हिन्दू परम्परा में सौर बनाम चान्द्र कैलेंडर — अधिक मास एवं क्षय मास

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हिन्दू परम्परा में सौर बनाम चान्द्र कैलेंडर — अधिक मास एवं क्षय मास

हिन्दू चान्द्र-सौर कैलेंडर 354-दिवसीय चन्द्र वर्ष को 365-दिवसीय सौर वर्ष से कैसे समायोजित करता है — अधिक मास (अधिमास) एवं दुर्लभ क्षय मास (हीन मास) के माध्यम से।

2026-05-01

लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम

पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ

✦ प्रकाशित: समीक्षित:

मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित

अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं को कठोर चन्द्र कैलेंडर (मास चन्द्र-अनुसार, परन्तु वर्ष ऋतुओं में खिसकता) एवं कठोर सौर कैलेंडर (वर्ष ऋतुओं से बँधा, परन्तु चन्द्र-अवस्थाएँ दिनों में खिसकती) के बीच चुनना पड़ा। हिन्दू परम्परा ने न तो यह न वह — एक *चान्द्र-सौर* प्रणाली रची, जो मासों को चन्द्र से एवं वर्ष को सूर्य से बाँधती है, एक सुरुचिपूर्ण सुधार-यन्त्र के साथ: *अधिक मास*। और दुर्लभ — कुछ वर्षों में उस सुधार को *क्षय मास* से सन्तुलित किया जाता है। यह लेख दोनों के परस्पर सम्बन्ध को समझाता है।

अन्तर्निहित गणनाएँ

  • **सिनोडिक (चन्द्र) मास** (अमावस्या से अमावस्या) ≈ 29.531 सौर दिन।
  • **उष्णकटिबन्धीय वर्ष** (ऋतुओं का एक पूर्ण चक्र) ≈ 365.242 सौर दिन।
  • **12 चन्द्र मास** ≈ 354.367 दिन।

अतः चन्द्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 10.875 दिन कम। बिना सुधार के मात्र तीन वर्षों में चन्द्र मास एक मास पीछे खिसक जायेंगे — होली (बसन्त) सर्दी में आ जायेगी, दिवाली (शरद) देर-गर्मी में।

सौर वर्ष — सौर मास

सौर कैलेंडर सूर्य की 12 निरयण राशियों में यात्रा को ट्रैक करता है। प्रत्येक राशि-प्रवेश (*संक्रान्ति*) सौर मास का आरम्भ: - सूर्य मेष में → मेष संक्रान्ति, अनेक परम्पराओं में सौर वर्ष का आरम्भ। - सूर्य कर्क में → कर्क संक्रान्ति / दक्षिणायन। - सूर्य मकर में → मकर संक्रान्ति / उत्तरायण।

पृथ्वी की कक्षा दीर्घवृत्तीय होने से सूर्य की प्रत्यक्ष गति बदलती है: सौर मास धनु (दिसम्बर) में 29.45 दिन, मिथुन (जून) में 31.46 दिन तक। 12 सौर मास मिलकर ठीक एक उष्णकटिबन्धीय-निरयण वर्ष (~365.25 दिन)।

चन्द्र वर्ष — चन्द्र मास

चन्द्र कैलेंडर चन्द्रमा की कला-चक्र को ट्रैक करता है। प्रत्येक चन्द्र मास: - *अमान्त* सम्मेलन (दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात): एक अमावस्या से अगली तक। - *पूर्णिमान्त* सम्मेलन (उत्तर भारत, नेपाल): एक पूर्णिमा से अगली तक।

दोनों तिथियों को समान अंकित करते हैं; केवल मास-नाम-सीमा भिन्न। 12 चन्द्र मास का चन्द्र वर्ष ~354.36 दिन।

अधिक मास का नियम

शास्त्रीय नियम (*सूर्य सिद्धान्त* से, *धर्मसिन्धु* में संहिताबद्ध): एक चन्द्र मास *अधिक* घोषित होता है यदि उसमें कोई *संक्रान्ति* न हो — अर्थात् पूरे चन्द्र मास तक सूर्य एक ही निरयण राशि में रहे।

यह सामान्यतः प्रत्येक 32-33 चन्द्र मासों में, अथवा लगभग प्रत्येक 2.7 सौर वर्षों में, एक बार होता है। अधिक मास उसी चन्द्र मास का नाम लेता है जिसका वह दोहराव है: जैसे 2023 में *अधिक श्रावण* — जिसके बाद नियमित श्रावण आया।

दोहराये गये मास को कुछ उत्तर भारतीय परम्पराओं में *मला मास* ("मलिन मास") भी कहते हैं — क्योंकि उसमें कोई पर्व नहीं होते (वे नियमित *निज* मास के अनुसार चलते हैं)। इसे *पुरुषोत्तम मास* भी कहा जाता है — भगवान विष्णु को समर्पित एवं पवित्र। भक्त इसे अतिरिक्त व्रत, दान एवं तीर्थयात्रा का अवसर मानते हैं।

