लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम
पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ
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✦ मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित ✦
मौनी-अमावस्या — माघ-अमावस्या। मौन-व्रत + पवित्र-स्नान। 2026 में 17 फरवरी (मंगलवार) — सूर्य-ग्रहण भी। महाकुम्भ-स्नान-तिथि।
"मौनी" = "मौन-धारक"। ऋषि-मुनियों का दिन। प्रयागराज-संगम पर करोड़ों श्रद्धालु।
मौनी अमावस्या माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को कही जाती है, जिसे शास्त्रों में 'माघी अमावस्या' भी कहा गया है। पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में माघ-माहात्म्य (अध्याय 121-129) में दत्तात्रेय जी द्वारा वर्णित है कि इस तिथि पर त्रिवेणी संगम अथवा किसी पवित्र नदी में स्नान, मौन-व्रत और विष्णु-पूजन करने से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। 'मौन' शब्द से ही 'मुनि' की उत्पत्ति मानी जाती है, और इस दिन इन्द्रिय-संयम सहित मौन धारण करने वाला साधक स्वयं मुनि-पद को प्राप्त करता है।
मनुस्मृति के प्रथम अध्याय (श्लोक 32-36) के अनुसार स्वायम्भुव मनु और शतरूपा का प्रादुर्भाव इसी तिथि पर हुआ था, इसलिए परम्परा इस अमावस्या को मानवजाति के आदि-पुरुष मनु के अवतरण-दिवस के रूप में स्मरण करती है। यही 'मौनी अमावस्या' का नाम भी इस मान्यता से जुड़ा है कि सृष्टि के आरम्भ में सर्वत्र मौन व्याप्त था। इसी कारण माघ-स्नान, पितृ-तर्पण, अन्न-दान और मौन-व्रत — इन चार अंगों का समुच्चय इस तिथि की मुख्य साधना मानी गई है।
माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है, और इसका नाम ही अपने आप में एक साधना का संकेत है। ‘मौन’ यानी चुप्पी, और ‘अमावस्या’ यानी वह रात जब चंद्रमा का प्रकाश पूरी तरह लुप्त हो जाता है। जब हमारी दादी कहती थीं कि ‘बेटा, इस दिन कम-से-कम स्नान से पहले एक शब्द भी मुँह से न निकले’, तब वे केवल परंपरा नहीं दोहरा रही थीं — वे एक गहरे शास्त्रीय रहस्य की ओर इशारा कर रही थीं। माना जाता है कि इसी तिथि पर मनु, जो मनुष्य-जाति के आदि पुरुष थे, का जन्म हुआ, और इसीलिए ‘मनु’ शब्द से ही ‘मौनी’ बना।
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर प्रयागराज में जब माघ का कल्पवास चलता है, तो मौनी अमावस्या उसका सबसे बड़ा स्नान-पर्व बन जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन त्रिवेणी का जल अमृत-तुल्य हो जाता है। करोड़ों लोग रात के तीसरे प्रहर से ही घाटों की ओर बढ़ने लगते हैं, और प्रशासन तक इस दिन की भीड़ का हिसाब अलग से रखता है। कुम्भ या अर्ध-कुम्भ के वर्षों में तो यह पर्व ‘अमृत स्नान’ या ‘शाही स्नान’ के नाम से अखाड़ों की संगठित यात्रा का दिन बन जाता है।
लेकिन मौनी अमावस्या केवल स्नान का दिन नहीं है। यह आत्म-संवाद का दिन है। दिन-भर बोलना बंद, मन को साक्षी-भाव में रखना, और जब-जब विचार उठें, तब-तब ‘ॐ नमो नारायणाय’ या गायत्री का मानसिक जप — यही इस तिथि की असली पूँजी है। कई गृहस्थ लोग पूरा मौन नहीं रख पाते; तो आचार्य कहते हैं कि ‘कम-से-कम सूर्योदय से दोपहर तक चुप रहो, यह भी पर्याप्त है’। मतलब, यह पर्व लचीला है, पर इसका केंद्र-बिन्दु एक ही है — वाणी का संयम।
आधुनिक जीवन में जब WhatsApp, मीटिंग्स और चौबीसों घंटे की बातचीत हमारी ऊर्जा खा रही है, तब मौनी अमावस्या एक प्रकार का ‘प्राचीन डिजिटल-डिटॉक्स’ बन गई है। बहुत-से युवा अब इस दिन फ़ोन भी स्विच-ऑफ़ रखते हैं। और यही तो शास्त्रकारों का मन्तव्य था — चाहे माध्यम कुछ भी हो, इन्द्रियों को एक दिन विश्राम मिले, ताकि आत्मा अपनी आवाज़ सुन सके।
✦ मौनी-अमावस्या 2026 — विशेष
अमावस्या प्रारम्भ: 16 फरवरी रात्रि 11 PM। समाप्त: 17 फरवरी रात्रि 9 PM।
सूर्य-ग्रहण भी इसी-दिन — दोगुना-पुण्य।
पवित्र-स्नान-समय: सूर्योदय से दोपहर 12 PM।
✦ विधि
मौन-व्रत: सूर्योदय से दोपहर 12 तक।
पवित्र-स्नान: गंगा/यमुना/संगम। तिल-मिश्रित जल।
तिल-तर्पण पितरों को।
दान: तिल, गुड़, वस्त्र, गाय।
मन-ही-मन गायत्री-मन्त्र, ॐ नमः शिवाय।
✦ पौराणिक उद्भव एवं माघ-माहात्म्य का सिद्धान्त
पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में दत्तात्रेय जी सौभरि मुनि को माघ-स्नान का माहात्म्य सुनाते हुए कहते हैं कि माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित रहने पर समस्त तीर्थ प्रयाग में निवास करते हैं। मौनी अमावस्या उस माघ-कल्प की पराकाष्ठा का दिन है — इस तिथि पर ब्रह्म-मुहूर्त में किया गया स्नान अश्वमेध-यज्ञ के तुल्य फल देता है। यही कारण है कि कुम्भ-पर्व में मौनी अमावस्या को 'अमृत-योग' अथवा 'मुख्य शाही-स्नान' कहा गया है।
मत्स्य पुराण के प्रयाग-माहात्म्य (अध्याय 102-112) में स्पष्ट उल्लेख है कि त्रिवेणी संगम पर मौनी अमावस्या को किया गया स्नान सप्त-जन्मों के संचित पापों का क्षय करता है। स्कन्द पुराण के काशी-खण्ड एवं प्रभास-खण्ड में भी यही विधि वर्णित है — स्नान से पूर्व संकल्प, फिर सूर्य को अर्घ्य, फिर तर्पण, और अन्त में दान। मौन-व्रत के विना यह स्नान अधूरा माना गया है।
मनुस्मृति के अनुसार स्वायम्भुव मनु की उत्पत्ति इसी दिन हुई, अतः सनातन परम्परा इस अमावस्या को मानव-सृष्टि का प्रारम्भ-दिवस मानती है। पुराण-वचन है — 'मौनेन प्राप्यते मुनित्वम्' — अर्थात् मौन से ही मुनि-पद प्राप्त होता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार इस दिन का मौन केवल वाक्-संयम नहीं, अपितु मन-वाणी-काया तीनों का संयम है।
✦ मौन-व्रत की शास्त्रीय विधि एवं स्तर
शास्त्रों में मौन-व्रत के तीन स्तर बताये गये हैं — काष्ठ-मौन, अकार-मौन और सुषुप्ति-मौन। काष्ठ-मौन में साधक सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त वाणी का पूर्णतः त्याग करता है; अकार-मौन में संकेत और लेखन से भी संवाद नहीं किया जाता; सुषुप्ति-मौन सर्वोच्च स्तर है जिसमें मन के संकल्प-विकल्प भी विरत होते हैं। गृहस्थ-साधक के लिये काष्ठ-मौन पर्याप्त माना गया है।
पद्म पुराण की विधि के अनुसार मौनी अमावस्या को साधक ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर 'मकर-स्थे रवौ माघे...' संकल्प का उच्चारण करता है, फिर पवित्र नदी अथवा कूप-जल से स्नान करता है। स्नान-काल में 'गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति...' मन्त्र का ध्यान आवश्यक है। स्नान के पश्चात् सूर्य को तीन अञ्जलि जल का अर्घ्य देकर मौन-व्रत का संकल्प लिया जाता है।
मौन-काल में साधक भगवद्-नाम का मानसिक जप, गीता-पाठ अथवा विष्णु-सहस्रनाम का स्मरण करता है। मौन का पारण सूर्यास्त के पश्चात् ब्राह्मण-भोजन एवं दान के बाद किया जाता है। यदि पूर्ण-दिन का मौन सम्भव न हो तो ब्रह्म-मुहूर्त से मध्याह्न पर्यन्त का मौन भी विधि-सम्मत माना गया है।
✦ पितृ-तर्पण एवं श्राद्ध-कर्म का विधान
गरुड़ पुराण के प्रेत-खण्ड (अध्याय 5-13) में अमावस्या तिथि को पितरों की प्रिय तिथि कहा गया है, क्योंकि इस दिन सूर्य-चन्द्र की एक राशि में स्थिति से पितृ-लोक तक तर्पण-जल का प्रवाह सुगम होता है। मौनी अमावस्या को किया गया तर्पण सामान्य अमावस्याओं की अपेक्षा सहस्र-गुणा फल देता है, क्योंकि माघ-मास स्वयं पितरों का प्रिय मास है।
तर्पण-विधि में दक्षिणाभिमुख होकर जनेऊ अपसव्य करना, कुश-तिल-जल से तीन पीढ़ी तक के पितरों — पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता, पितामही, प्रपितामही — का नाम-गोत्र-सहित तर्पण करना आवश्यक है। मातृ-पक्ष का तर्पण भी इसी क्रम में पृथक् किया जाता है। नाना-नानी एवं गुरु-तर्पण भी इसी दिन पुण्य-प्रद माना गया है।
श्राद्ध-कर्म में पिण्ड-दान तब आवश्यक होता है जब किसी पितर की मृत्यु-तिथि अज्ञात हो — ऐसे पितरों का वार्षिक श्राद्ध मौनी अमावस्या को ही सम्पन्न किया जाता है। ब्राह्मण-भोजन, गौ-ग्रास, श्वान-ग्रास, काक-बलि एवं चींटी के लिये पिपीलिकाहार — ये पञ्च-यज्ञ इस दिन अवश्य करने योग्य हैं।
✦ त्रिवेणी संगम एवं प्रमुख तीर्थ-स्नान-स्थल
मत्स्य पुराण के अनुसार माघ-स्नान का परम क्षेत्र प्रयाग का त्रिवेणी संगम है — जहाँ गङ्गा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मिलती हैं। मौनी अमावस्या को कुम्भ-पर्व में यहाँ का स्नान शाही-स्नान कहलाता है और इसका माहात्म्य अश्वमेध-यज्ञ के सहस्र-गुणा बताया गया है। प्रयाग के अतिरिक्त हरिद्वार का हर-की-पौड़ी, काशी का दशाश्वमेध घाट, नासिक का रामकुण्ड और उज्जैन का रामघाट — ये चार स्थल भी विशेष-पुण्य-प्रद हैं।
स्कन्द पुराण के काशी-खण्ड में वर्णित है कि जो साधक प्रयाग नहीं पहुँच सकता वह घर पर ही गङ्गा-जल मिलाकर स्नान करे और 'गङ्गा-गङ्गेति यो ब्रूयात्' मन्त्र का तीन बार उच्चारण करे — ऐसा करने से प्रयाग-स्नान का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। कूप-जल, जलाशय-जल अथवा वर्षा-जल — सभी इस मन्त्र-संस्कार से तीर्थ-तुल्य हो जाते हैं।
