हिन्दू पर्व-पञ्चांग — मास-दर-मास परिचय

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हिन्दू पर्व-पञ्चांग — मास-दर-मास परिचय

हिन्दू चान्द्र-सौर पञ्चांग के बारह मासों का परिचय — चैत्र से फाल्गुन तक — एवं प्रत्येक मास के प्रमुख पर्व, व्रत, अनुष्ठान — उनके शास्त्रीय विषयों एवं ऋतुगत तर्क के साथ।

2026-05-02

लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम

पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ

✦ प्रकाशित: समीक्षित:

मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित

हिन्दू चान्द्र-सौर पञ्चांग वर्ष को बारह नामित मासों में संगठित करता है — प्रत्येक एक विशिष्ट निरयण नक्षत्र की पूर्णिमा से बँधा। प्रत्येक मास का अपना पर्व-समूह — कुछ पौराणिक घटनाओं को मनाते, कुछ कृषि-सन्धियों को चिह्नित करते, कुछ ऋषि-गुरुओं का स्मरण, कुछ पितृ-कर्म करते। यह मास-दर-मास परिचय वर्ष की लय का प्रथम परिचय देता है।

तिथियों के विषय में: हिन्दू पञ्चांग चान्द्र-सौर है — अतः वही पर्व प्रत्येक वर्ष भिन्न ग्रेगोरियन (अंग्रेज़ी) तिथियों पर पड़ता है। सामान्य वर्षों में खिसकाव ±10 दिन; अधिक मास वाले वर्षों में ±18 दिन।

चैत्र (मार्च-अप्रैल)

अधिकांश क्षेत्रीय परम्पराओं में चैत्र हिन्दू नववर्ष खोलता है। शास्त्रीय तर्क: इस मास में बसन्त-विषुव होता है — एवं सूर्य मेष संक्रान्ति पर "नया प्रारम्भ" करता है।

प्रमुख अनुष्ठान: - गुड़ी पाड़वा / उगादि (शुक्ल 1) — महाराष्ट्र, आन्ध्र, कर्नाटक में नववर्ष। - चैत्र नवरात्रि (शुक्ल 1-9) — देवी की नौ-रात्रि उपासना — राम नवमी पर समाप्ति। - राम नवमी (शुक्ल 9) — भगवान राम का जन्म। - हनुमान जयन्ती (पूर्णिमा) — हनुमान का जन्म।

विषय: नवीनीकरण, नये प्रारम्भ, वर्षा का प्रथम संकेत।

वैशाख (अप्रैल-मई)

वैशाख अधिकांश भारत में उच्च-ग्रीष्म लाता है। वर्षा से पूर्व अनेक विवाह-मुहूर्त इस मास में।

प्रमुख अनुष्ठान: - अक्षय तृतीया (शुक्ल 3) — चार "स्वयं-प्रकाशित" तिथियों में से एक — मुहूर्त-शुद्धि की आवश्यकता नहीं; नये उपक्रमों, स्वर्ण-क्रय हेतु शुभ। - आदि शंकराचार्य जयन्ती (शुक्ल 5) - बुद्ध पूर्णिमा / वैशाखी पूर्णिमा (पूर्णिमा) — बुद्ध का जन्म, ज्ञान-प्राप्ति एवं महापरिनिर्वाण (परम्परा अनुसार सब एक ही तिथि को)। - वैशाखी (13/14 अप्रैल) — पंजाब एवं अन्य अनेक क्षेत्रों में सौर नववर्ष।

विषय: नये कार्यों की स्थापना, मानसून से पूर्व का तप्त ग्रीष्म।

ज्येष्ठ (मई-जून)

वर्षा से पूर्व सबसे तप्त मास। अनेक पर्व जल, पितर एवं पारिवारिक बन्धनों पर केन्द्रित।

प्रमुख अनुष्ठान: - वट सावित्री व्रत (कृष्ण अमावस्या) — विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु हेतु व्रत; वटवृक्ष पूजा। - गंगा दशहरा (शुक्ल 10) — गंगा का स्वर्ग से अवतरण। - निर्जला एकादशी (शुक्ल 11) — समस्त एकादशियों में सर्वाधिक कठोर — 24 घंटे जल-रहित उपवास; समस्त 24 एकादशियों का संयुक्त पुण्य देने वाली कही जाती है।

