सूतक (शाब्दिक "उत्तर-स्थिति") हिंदू परंपरा में तीन प्रकार की घटनाओं — ग्रहण, संतान-जन्म एवं कुल में मृत्यु — पर पालन किए जाने वाले अशौच का काल है। सूतक में कुछ नित्य धर्म-कार्य स्थगित रखे जाते हैं।
✦ सूतक का प्रयोजन
दार्शनिक — खगोलीय (ग्रहण) अथवा जैविक (जन्म-मृत्यु) संक्रमण-क्षणों पर गृह की प्राण-ऊर्जा अस्थिर होती है; नित्य कर्म में विराम शरीर-मन को पुनः संतुलित करता है।
व्यावहारिक — जन्म एवं मृत्यु में प्राचीन काल में रक्त-आदि के सीधे संपर्क का खतरा था; धार्मिक एकांत स्वच्छता-संगरोध का काम भी करता था।
✦ तीन प्रकार
ग्रहण-सूतक सूर्य ग्रहण: 12 घंटे पूर्व से ग्रहण समाप्ति। चंद्र ग्रहण: 9 घंटे पूर्व से ग्रहण समाप्ति। केवल वहाँ प्रवर्त्य जहाँ ग्रहण दृश्य हो।
जन्म-सूतक पैतृक सम्बन्धियों (सात पीढ़ी तक) के लिए परंपरागत 10 दिन। माता एवं शिशु का 40 दिन का सवा-मास विश्राम स्पष्ट शारीरिक-लाभ का है।
मरण-सूतक / पातक निकट पैतृक सम्बन्धियों के लिए परंपरागत 13 दिन। तेरहवें दिन शास्त्रीय श्राद्ध से काल का औपचारिक समापन।
✦ स्थगित कार्य
- ✦मंदिर-दर्शन एवं मूर्ति-स्पर्श
- ✦देवार्पण हेतु भोजन निर्माण
- ✦दूसरों की मांगलिक क्रियाओं में सम्मिलित होना
- ✦नए वस्त्र-आभूषण, तिलक
✦ निरंतर कार्य
- ✦नित्य व्यक्तिगत मंत्र-जप (मौन, मूर्ति-स्पर्श रहित)
- ✦पवित्र ग्रंथों का पाठ
- ✦स्नान, सामान्य गृह-कार्य
- ✦वृद्ध-रोगी-शिशु की सेवा सूतक से सर्वदा ऊपर है
✦ समापन
स्नान, वस्त्र-परिवर्तन, संक्षिप्त शांति या नमस्कार के पश्चात् नित्य पूजा पुनः आरंभ। मरण-सूतक में 13वें दिन का विधिवत श्राद्ध।