स्नान के समय 'मकर-स्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव' इस संकल्प-मन्त्र का उच्चारण अनिवार्य है। स्नान के पश्चात् सूर्य-अर्घ्य देकर 'ॐ सूर्याय नमः' का जप, फिर पीपल वृक्ष की सात-प्रदक्षिणा, और अन्त में अन्न-वस्त्र का दान — यह पञ्च-अङ्ग विधि सम्पूर्ण मौनी अमावस्या-कर्म का सार है।
✦ दान-धर्म एवं आहार-संयम के नियम
पद्म पुराण कहता है कि मौनी अमावस्या को किया गया दान अन्य दिनों की अपेक्षा कोटि-गुणा फल देता है। विशेष-दान-द्रव्य हैं — काले तिल, कम्बल, गर्म वस्त्र, अन्न (विशेषतः चावल और दाल), घृत, गुड़, स्वर्ण और गौ-दान। तिल-दान शनि-दोष एवं पितृ-दोष दोनों का परिहार करता है, अतः इसका विशेष महत्त्व है।
आहार-नियम में इस दिन सात्त्विक एकाहार ही ग्राह्य है। दिन-भर निराहार रहकर सूर्यास्त के पश्चात् हविष्यान्न — दूध, फल, साबूदाना, सेन्धव-नमक से बना भोजन — ग्रहण करना श्रेष्ठ है। तामसिक अन्न, मसूर, चना, मांस, मद्य, लहसुन और प्याज सर्वथा वर्जित हैं। ब्रह्मचर्य-पालन भी इस दिन अनिवार्य कहा गया है।
वस्त्र-दान एवं अन्न-दान के साथ-साथ 'गौ-ग्रास' — गाय को पहली रोटी देना — इस दिन का मुख्य पुण्य-कर्म है। यदि सामर्थ्य हो तो ब्राह्मण-दम्पति को भोजन कराकर दक्षिणा देना उत्तम है। दान-काल में 'इदं न मम' — 'यह मेरा नहीं है' — इस भावना से दान करना ही वास्तविक त्याग है।
✦ शास्त्रीय उत्पत्ति और पौराणिक आधार
मौनी अमावस्या के पीछे जो सबसे प्रसिद्ध कथा-सूत्र है, वह स्कन्द पुराण के माघ-माहात्म्य खंड में मिलता है। वहाँ माघ-स्नान की महिमा का इतना विस्तार से वर्णन है कि कहा गया — माघ में जो प्रयाग में स्नान करे, उसे सौ अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है। पारंपरिक वाचन के अनुसार, स्वायम्भुव मनु का अवतरण इसी तिथि पर हुआ था, और ‘मनु’ से ‘मौन’ की व्युत्पत्ति बताकर इस दिन वाणी-संयम को मुख्य व्रत बताया गया।
पद्म पुराण और ब्रह्म-वैवर्त पुराण में अमावस्या तिथि को पितरों की तिथि कहा गया है। पितृ-पक्ष से इतर भी, हर अमावस्या पर पितर तर्पण के लिए अधिकार रखते हैं — और मौनी अमावस्या इस अधिकार की सबसे बड़ी रात मानी जाती है। इसीलिए दक्षिण भारत के बहुत-से ब्राह्मण परिवार इस दिन ‘पितृ-तर्पण’ अलग से करते हैं, भले ही उन्होंने आश्विन में महालय श्राद्ध कर लिया हो।
महाभारत के वन-पर्व में युधिष्ठिर को मार्कण्डेय ऋषि माघ-स्नान का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं कि कलियुग में जब यज्ञ-यागादि कठिन हो जाएँगे, तब भी संगम-स्नान और मौन-व्रत मनुष्य को तार देगा। कई आचार्य इसी प्रसंग को मौनी अमावस्या का मूल बताते हैं। पुराणों के विभिन्न संस्करणों में तिथि का विवरण थोड़ा बदलता है, इसलिए ‘ठीक यह श्लोक संख्या’ बताने के बजाय परंपरागत वाचन पर भरोसा करना अधिक उचित है।
✦ विस्तृत अनुष्ठान-विधि : घर पर और तीर्थ पर
अनुष्ठान की सही विधि क्षेत्र और परिवार के अनुसार थोड़ी-थोड़ी बदलती है, पर एक सर्व-सम्मत क्रम यह है — ब्रह्म-मुहूर्त में उठो, बिस्तर पर ही ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति…’ का स्मरण करो, और मौन धारण कर लो। फिर बिना बोले स्नान-स्थल तक जाओ — चाहे वह आपके घर का बाथरूम हो, चाहे संगम का घाट हो। जल में उतरने से पहले संकल्प लेना है : ‘मम जन्म-जन्मांतर-कृत-पाप-क्षयार्थम् मौनी अमावस्या स्नानमहं करिष्ये’।
तीर्थ पर तीन डुबकी का विधान है — पहली अपने लिए, दूसरी पितरों के निमित्त, तीसरी समस्त चराचर जगत के कल्याण-हेतु। डुबकी लगाते समय हाथ जोड़ कर सूर्य को अर्घ्य दें — एक ताम्र-पात्र से, जिसमें थोड़ा लाल चन्दन, अक्षत और एक लाल फूल हो। फिर तट पर खड़े होकर ‘ॐ सूर्याय नमः’ का बारह बार जप, और संभव हो तो आदित्य-हृदय-स्तोत्र का एक पाठ। जो लोग संगम नहीं जा सकते, वे घर के पानी में थोड़ी-सी गंगाजल मिलाकर, उत्तर दिशा में मुँह करके यही क्रम कर सकते हैं — फल बराबर माना गया है।
स्नान के बाद पीला या सफेद वस्त्र पहन कर भगवान विष्णु अथवा शिव की पूजा — परिवार की कुलदेवता-परंपरा के अनुसार। दान का विशेष महत्व है : काले तिल, ऊनी वस्त्र, छाता, लोहे की वस्तु — ये अमावस्या-दान कहलाते हैं। दोपहर तक मौन निभाना सर्वोत्तम, और यदि सम्भव हो तो पूरा दिन। शाम को दीप-दान करके मौन तोड़ना चाहिए — पहला शब्द किसी मंत्र का हो, संसारिक बातचीत बाद में।