दुर्लभ क्षय मास

विपरीत स्थिति भी सम्भव है: एक ही चन्द्र मास में *दो* संक्रान्तियाँ — अर्थात् सूर्य उस मास में दो बार राशि बदले। शास्त्रीय नियम तब उस मास को *क्षय मास* (न्यून मास) घोषित करता है — कैलेंडर से उसका नाम हटा दिया जाता है।

क्षय मास अत्यन्त दुर्लभ — गणना-सम्मेलन के अनुसार लगभग प्रत्येक 19 से 141 वर्षों में एक बार। ये इसलिए होते हैं क्योंकि अप्सीलिओन के निकट (पृथ्वी सूर्य से सर्वाधिक दूर, लगभग जुलाई) पृथ्वी धीमी चलती है एवं सौर मास लम्बे होते हैं, जबकि पेरिहेलियन के निकट (पृथ्वी सर्वाधिक निकट, लगभग जनवरी) पृथ्वी तेज़ चलती है एवं सौर मास छोटे होते हैं। यदि कोई चन्द्र मास पूर्णतया तेज़-सूर्य काल में पड़े — तब उसमें दो संक्रान्तियाँ सम्भव।

जब क्षय मास हो — उसी वर्ष एक अधिक मास भी जोड़ा जाता है (कभी पहले, कभी बाद में) ताकि दीर्घकालिक चन्द्र-सौर खिसकाव सीमित रहे। इस संयोजन को *अधिक-क्षय युग* कहते हैं — एवं यह उस वर्ष के पर्व-समय को जटिल बनाता है। अधिकांश समुदाय यह नियम मानते हैं कि लुप्त मास के पर्व पूर्ववर्ती अथवा अनुवर्ती मास में मनाये जायें — क्षेत्रीय भिन्नताओं के साथ।

आज यह क्यों मायने रखता है

इन सब समायोजनों के पश्चात् भी चान्द्र-सौर कैलेंडर सौर वर्ष के सापेक्ष ~30-दिन की पट्टी में रहता है। इस सुरुचिपूर्णता का मूल्य: - पर्व की सटीक अंग्रेज़ी तारीख प्रतिवर्ष भिन्न (अक्सर ±10 दिन, कभी ±20)। - अधिक मास वाले वर्षों में "दूसरा श्रावण" अथवा "दूसरा भाद्रपद" आता है — अनेक लोग भ्रमित होते हैं कि वर्ष के मुख्य पर्व किसमें मनेंगे (*निज* मास में, अधिक में नहीं)। - निज मास में आरम्भ किए गये व्यक्तिगत व्रत सामान्यतः अनुवर्ती निज में पूर्ण होते हैं — अधिक मास का प्रवेश बहु-मासीय व्रत को नहीं तोड़ता।

अधिक एवं क्षय मास को समझना — हिन्दू कैलेंडर को "खिसकती" जिज्ञासा से उसका वास्तविक स्वरूप दिखाता है: संसार की सर्वाधिक सुविचारित काल-गणना प्रणालियों में से एक — चन्द्र की सुन्दरता का सम्मान करते हुए सूर्य का अनुशासन न खोनेवाली।

📝सम्पादकीय टिप्पणी

इस लेख की रचना हमारी सम्पादकीय टीम ने मूल संस्कृत ज्योतिष ग्रन्थों — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, मुहूर्त चिन्तामणि, सूर्य सिद्धान्त — से प्रत्यक्ष अध्ययन के पश्चात् की है। हमने आधुनिक खगोलीय गणनाओं से इन सिद्धान्तों का सत्यापन भी किया है। यदि आपको कोई त्रुटि मिले अथवा कोई सुझाव हो तो कृपया हमें muhuratchoghadiya@gmail.com पर ईमेल करें। हम आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।

सत्यापन स्रोत: Wikipedia: Hindu CalendarPanchangamSurya SiddhantaLahiri Ayanamsa

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अधिक मास कितनी बार आता है?

लगभग प्रत्येक 32-33 चन्द्र मासों में — अर्थात् प्रत्येक लगभग 2.7 सौर वर्षों में एक बार। सटीक आगमन चन्द्र मासों एवं निरयण सौर संक्रान्तियों के संरेखण पर निर्भर है।

पर्व अधिक मास में मनाये जाते हैं या निज मास में?

निज (नियमित) मास में। अधिक (दोहराया) मास अधिकांश परम्पराओं में पर्व-रहित होता है — बल्कि उसे पुरुषोत्तम मास के रूप में अतिरिक्त व्रत, दान एवं भगवान विष्णु को समर्पित भजन हेतु मनाया जाता है।

अधिक मास एवं क्षय मास में क्या अन्तर है?

अधिक मास — अतिरिक्त (दोहराया) चन्द्र मास, तब जोड़ा जाता है जब सूर्य पूरे चन्द्र मास तक एक ही निरयण राशि में रहे — सामान्य, लगभग प्रत्येक 3 वर्ष में। क्षय मास — हटाया गया मास, तब घोषित होता है जब एक ही चन्द्र मास में दो संक्रान्तियाँ हों — दुर्लभ, प्रत्येक 19-141 वर्ष में। कैलेंडर सन्तुलन हेतु ये कभी एक ही वर्ष में आते हैं।

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