जैन पच्चक्खाण

जैन पच्चक्खाण

जैन प्रत्याख्यान — दैनिक संयम-व्रत प्रणाली

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जैन पच्चक्खाण क्या है?

जैन पच्चक्खाण (पाली: पच्चक्खाण; संस्कृत: प्रत्याख्यान) जैन धर्म का एक मूल आध्यात्मिक अभ्यास है। "प्रति + आख्यान" — अर्थात् "विशेष रूप से त्याग की घोषणा"। श्रावक एवं श्राविकाएँ प्रति-दिन नवकारशी से प्रारम्भ कर ९ प्रकार के पच्चक्खाण लेते हैं।

पच्चक्खाण का उद्देश्य — कर्म-निर्जरा (पुरानी कर्मों का क्षय), इन्द्रिय-संयम, एवं शिक्षाव्रत-पालन। प्रत्येक पच्चक्खाण में एक निश्चित अवधि के लिए भोजन, पानी, अथवा कोई कार्य त्यागा जाता है। दिगम्बर एवं श्वेताम्बर परम्पराएँ कुछ अंतर के साथ इसे मनाती हैं।

जैन पंचांग में पच्चक्खाण का दैनिक काल-निर्धारण होता है — सूर्योदय एवं प्रहर-गणना के अनुसार। पर्युषण, अष्टान्हिका, ओली, चातुर्मास में विशेष पच्चक्खाण लिए जाते हैं। यह तीर्थंकर महावीर की शिक्षाओं का अंग है।

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अवधारणा एवं नियम

९ मानक पच्चक्खाण — (१) नवकारशी: सूर्योदय के ४८ मिनट बाद तक भोजन-त्याग; (२) पोरिसी: सूर्योदय के ३ घंटे बाद तक; (३) साढ़-पोरिसी: ४.५ घंटे बाद तक; (४) पुरिमड्ढ: मध्याह्न तक; (५) अवड्ढ: अपराह्न तक; (६) एकासन: एक समय भोजन; (७) बेआसण: दो समय भोजन; (८) आयम्बिल: नीरस-भोजन (बिना तेल/मसाला); (९) उपवास: पूर्ण निराहार २४ घंटे। हर पच्चक्खाण के साथ "नवकार मन्त्र" का पाठ अनिवार्य।

करने योग्य कार्य

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प्रात:काल नवकारशी पच्चक्खाण लेना
🙏
दैनिक प्रतिक्रमण के साथ पच्चक्खाण
🪔
पर्युषण में अष्टम तप
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चातुर्मास में मासक्षमण
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जिनवाणी श्रवण एवं स्वाध्याय
🕉️
नवकार मन्त्र का जप

वर्जित कार्य

🍽️
पच्चक्खाण भंग — समय से पूर्व खाना
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अच्छित पदार्थ का सेवन
😤
क्रोध, माया, मान, लोभ
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जीव-हिंसा