✦ श्री यन्त्र ✦
✦ यन्त्रराज — सर्वोच्च तान्त्रिक यन्त्र ✦
✦ श्री यन्त्र क्या है? ✦
श्री यन्त्र — जिसे "श्री चक्र" अथवा "यन्त्रराज" भी कहा जाता है — हिन्दू तन्त्र-शास्त्र का सर्वोच्च एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध यन्त्र है। यह त्रिपुर सुन्दरी (ललिता-राजराजेश्वरी) देवी का प्रतीक एवं उनकी सम्पूर्ण शक्ति का ज्यामितीय रूप है।
श्री यन्त्र की रचना ९ परस्पर-संगुम्फित त्रिकोणों से होती है — ४ ऊर्ध्व-मुखी (शिव) और ५ अधो-मुखी (शक्ति)। इन ९ त्रिकोणों के संयोग से कुल ४३ छोटे त्रिकोण बनते हैं, जो ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आदि शंकराचार्य ने "सौन्दर्य लहरी" में श्री यन्त्र का विस्तृत वर्णन किया है। इसकी पूजा से सर्व ऐश्वर्य, मोक्ष, ज्ञान एवं शक्ति की प्राप्ति होती है। श्री यन्त्र की उपासना ललिता सहस्रनाम, सौन्दर्य लहरी, श्री विद्या के साथ की जाती है।
✦ ज्यामितीय रचना ✦
केन्द्र में बिन्दु (परब्रह्म) → ९ संगुम्फित त्रिकोण (४ शिव + ५ शक्ति) → ४३ उप-त्रिकोण → ८ दल का कमल → १६ दल का कमल → तीन वृत्त → भूपुर (वर्गाकार चार द्वारों सहित)। प्रत्येक स्तर "आवरण" कहलाता है — कुल नौ आवरण, इसीलिए "नवावरण पूजा"। केन्द्र-बिन्दु ही "महाबिन्दु" है, जिसमें त्रिपुर सुन्दरी विराजमान हैं।
✦ अधिष्ठात्री देवता ✦
त्रिपुर सुन्दरी (ललिता-राजराजेश्वरी) — दश-महाविद्याओं में तीसरी, और श्री विद्या परम्परा की मूल देवी। शिव की अर्धांगिनी एवं ब्रह्माण्ड की प्रकटित शक्ति।
✦ मन्त्र ✦
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्रीमात्रे नमः
Om Aim Hreem Shreem Shrimatre Namah
अर्थ: श्री ललिता त्रिपुर सुन्दरी को नमन — ज्ञान, मोक्ष, ऐश्वर्य की देवी।
अनुशंसित जप: 108 बार
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं — पञ्चदशी मन्त्र
Om Aim Hreem Shreem (Panchadashi) — Ka E Ee La Hreem · Ha Sa Ka Ha La Hreem · Sa Ka La Hreem
अर्थ: पञ्चदशाक्षरी श्री विद्या मन्त्र — श्री यन्त्र की मूल साधना का मन्त्र। दीक्षा-गुरु से प्राप्त करना अनिवार्य।
✦ लाभ एवं फल ✦
✦ स्थापना नियम ✦
सामग्री
स्वर्ण (श्रेष्ठतम), रजत, स्फटिक, ताम्र, अथवा भूर्ज पत्र पर अष्टगन्ध से लेखित। आधुनिक काल में मन्त्र-सिद्ध श्री चक्र पीठ भी प्रयुक्त होता है।
दिशा
पूजन-गृह में पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)। साधक का मुख पूर्व अथवा उत्तर की ओर हो।
मुहूर्त
शुक्रवार, पूर्णिमा, नवरात्रि, ललिता जयन्ती (माघ पूर्णिमा), अक्षय तृतीया, दीवाली। शुभ मुहूर्त में स्थापना करें।