✦ आवश्यक सामग्री और उनका व्यावहारिक प्रबंध
गृहस्थ साधक के लिए सामग्री की सूची लम्बी नहीं है, पर हर वस्तु का अपना अर्थ है। गंगाजल थोड़ा-सा (बाजार में 50 रुपये से 150 रुपये की बोतल), काले तिल लगभग 250 ग्राम, कुश के कुछ तिनके, कच्चा दूध, लाल-पीले फूल, चंदन, अक्षत (बिना टूटे चावल), घी का दीपक, धूप-बत्ती, और दान के लिए कुछ अनाज तथा वस्त्र। यदि तीर्थ-स्नान का योग न हो, तो एक ताँबे का लोटा अवश्य चाहिए, क्योंकि सूर्य-अर्घ्य ताँबे के बिना अधूरा माना गया है।
बहुत बार लोग पूछते हैं — ‘अगर कुश न मिले तो क्या करें?’ तो आचार्य कहते हैं कि दूर्वा से काम चल सकता है, और बिल्कुल न मिले तो हाथ की अनामिका अंगुली में एक ‘पवित्री’ (कुश की अंगूठी जैसी रचना) कल्पना से धारण कर लें। काले तिल न हों तो सफेद तिल भी चलते हैं, पर पितृ-कर्म के लिए काले तिल को प्राथमिकता दी गई है। फूल बाजार से हर समय 30–50 रुपये में मिल जाते हैं; यदि वह भी संभव न हो तो तुलसी-दल और अक्षत पर्याप्त हैं।
एक छोटी-सी सलाह जो हमारी पिछली पीढ़ी देती आई है — सामग्री एक दिन पहले शाम को ही इकट्ठी कर के पूजा-स्थल पर ढक कर रख दें। सुबह मौन में किसी से ‘बेलपत्र कहाँ है?’ पूछना पड़े, तो व्रत टूट जाएगा। यह छोटी-सी तैयारी पूरे अनुष्ठान की रीढ़ है।
✦ जप-योग्य मन्त्र, स्तोत्र और उनका भाव
मौन का मतलब विचार-शून्यता नहीं है — मतलब है ‘मानसिक जप’। इस दिन सबसे अधिक अनुशंसित मन्त्र हैं — गायत्री-मंत्र, महामृत्युंजय, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का द्वादशाक्षर, और ‘ॐ नमः शिवाय’ का पंचाक्षरी। संगम-तट पर खड़े साधुओं को आप अक्सर ‘हरि ॐ तत् सत्’ की मंद ध्वनि में सुनेंगे — यह भी मौन का ही एक प्रकार है, क्योंकि स्वर इतना धीमा होता है कि बगल वाला भी नहीं सुनता।
जो लोग स्तोत्र-पाठ कर सकते हैं, उनके लिए विष्णु-सहस्रनाम का एक पाठ, या रुद्राष्टकम्, या आदित्य-हृदय-स्तोत्र अत्यंत फलदायी कहा गया है। गृहिणियाँ अक्सर सत्यनारायण-कथा का संक्षिप्त पाठ भी करती हैं। दक्षिण भारत में लोग ‘ललिता सहस्रनाम’ पढ़ते हैं, क्योंकि अमावस्या को देवी का दिन माना गया है।
बहुत-से वृद्धजन कहते हैं कि अगर कुछ याद न रहे, तो केवल ‘राम’ नाम का मानसिक जप दिन-भर चलता रहे, यही पर्याप्त है। यह बात बहुत गहरी है — मन्त्र की संख्या नहीं, निरंतरता मायने रखती है। दिन में 108 बार पूरे ध्यान से जप, दस हज़ार बार जल्दी-जल्दी रटने से कहीं श्रेष्ठ है।
✦ श्रेष्ठ मुहूर्त, स्नान-काल और तिथि-निर्णय
मौनी अमावस्या का मुख्य काल ब्रह्म-मुहूर्त है — सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले से लेकर सूर्योदय तक। यदि अमावस्या तिथि दो दिनों में फैली हो, तो वह दिन लिया जाता है जिसमें सूर्योदय के समय अमावस्या व्याप्त हो — इसे ‘उदय-व्यापिनी’ नियम कहते हैं। कुछ आचार्य मानते हैं कि यदि अमावस्या रात के पहले प्रहर में ही समाप्त हो रही हो, तो पूर्व-दिन ही व्रत करना चाहिए, जबकि दक्षिण-भारतीय परम्परा अधिकतर उदय-तिथि पर ही टिकी रहती है।
स्नान के लिए सबसे श्रेष्ठ काल है ब्राह्म-मुहूर्त, उसके बाद उषाकाल, फिर सूर्योदय। एक पुरानी कहावत है — ‘तारों की छाँव में स्नान, अमृत-तुल्य; सूर्योदय में स्नान, गंगा-तुल्य; और दिन चढ़े स्नान, सामान्य पुण्य।’ इसलिए जो लोग संगम जा रहे हैं, वे प्रायः रात दो-तीन बजे से ही घाटों की ओर निकल पड़ते हैं।
तर्पण और दान के लिए दोपहर 12 बजे तक का समय श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह काल ‘अपराह्न’ से पहले का है, जो पितृ-कर्म के लिए शास्त्र-सम्मत है। शाम का दीप-दान सूर्यास्त के तुरंत बाद, गोधूलि-वेला में करना चाहिए — यही समय व्रत-समाप्ति का भी संकेत है।
✦ क्षेत्रीय परम्पराएँ : उत्तर से दक्षिण, बंगाल से महाराष्ट्र तक
उत्तर भारत में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, और मध्य प्रदेश में, मौनी अमावस्या का केंद्र-बिन्दु प्रयागराज का संगम है। यहाँ ‘कल्पवासी’ — वे लोग जो पूरे माघ-मास तट पर तप करते हैं — के लिए यह दिन शिखर माना जाता है। बंगाल में इसे ‘मौनी अमावस्या’ या ‘माघी अमावस्या’ कहा जाता है, और लोग गंगा-सागर तीर्थ में स्नान का विशेष महत्व मानते हैं, यद्यपि वह मुख्य पर्व मकर-संक्रांति होता है।
