्याय 121-129 (माघ मास में अमावस्या-स्नान, मौन-व्रत एवं विष्णु-आराधना का फल; दत्तात्रेय-कथित माघ-स्नान महिमा)
- ▪पद्म पुराण (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण) — माघ-माहात्म्य प्रकरण, सम्पूर्ण पाठ जिसमें माघ-अमावस्या स्नान, तर्पण, दान एवं मौन-व्रत की विधि वर्णित है
- ▪मत्स्य पुराण — अध्याय 102-112 (प्रयाग-माहात्म्य एवं माघ-स्नान फल-वर्णन, संगम-स्नान से सप्त-जन्म पाप-नाश का प्रसंग)
- ▪स्कन्द पुराण — काशी-खण्ड एवं प्रभास-खण्ड, माघ-मास अमावस्या स्नान-दान विधि एवं मौन-व्रत द्वारा अश्वमेध-यज्ञ-तुल्य फल का वर्णन
- ▪मनुस्मृति — अध्याय 1, श्लोक 32-36 (स्वायम्भुव मनु एवं शतरूपा की उत्पत्ति-कथा, जिसके आधार पर मौनी अमावस्या को मनु-जन्मतिथि माना जाता है)
- ▪गरुड पुराण — प्रेत-खण्ड, अध्याय 5-13 (अमावस्या तिथि पर पितृ-तर्पण, पिण्ड-दान एवं श्राद्ध-कर्म से पितरों को मोक्ष-प्राप्ति का विधान)
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पूर्ण-मौन कठिन?▼
सूर्योदय से दोपहर 12 तक मौन। उसके बाद आवश्यक-बात। मौन-असम्भव हो — कम-बात + मधुर-वाणी।
मौनी अमावस्या और माघी अमावस्या में क्या अन्तर है?▼
दोनों एक ही तिथि के दो नाम हैं — माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या। 'माघी' नाम मास-वाचक है और 'मौनी' नाम इस दिन धारण किये जाने वाले मौन-व्रत से व्युत्पन्न है। पद्म पुराण इसे माघ-स्नान का सर्वोच्च दिवस कहता है।
क्या मौनी अमावस्या पर पूर्ण-दिन मौन रखना अनिवार्य है?▼
शास्त्र मौन के तीन स्तर बताते हैं। गृहस्थ-साधक के लिये ब्रह्म-मुहूर्त से मध्याह्न पर्यन्त वाणी-संयम पर्याप्त माना गया है। पूर्ण-दिन का काष्ठ-मौन सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु यदि सम्भव न हो तो अल्प-समय का मौन भी अनुग्रह-प्रद है।
मौनी अमावस्या पर कौन-कौन से दान विशेष फल-प्रद हैं?▼
काले तिल, कम्बल, गर्म वस्त्र, अन्न, घृत, गुड़, स्वर्ण और गौ-दान शास्त्र-सम्मत मुख्य दान हैं। तिल-दान पितृ-दोष एवं शनि-दोष दोनों का परिहार करता है। ब्राह्मण-भोजन एवं गौ-ग्रास भी इस दिन के अनिवार्य पुण्य-कर्म हैं।
यदि त्रिवेणी संगम न जा सकें तो क्या घर पर स्नान का फल मिलेगा?▼
स्कन्द पुराण के काशी-खण्ड के अनुसार घर पर भी गङ्गा-जल मिलाकर 'गङ्गे च यमुने चैव...' मन्त्र पढ़कर स्नान करने से प्रयाग-स्नान का पूर्ण फल प्राप्त होता है। मन्त्र-संस्कार से जल तीर्थ-तुल्य हो जाता है, और भाव-शुद्धि ही प्रधान है।
मौनी अमावस्या पर पितृ-तर्पण क्यों आवश्यक है?▼
गरुड़ पुराण के प्रेत-खण्ड के अनुसार अमावस्या तिथि पितरों को प्रिय है, और माघ-मास उनका विशेष-प्रिय मास है। इस संयोग पर तर्पण का फल सहस्र-गुणा होता है। अज्ञात-मृत्यु-तिथि वाले पितरों का वार्षिक श्राद्ध भी इसी दिन सम्पन्न किया जाता है।
क्या मौनी अमावस्या पर व्रत-पारण कब और कैसे करें?▼
व्रत-पारण सूर्यास्त के पश्चात् ब्राह्मण-भोजन एवं दान-सम्पादन के बाद किया जाता है। पारण में हविष्यान्न — दूध, फल, साबूदाना, सेन्धव-नमक से बना सात्त्विक भोजन — ग्रहण करना श्रेष्ठ है। तामसिक अन्न, मांस-मद्य सर्वथा वर्जित हैं।
🔗सम्बन्धित विषय
सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।