विषय: शीतलन, जल, परिवार हेतु त्याग।

आषाढ़ (जून-जुलाई)

मानसून का आगमन। जिस दिन विष्णु "सोते" हैं (देवशयनी एकादशी) — चार-मास *चातुर्मास* — मानसून-काल की तपस्याओं — का प्रारम्भ।

प्रमुख अनुष्ठान: - देवशयनी एकादशी (शुक्ल 11) — विष्णु की ब्रह्माण्डीय निद्रा प्रारम्भ। - गुरु पूर्णिमा (पूर्णिमा) — गुरुओं को आदर; व्यास-पूजा के निकटतम पूर्णिमा। - रथ यात्रा (पुरी) — भगवान जगन्नाथ का रथ-पर्व।

विषय: वर्षा, एकान्तवास, गुरु-शिष्य बन्धन।

श्रावण (जुलाई-अगस्त)

शैवों के लिए सर्वाधिक धार्मिक रूप से सघन मास। श्रावण के सोमवार (*श्रावण सोमवार*) शिव-पूजा को समर्पित; पूरा मास एक दीर्घ तप।

प्रमुख अनुष्ठान: - हरियाली तीज (शुक्ल 3) — मानसून मनाती स्त्री-पर्व; गीत एवं झूले। - नाग पञ्चमी (शुक्ल 5) — सर्प-देवताओं की पूजा। - रक्षा बन्धन / श्रावणी पूर्णिमा (पूर्णिमा) — बहन-भाई पर्व; *राखी* बाँधना। - समस्त सोमवार — शिव उपवास एवं अभिषेकम्।

विषय: मानसून हरीतिमा, पारिवारिक बन्धन, शिव-भक्ति।

भाद्रपद (अगस्त-सितम्बर)

पर्व-समृद्ध मास — मानसून के अन्त तक फैला। गणेश चतुर्थी से खुलता; पितृ पक्ष से बन्द होता।

प्रमुख अनुष्ठान: - हरितालिका तीज (शुक्ल 3) — दाम्पत्य कल्याण हेतु स्त्री-व्रत। - गणेश चतुर्थी (शुक्ल 4) — गणेश का जन्म; 10-दिवसीय गणपति पर्व का प्रारम्भ। - कृष्ण जन्माष्टमी (कृष्ण 8) — भगवान कृष्ण का जन्म। - ओणम (मध्य-मास, थिरुवोणम् नक्षत्र से निश्चित) — केरल का फसल-पर्व। - अनन्त चतुर्दशी (शुक्ल 14) — गणपति पर्व की समाप्ति; रक्षा हेतु 14-गाँठ धागा। - पितृ पक्ष (कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या, अन्तिम 16 दिन) — दैनिक पितृ-कर्म।

विषय: देवों का जन्म, वर्ष की प्रथम फसल, पितृ-स्मरण।

आश्विन (सितम्बर-अक्टूबर)

शरद-विषुव मास। पितृ पक्ष बन्द; शरद नवरात्रि खुलती।

प्रमुख अनुष्ठान: - पितृ पक्ष अमावस्या / महालय (कृष्ण अमावस्या) — अन्तिम पितृ-कर्म। - शरद नवरात्रि (शुक्ल 1-9) — नौ-रात्रि देवी उपासना। - विजयादशमी / दशहरा (शुक्ल 10) — रावण पर राम की विजय एवं महिषासुर पर दुर्गा की।

विषय: सन्तुलन, वर्ष का परिवर्तन-बिन्दु, असुरिक पर दिव्य की विजय।

कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर)

प्रकाश-पर्व मास। भारत के अधिकांश भागों में पञ्चांग का सर्वाधिक मनाया जाने वाला मास।