महाराष्ट्र और गुजरात में इस दिन को ‘दर्शा अमावस्या’ या ‘दर्श अमावस्या’ कहकर पितृ-तर्पण की प्रधानता दी जाती है, और मौन-व्रत का प्रचलन उत्तर भारत की तुलना में कम है। तमिल नाडु में यह पर्व ‘थाई अमावसाई’ (तमिल माह ‘थाई’ की अमावस्या) नाम से प्रसिद्ध है, और रामेश्वरम् तथा कन्याकुमारी के सागर-तट पर बड़ी संख्या में लोग पितृ-कर्म के लिए एकत्र होते हैं।
केरल में नंबूदिरी ब्राह्मण ‘मकर-व्यापिनी अमावस्या’ के रूप में इसे मनाते हैं और ‘बलि-तर्पण’ करते हैं। उड़ीसा में पुरी के स्वर्गद्वार पर महाप्रसाद के साथ पितृ-कार्य होते हैं। नेपाल में बागमती-नदी पर मौनी अमावस्या का स्नान बहुत लोकप्रिय है, और पशुपतिनाथ मंदिर रात-भर खुला रहता है। यह क्षेत्रीय विविधता ही भारतीय परंपरा की असली शोभा है — एक ही तिथि, अनेक रंग।
✦ आधुनिक जीवन की चुनौतियाँ और व्यावहारिक समाधान
नौकरी-पेशा परिवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है — पूरा दिन कैसे चुप रहें जब बॉस का फ़ोन आ जाए, या बच्चे को स्कूल भेजना हो? आचार्य कहते हैं कि शास्त्रों में ‘यथा-शक्ति’ का नियम है — जितना सम्भव हो, उतना करो। यदि पूरा दिन सम्भव नहीं, तो सूर्योदय से 9 बजे तक का मौन भी फलदायी है। ऑफ़िस में ‘आज मेरा व्रत है, कम बोलूँगा’ — यह कह देना भी कोई पाप नहीं।
दूसरी समस्या है — बड़े शहरों में गंगाजल तक नहीं पहुँच पाता। तो सरल उपाय है : बाथरूम के पानी में थोड़ा गंगाजल, थोड़ा कच्चा दूध, और कुछ तुलसी के पत्ते डाल कर स्नान करें — यह ‘कल्पित-तीर्थ-स्नान’ कहलाता है और शास्त्र-सम्मत है। बहुत-से ज्योतिषी मानते हैं कि श्रद्धा-पूर्वक किया गया घर का स्नान, अश्रद्धा से किए गए तीर्थ-स्नान से श्रेष्ठ है।
तीसरी कठिनाई है — फ़ोन और सोशल-मीडिया का दबाव। एक प्रयोग जो काफ़ी कारगर है : फ़ोन को ‘Do Not Disturb’ मोड पर डाल कर एक स्टेटस लगा दें — ‘आज मौन-व्रत में हूँ, शाम 6 बजे के बाद उत्तर दूँगा।’ यह न केवल आपका व्रत बचाता है, बल्कि देखने वालों को भी एक प्रेरणा देता है। यही तो धर्म का प्रचार है — बिना उपदेश, अपने उदाहरण से।
✦ गहन आध्यात्मिक अर्थ : मौन क्यों, और किसके लिए
मौन केवल जीभ बंद रखना नहीं है। तीन प्रकार के मौन शास्त्रों में बताए गए हैं — वाङ्-मौन (वाणी का मौन), मन-मौन (विचारों का मौन), और काष्ठ-मौन (शरीर-इन्द्रियों का पूर्ण निरोध)। साधारण गृहस्थ के लिए केवल वाङ्-मौन ही पर्याप्त है, पर इसका अंतिम लक्ष्य मन-मौन तक पहुँचना है। जब हम बोलना बंद करते हैं, तो मन की चंचलता धीरे-धीरे दिखाई देने लगती है — यही आत्म-दर्शन की पहली सीढ़ी है।
अमावस्या की रात में चंद्रमा का प्रकाश नहीं होता, और शास्त्रों में चंद्रमा को ‘मन’ का अधिष्ठाता देव कहा गया है। बाहरी चंद्र-प्रकाश की अनुपस्थिति का अर्थ है — मन की वृत्तियों को बाहर भटकने का सहारा नहीं है, अतः वे भीतर मुड़ने लगती हैं। यही पर्व का योग-शास्त्रीय रहस्य है। पतञ्जलि-योग-सूत्र की ‘चित्त-वृत्ति-निरोध’ की परिभाषा इसी अनुभव के बहुत निकट है।
इसीलिए कई संत-महात्मा कहते हैं — ‘मौनी अमावस्या के दिन एक घंटे का सच्चा मौन, साल-भर की कथा-कीर्तन से अधिक फल देता है।’ यह अतिशयोक्ति नहीं है। बात केवल इतनी है कि बाहरी क्रिया जब रुकती है, तब भीतरी क्रिया शुरू होती है — और भीतर ही तो वह बैठा है जिसकी हम खोज में बाहर भटक रहे हैं।
📊मौनी अमावस्या के पञ्च-अङ्ग कर्म
| कर्म | विधि | शास्त्रीय प्रमाण | फल |
|---|---|---|---|
| स्नान | ब्रह्म-मुहूर्त में पवित्र जल से, संकल्प-मन्त्र-सहित | पद्म पुराण उत्तर खण्ड 121-129 | सप्त-जन्म-पाप-क्षय |
| मौन-व्रत | ब्रह्म-मुहूर्त से सूर्यास्त पर्यन्त वाक्-संयम | पद्म पुराण माघ-माहात्म्य | मुनि-पद की प्राप्ति |
| तर्पण | दक्षिणाभिमुख, अपसव्य, कुश-तिल-जल से | गरुड़ पुराण प्रेत-खण्ड 5-13 | पितृ-तृप्ति एवं पितृ-दोष-नाश |
| दान | तिल, अन्न, वस्त्र, स्वर्ण, गौ-दान | स्कन्द पुराण काशी-खण्ड | अश्वमेध-यज्ञ-तुल्य पुण्य |
| जप-पाठ | विष्णु-सहस्रनाम, गीता-पाठ, सूर्य-स्तुति | मत्स्य पुराण प्रयाग-माहात्म्य | मोक्ष-मार्ग-प्राप्ति |
📊मौनी अमावस्या : आवश्यक सामग्री और अनुमानित मूल्य
| सामग्री | मात्रा | उद्देश्य | अनुमानित मूल्य (₹) |
|---|---|---|---|
| गंगाजल | 100 मि.ली. | स्नान-जल में मिलाने हेतु | 50–150 |
| काले तिल | 250 ग्राम | पितृ-तर्पण और दान | 40–80 |
| कुश/दूर्वा | एक मुठ्ठी | पवित्री-धारण व आसन | स्थानीय रूप से नि:शुल्क |
| ताँबे का लोटा | 1 | सूर्य को अर्घ्य | 200–500 |
| कच्चा दूध | 100 मि.ली. | स्नान-जल और अर्घ्य | 10–20 |