प्रमुख अनुष्ठान: - करवा चौथ (कृष्ण 4) — विवाहित स्त्रियों का पति की दीर्घायु हेतु व्रत। - धनतेरस (कृष्ण 13) — धन्वन्तरि एवं गृह-धन की पूजा। - दिवाली / लक्ष्मी पूजा (कृष्ण अमावस्या) — प्रकाश-पर्व; लक्ष्मी की उपासना। - गोवर्धन पूजा (शुक्ल 1) — कृष्ण द्वारा गोवर्धन-उठाना। - भाई दूज (शुक्ल 2) — बहन-भाई पर्व। - देवुठनी एकादशी (शुक्ल 11) — विष्णु ब्रह्माण्डीय निद्रा से जागते हैं; चातुर्मास समाप्त; विवाह पुनरारम्भ। - तुलसी विवाह (शुक्ल 12) — तुलसी एवं विष्णु का विवाह। - कार्तिक पूर्णिमा / देव दिवाली — वाराणसी में देवों का प्रकाश-पर्व।

विषय: प्रकाश, समृद्धि, वर्षा-पश्चात् क्रिया का पुनरारम्भ।

मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर)

कृष्ण भगवद्गीता में मार्गशीर्ष को "मासों में श्रेष्ठ" कहते हैं। परम्परा इसे तीव्र भक्ति से जोड़ती है।

प्रमुख अनुष्ठान: - विवाह पञ्चमी (शुक्ल 5) — सीता एवं राम का विवाह (मिथिला परम्परा)। - गीता जयन्ती (शुक्ल 11) — भगवद्गीता के पाठ की वर्षगाँठ। - दत्तात्रेय जयन्ती (पूर्णिमा)

विषय: गहरी भक्ति, शीत मासों की अन्तर्मुखता।

पौष (दिसम्बर-जनवरी)

सबसे शीत मास। क्रियाएँ अन्तर्मुखी होती हैं — अध्ययन, तप, सूर्य-भक्ति की ओर।

प्रमुख अनुष्ठान: - पौष पूर्णिमा — सूर्य-पूजा हेतु शुभ; प्रयागराज में माघ मेले का प्रारम्भ। - मकर संक्रान्ति / पोंगल (लगभग 14 जनवरी) — सूर्य मकर में प्रवेश; उत्तरायण प्रारम्भ; भारत भर में फसल-पर्व।

विषय: सूर्य का उत्तरायण, शीत का अन्तर्हृदय।

माघ (जनवरी-फरवरी)

माघ मेला शिखर पर; वसन्त पञ्चमी बसन्त के आगमन की घोषणा।

प्रमुख अनुष्ठान: - मौनी अमावस्या — मौन का दिन; प्रयागराज में सामूहिक स्नान। - वसन्त पञ्चमी / सरस्वती पूजा (शुक्ल 5) — बसन्त की घोषणा; सरस्वती की पूजा; शिक्षारम्भ एवं नई पुस्तकों के लिए शुभ। - भीष्म अष्टमी (शुक्ल 8) — उत्तरायण पर भीष्म का देहत्याग। - माघ पूर्णिमा — माघ मेले का अन्तिम स्नान।

विषय: बसन्त की प्रथम घोषणा, विद्या, पितृ-पुण्य।

फाल्गुन (फरवरी-मार्च)

वर्ष सबसे प्रबल पर्व — होली — से बन्द होता है। फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष के पुराने का प्रतीकात्मक दहन चिह्नित करती है।

प्रमुख अनुष्ठान: - महा शिवरात्रि (कृष्ण 14) — "शिव की महान रात्रि"; रात्रि-भर जागरण एवं उपासना। - होलाष्टक (शुक्ल 8 से) — होली से पूर्व आठ दिन — कोई शुभ कार्य नहीं। - होलिका दहन / छोटी होली (फाल्गुन पूर्णिमा) — होलिका के दहन की स्मृति में अग्नि। - होली / धुलेटी (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) — रंगों का पर्व।

विषय: वर्ष का प्रतीकात्मक दहन एवं नवीनीकरण; अगले चैत्र चक्र खोलने से पूर्व सबसे प्रबल उत्सव।