| लाल/पीले फूल | एक माला | सूर्य व विष्णु पूजन | 30–60 |
| घी का दीपक | 1 | मौन-समाप्ति पर दीप-दान | 20–40 |
| ऊनी वस्त्र | 1 | दान हेतु (वैकल्पिक) | 200–500 |
📊क्षेत्रीय नाम और मुख्य परम्परा
| क्षेत्र | स्थानीय नाम | प्रमुख अनुष्ठान | मुख्य स्थल |
|---|---|---|---|
| उत्तर भारत | मौनी अमावस्या / माघी अमावस्या | संगम-स्नान, मौन-व्रत | प्रयागराज, हरिद्वार |
| बंगाल | मौनी अमावस्या | गंगा-सागर स्नान, पितृ-तर्पण | गंगासागर, दक्षिणेश्वर |
| महाराष्ट्र/गुजरात | दर्श अमावस्या | पितृ-तर्पण प्रधान | नासिक, द्वारका |
| तमिल नाडु | थाई अमावसाई | समुद्र-स्नान, पितृ-कर्म | रामेश्वरम्, कन्याकुमारी |
| केरल | मकर-व्यापिनी अमावस्या | बलि-तर्पण | तिरुवल्ला, वर्कला |
| उड़ीसा | माघ अमावस्या | महाप्रसाद, स्वर्गद्वार-कर्म | पुरी |
| नेपाल | माघे अमावस्या | बागमती-स्नान, पशुपति-दर्शन | पशुपतिनाथ, काठमांडू |
⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें
✗ मौन-व्रत के समय क्रोध अथवा मानसिक अशान्ति में रहना
क्यों: शास्त्र कहते हैं कि केवल वाणी का संयम काष्ठ-मौन है — परम-मौन तो मन-वाणी-काया तीनों का संयम है। मानसिक उद्वेग के साथ रखा मौन निष्फल माना जाता है।
✓ सही उपाय: मौन-काल में भगवद्-नाम का मानसिक जप, गीता-पाठ अथवा विष्णु-सहस्रनाम का स्मरण करें। मन को साधना में स्थिर रखें।
✗ तर्पण के समय दिशा अथवा जनेऊ की स्थिति का ध्यान न रखना
क्यों: गरुड़ पुराण के अनुसार पितृ-कर्म में दक्षिणाभिमुख होना और जनेऊ अपसव्य (दायें कन्धे से बायीं कमर) करना अनिवार्य है। दिशा-दोष से तर्पण-जल पितरों तक नहीं पहुँचता।
✓ सही उपाय: तर्पण से पूर्व दक्षिण दिशा निश्चित करें, जनेऊ अपसव्य करें, कुश-तिल-जल से नाम-गोत्र-सहित क्रमशः पितृ-पक्ष एवं मातृ-पक्ष का तर्पण करें।
✗ मौनी अमावस्या को तामसिक भोजन अथवा मसूर-चना का सेवन
क्यों: व्रत-तिथि पर तामसिक एवं वर्जित अन्न का सेवन व्रत-भङ्ग माना जाता है। मसूर, चना, मांस, मद्य, लहसुन और प्याज शास्त्र-निषिद्ध हैं।
✓ सही उपाय: केवल सात्त्विक हविष्यान्न — दूध, फल, साबूदाना, सेन्धव-नमक का प्रयोग करें। सूर्यास्त के पश्चात् एकाहार ग्रहण करें।
✗ दान-कर्म को केवल औपचारिकता मानकर बिना भाव के सम्पन्न करना
क्यों: पद्म पुराण कहता है कि 'इदं न मम' — यह मेरा नहीं है — इस भावना के बिना दिया गया दान वास्तविक त्याग नहीं होता। भाव-रहित दान केवल वस्तु-विनिमय है।
✓ सही उपाय: दान-काल में संकल्प-मन्त्र पढ़ें, ग्राहक की चरण-स्पर्श करके दान दें, और 'इदं न मम' की भावना से अहंकार-रहित होकर त्याग करें।
✗ मौन का अर्थ केवल मुँह बंद रखना समझ लेना
क्यों: बहुत-से लोग दिन-भर इशारों में बात करते रहते हैं, WhatsApp पर संदेश भेजते हैं, और सोचते हैं कि व्रत हो गया। शास्त्रीय दृष्टि से इशारा भी ‘वाणी’ का ही रूप है, क्योंकि वह संप्रेषण है।
✓ सही उपाय: वाणी-संयम का अर्थ है — संप्रेषण-संयम। सूर्योदय से दोपहर तक न बोलें, न इशारा करें, न लिखें, न टाइप करें। यदि आपातकाल हो, तो अल्प से अल्प शब्दों में काम चलाएँ।
✗ स्नान से पहले ही बात कर लेना और फिर ‘अब चुप होते हैं’ कहना
क्यों: मौनी अमावस्या का विधान है कि नींद से उठते ही, बिस्तर पर ही मौन धारण करें। यदि कोई शब्द निकल गया, तो उस दिन का संकल्प भंग माना गया है, क्योंकि स्नान-पूर्व की वाणी ही सबसे अधिक प्रभाव छोड़ती है।
✓ सही उपाय: सोने से पहले ही परिवार को सूचित कर दें कि सुबह कोई बात नहीं होगी। तकिए के पास एक छोटा-सा कागज़ रखें जिस पर लिखा हो — ‘आज मौन है’। उठते ही उसे देख कर मानसिक संकल्प कर लें।
✗ तर्पण में गलत दिशा और गलत जल का प्रयोग
क्यों: पितृ-तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके, बाएँ कंधे पर जनेऊ रख कर, अंगुली के निचले भाग ‘पितृ-तीर्थ’ से किया जाता है। बहुत-से लोग देव-तर्पण की तरह उत्तर-पूर्व मुँह कर लेते हैं, जो शास्त्र-विरुद्ध है।
✓ सही उपाय: पंडित जी से एक बार विधि सीख लें, या किसी प्रामाणिक कर्म-कांड पुस्तक से दिशा-निर्देश पढ़ लें। जल में काले तिल अवश्य मिलाएँ, और ‘ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः’ कहते हुए तीन-तीन अंजलि दें।
✗ व्रत के नाम पर पूरा दिन भूखे रहना और तबीयत बिगाड़ लेना
क्यों: शास्त्रों में मौनी अमावस्या को निर्जल-निराहार व्रत का विधान नहीं है। यह संयम-प्रधान व्रत है, उपवास-प्रधान नहीं। बहुत-से लोग दोनों मिला कर ख़ुद को कमज़ोर कर लेते हैं और साधना ही नहीं हो पाती।
✓ सही उपाय: फलाहार लें — फल, दूध, मेवे, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा। दोपहर के बाद एक बार सात्विक भोजन कर सकते हैं। शक्ति बनी रहेगी तो जप-ध्यान भी ठीक से होगा।
✗ दान करते समय वस्तु फेंक कर देना या उपेक्षा से देना
क्यों: शास्त्रों में दान की दो शर्तें हैं — श्रद्धा और सत्कार। यदि वस्तु फेंक कर दी जाए, या लेने वाले का अपमान हो, तो दान का फल नष्ट हो जाता है। यह बात स्कन्द पुराण में स्पष्ट कही गई है।
✓ सही उपाय: हाथ से हाथ में, दोनों हाथों से, झुक कर, और ‘यह मेरी ओर से छोटी-सी भेंट है’ कहते हुए दें। ब्राह्मण को न मिले तो किसी ज़रूरतमंद को दें — पात्र वही है जिसे सच में आवश्यकता हो।
✗ तीर्थ-स्नान के लिए जा कर भीड़ में मौन भूल जाना
क्यों: संगम पर इतनी भीड़ होती है कि परिवार वालों से बात किए बिना बिछड़ने का डर रहता है, और अक्सर लोग पूरे रास्ते बोलते जाते हैं। फिर डुबकी लगा कर सोचते हैं — ‘हो गया’। पर मौन का उद्देश्य ही नष्ट हो गया।
✓ सही उपाय: जाने से पहले एक मिलने का स्थान तय कर लें, ताकि बिछड़ने पर वहीं मिलें। बच्चों को नंबर लिखी कागज़ी पट्टी पहना दें। समूह में एक नेता तय करें जो आवश्यक हो तभी बोले। बाकी सब मौन रहें।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
- ▪पद्म पुराण — उत्तर-खण्ड, माघ-माहात्म्य अध्याय 121-129 (माघ मास में अमावस्या-स्नान, मौन-व्रत एवं विष्णु-आराधना का फल; दत्तात्रेय-कथित माघ-स्नान महिमा)
- ▪पद्म पुराण (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण) — माघ-माहात्म्य प्रकरण, सम्पूर्ण पाठ जिसमें माघ-अमावस्या स्नान, तर्पण, दान एवं मौन-व्रत की विधि वर्णित है
- ▪मत्स्य पुराण — अध्याय 102-112 (प्रयाग-माहात्म्य एवं माघ-स्नान फल-वर्णन, संगम-स्नान से सप्त-जन्म पाप-नाश का प्रसंग)
- ▪स्कन्द पुराण — काशी-खण्ड एवं प्रभास-खण्ड, माघ-मास अमावस्या स्नान-दान विधि एवं मौन-व्रत द्वारा अश्वमेध-यज्ञ-तुल्य फल का वर्णन
- ▪मनुस्मृति — अध्याय 1, श्लोक 32-36 (स्वायम्भुव मनु एवं शतरूपा की उत्पत्ति-कथा, जिसके आधार पर मौनी अमावस्या को मनु-जन्मतिथि माना जाता है)
- ▪गरुड पुराण — प्रेत-खण्ड, अध्याय 5-13 (अमावस्या तिथि पर पितृ-तर्पण, पिण्ड-दान एवं श्राद्ध-कर्म से पितरों को मोक्ष-प्राप्ति का विधान)
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पूर्ण-मौन कठिन?▼
सूर्योदय से दोपहर 12 तक मौन। उसके बाद आवश्यक-बात। मौन-असम्भव हो — कम-बात + मधुर-वाणी।
मौनी अमावस्या और माघी अमावस्या में क्या अन्तर है?▼
दोनों एक ही तिथि के दो नाम हैं — माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या। 'माघी' नाम मास-वाचक है और 'मौनी' नाम इस दिन धारण किये जाने वाले मौन-व्रत से व्युत्पन्न है। पद्म पुराण इसे माघ-स्नान का सर्वोच्च दिवस कहता है।
क्या मौनी अमावस्या पर पूर्ण-दिन मौन रखना अनिवार्य है?▼
शास्त्र मौन के तीन स्तर बताते हैं। गृहस्थ-साधक के लिये ब्रह्म-मुहूर्त से मध्याह्न पर्यन्त वाणी-संयम पर्याप्त माना गया है। पूर्ण-दिन का काष्ठ-मौन सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु यदि सम्भव न हो तो अल्प-समय का मौन भी अनुग्रह-प्रद है।
मौनी अमावस्या पर कौन-कौन से दान विशेष फल-प्रद हैं?▼
काले तिल, कम्बल, गर्म वस्त्र, अन्न, घृत, गुड़, स्वर्ण और गौ-दान शास्त्र-सम्मत मुख्य दान हैं। तिल-दान पितृ-दोष एवं शनि-दोष दोनों का परिहार करता है। ब्राह्मण-भोजन एवं गौ-ग्रास भी इस दिन के अनिवार्य पुण्य-कर्म हैं।
यदि त्रिवेणी संगम न जा सकें तो क्या घर पर स्नान का फल मिलेगा?▼
स्कन्द पुराण के काशी-खण्ड के अनुसार घर पर भी गङ्गा-जल मिलाकर 'गङ्गे च यमुने चैव...' मन्त्र पढ़कर स्नान करने से प्रयाग-स्नान का पूर्ण फल प्राप्त होता है। मन्त्र-संस्कार से जल तीर्थ-तुल्य हो जाता है, और भाव-शुद्धि ही प्रधान है।
मौनी अमावस्या पर पितृ-तर्पण क्यों आवश्यक है?▼
गरुड़ पुराण के प्रेत-खण्ड के अनुसार अमावस्या तिथि पितरों को प्रिय है, और माघ-मास उनका विशेष-प्रिय मास है। इस संयोग पर तर्पण का फल सहस्र-गुणा होता है। अज्ञात-मृत्यु-तिथि वाले पितरों का वार्षिक श्राद्ध भी इसी दिन सम्पन्न किया जाता है।
क्या मौनी अमावस्या पर व्रत-पारण कब और कैसे करें?▼