क्षेत्रीय भिन्नता पर अन्तिम टिप्पणी

यह परिचय सर्वाधिक व्यापक पैन-भारतीय सम्मेलन का अनुसरण करता है। क्षेत्रीय परम्पराएँ महत्वपूर्ण स्थानीय पर्व जोड़ती हैं: ओणम (केरल) वहाँ भाद्रपद को बाँधता है; पोंगल (तमिलनाडु) मकर संक्रान्ति का स्थान लेता है; दुर्गा पूजा (बंगाल) पूर्वी भारत में प्रबल शरद-पर्व — शरद नवरात्रि के बल को विस्थापित करती। तिथि-निर्धारण-सम्मेलनों (सूर्योदय-आधारित बनाम मध्यरात्रि-आधारित; अमान्त बनाम पूर्णिमान्त) में अन्तर के कारण अनेक पर्व क्षेत्रों के बीच ±1 दिन भिन्न होते हैं। सन्देह में परिवार के मूल क्षेत्र का स्थानीय पञ्चांग आधिकारिक सन्दर्भ है।

📝सम्पादकीय टिप्पणी

इस लेख की रचना हमारी सम्पादकीय टीम ने मूल संस्कृत ज्योतिष ग्रन्थों — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, मुहूर्त चिन्तामणि, सूर्य सिद्धान्त — से प्रत्यक्ष अध्ययन के पश्चात् की है। हमने आधुनिक खगोलीय गणनाओं से इन सिद्धान्तों का सत्यापन भी किया है। यदि आपको कोई त्रुटि मिले अथवा कोई सुझाव हो तो कृपया हमें muhuratchoghadiya@gmail.com पर ईमेल करें। हम आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।

सत्यापन स्रोत: Wikipedia: Hindu CalendarPanchangamSurya SiddhantaLahiri Ayanamsa

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिन्दू पञ्चांग चैत्र से क्यों आरम्भ होता है, जनवरी से क्यों नहीं?

अधिकांश क्षेत्रीय परम्पराएँ चैत्र शुक्ल 1 को वर्ष आरम्भ करती हैं — क्योंकि वह तिथि बसन्त-विषुव के निकट पड़ती है — जब सूर्य मेष संक्रान्ति पर "नया प्रारम्भ" करता है। ग्रेगोरियन 1 जनवरी का कोई खगोलीय महत्व नहीं — यह रोमन कैलेंडर सुधारों से निर्धारित। कुछ हिन्दू परम्पराएँ अन्यत्र आरम्भ करती हैं: बंगाली पञ्चांग पोहेला बोइशाख (मध्य-अप्रैल), तमिल पञ्चांग पुथन्दु (मध्य-अप्रैल) पर।

कुछ पर्व जैसे ओणम तिथि के स्थान पर नक्षत्र से क्यों निश्चित होते हैं?

कुछ क्षेत्रीय पर्व — सर्वाधिक प्रसिद्ध केरल का ओणम (थिरुवोणम् नक्षत्र) एवं विषु — तिथियों के स्थान पर नक्षत्रों से बँधते हैं। तर्क क्षेत्रीय एवं ऐतिहासिक: ये पर्व व्यापक पैन-भारतीय तिथि-आधारित लिटर्जिकल पञ्चांग से पहले के अथवा बाहर के — एवं उनकी स्थानीय परम्पराओं ने पुराने नक्षत्र-केन्द्रित सम्मेलन को बनाये रखा। दोनों विधियाँ खगोलीय रूप से वैध; नक्षत्र-केन्द्रण केवल चन्द्र की कला के स्थान पर तारा-स्थिति पर बल देता है।

मैं किसी भी वर्ष में किसी भी पर्व की सटीक तिथि कैसे ज्ञात करूँ?

किसी भी तिथि-केन्द्रित पर्व हेतु: (1) मास-तिथि-पक्ष संयोजन की पहचान करें (जैसे दिवाली = कार्तिक कृष्ण अमावस्या), (2) इच्छित वर्ष में उस तिथि का अपने स्थानीय सूर्योदय-ढाँचे में आगमन गणना करें। ओणम जैसे नक्षत्र-केन्द्रित पर्वों हेतु — नक्षत्र की पहचान करें एवं चन्द्र के उसमें प्रवेश की गणना करें। एक विश्वसनीय पञ्चांग अथवा खगोलीय ऐप ये गणनाएँ स्वचालित रूप से करेगा। बहु-दिवसीय पर्वों हेतु — क्षेत्रीय सम्मेलन कभी-कभी एक ही खगोलीय घटना को लगातार दो तिथियों पर फैलाते हैं — सटीक स्थानीय समय आवश्यक हो तो — सदैव क्षेत्रीय पञ्चांग से पुष्टि करें।

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