व्रत-पारण सूर्यास्त के पश्चात् ब्राह्मण-भोजन एवं दान-सम्पादन के बाद किया जाता है। पारण में हविष्यान्न — दूध, फल, साबूदाना, सेन्धव-नमक से बना सात्त्विक भोजन — ग्रहण करना श्रेष्ठ है। तामसिक अन्न, मांस-मद्य सर्वथा वर्जित हैं।
क्या मौनी अमावस्या का व्रत महिलाओं के लिए मासिक-धर्म के समय वर्जित है?▼
हाँ, परंपरा यही कहती है कि मासिक-धर्म के समय औपचारिक स्नान, पूजा और तर्पण से बचना चाहिए। पर मानसिक जप और मौन-व्रत किसी भी समय किया जा सकता है — क्योंकि ये अंतःकरण की क्रियाएँ हैं। कई आचार्य मानते हैं कि उस अवस्था में भी ‘राम’ नाम का स्मरण निषिद्ध नहीं है, बल्कि सबसे श्रेष्ठ है।
अगर मैं प्रयागराज नहीं जा सकती/सकता, तो क्या व्रत का फल पूरा मिलेगा?▼
बिल्कुल मिलेगा। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि घर के जल में गंगाजल मिला कर, श्रद्धा-पूर्वक, संकल्प के साथ किया गया स्नान भी ‘तीर्थ-स्नान’ कहलाता है। पुराना श्लोक है — ‘मनः पूतं समाचरेत्’ अर्थात् मन की शुद्धि सबसे बड़ी है। श्रद्धा कम हो तो तीर्थ भी व्यर्थ, श्रद्धा पूर्ण हो तो घर का जल भी अमृत।
मौनी अमावस्या और मकर-संक्रांति में क्या सम्बन्ध है?▼
दोनों ही माघ-मास के बड़े पर्व हैं और प्रायः 15-20 दिनों के अंतर पर आते हैं। मकर-संक्रांति सूर्य के मकर-राशि में प्रवेश का दिन है, जबकि मौनी अमावस्या उसी माघ-मास की अमावस्या तिथि है। संगम पर ‘माघ-मेला’ मकर-संक्रांति से शुरू होकर मौनी अमावस्या को अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है। कल्पवासी इन दोनों को एक ही साधना-काल के दो छोर मानते हैं।
मौन-व्रत में अगर बच्चा रो पड़े या आपातकालीन फ़ोन आ जाए तो क्या करें?▼
शास्त्रों में ‘विवेक’ को सबसे बड़ा गुरु बताया गया है। यदि बच्चे की सुरक्षा या किसी की जान का प्रश्न हो, तो बोलना धर्म है, मौन नहीं। बाद में दो-तीन मिनट मानसिक प्रायश्चित कर के पुनः मौन धारण कर लें, संकल्प भंग नहीं माना जाएगा। आपातकाल में कठोर नियम लागू नहीं होते — यह स्वयं वेदों का वचन है।
क्या मौनी अमावस्या को नया काम या यात्रा शुरू करनी चाहिए?▼
सामान्यतः अमावस्या तिथि को कोई शुभ कार्य — विवाह, गृह-प्रवेश, व्यापार-आरंभ — नहीं किया जाता। पर आध्यात्मिक कार्य, जैसे मन्त्र-दीक्षा लेना, गुरु से मिलना, साधना-शिविर शुरू करना — ये सब इस दिन अत्यंत शुभ माने गए हैं। तीर्थ-यात्रा आरंभ करना भी इस दिन प्रशस्त है, यदि यात्रा का उद्देश्य धार्मिक हो।
मौन-व्रत खोलने का सही तरीका क्या है?▼
व्रत खोलने का काल सूर्यास्त के बाद, गोधूलि-वेला है। पहले एक घी का दीप जलाएँ, फिर हाथ जोड़ कर इष्ट-देवता को ‘हे प्रभु, यह मौन-साधना आपको समर्पित’ कहें। पहला शब्द जो मुँह से निकले, वह किसी मन्त्र का होना चाहिए — ‘ॐ’, ‘राम’, या ‘नारायण’। उसके बाद ब्राह्मण या किसी वरिष्ठ को थोड़ी-सी दक्षिणा दें, फिर सामान्य बातचीत आरंभ करें।
क्या मौनी अमावस्या पर पितरों के नाम पर कोई विशेष भोजन बनाना चाहिए?▼
हाँ, परंपरा है कि पितरों के पसंदीदा सात्विक भोजन — जैसे खीर, पूड़ी, मूँग दाल का हलवा — बना कर पहले एक पत्तल पर निकाल कर रखें। फिर उस पत्तल को गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए चार भागों में बाँट दें — इसे ‘पंच-बलि’ कहते हैं। इसके बाद ही परिवार भोजन ग्रहण करे। यह विधि गरुड़-पुराण में विस्तार से वर्णित है।
क्या मौनी अमावस्या के दिन बाल और नाखून काट सकते हैं?▼
नहीं, अमावस्या तिथि पर बाल, नाखून, और दाढ़ी काटना शास्त्र-निषिद्ध है। ज्योतिष-दृष्टि से यह तिथि चंद्रमा-हीन है, और चंद्र मन का कारक है — इस दिन शरीर-शुद्धि की क्रियाएँ मानसिक अशांति बढ़ा सकती हैं। एक दिन पहले या बाद में यह कार्य कर लें। यही नियम चतुर्दशी और एकादशी पर भी लागू होता है।
अगर मेरे पास गंगाजल बिल्कुल नहीं है, तो कौन-सा विकल्प ठीक रहेगा?▼
पहला विकल्प — किसी भी पवित्र नदी का जल, जैसे यमुना, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा का। दूसरा विकल्प — किसी मंदिर के अभिषेक का जल। तीसरा विकल्प — एक तुलसी-पत्ता और चुटकी-भर हल्दी डाल कर साधारण जल को ‘कल्पित-गंगा’ बनाना, मन्त्र है ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति, नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु’। श्रद्धा से किया गया यह प्रयोग पूर्ण फलदायी है।
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सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।