सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य एवं पृथ्वी के बीच आकर सूर्य-बिम्ब को आंशिक या पूर्ण रूप से ढक लेता है। हिंदू परंपरा में सहस्राब्दियों से इस खगोलीय घटना का अवलोकन एवं आचार-निरूपण होता आया है। यह लेख शास्त्र एवं लोकाचार में प्रतिष्ठित नियमों को बिना किसी अतिशयोक्ति के प्रस्तुत करता है।
✦ सूतक काल
सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण आरंभ से बारह घंटे पूर्व प्रारंभ होकर ग्रहण समाप्ति पर समाप्त होता है। इस अवधि में मंदिर-पूजा, मूर्ति-स्पर्श एवं ताज़ा भोजन के पकाने-खाने पर विराम रखा जाता है।
✦ शुभ कार्य
- ✦**स्नान** — सूतक प्रारंभ से पूर्व एक तथा ग्रहण समाप्ति पर तुरंत दूसरा स्नान।
- ✦**मंत्र-जप** — महामृत्युंजय एवं गायत्री मंत्र का जप ग्रहण काल में विशेष फलदायी माना गया है।
- ✦**दान** — ग्रहण समाप्ति पर अनाज, वस्त्र, द्रव्य का दान (ग्रहण-दान) प्राचीन प्रथा है।
- ✦**तुलसी पत्र** — संग्रहित जल-भोजन में धुले तुलसी या कुश रखने का विधान।
- ✦**गर्भवती स्त्रियाँ** — परंपरा घर में विश्राम एवं तीक्ष्ण उपकरणों से दूरी कहती है; विश्राम स्वयं हानिकारक नहीं।
✦ वर्जित कार्य
ताज़ा भोजन पकाना-खाना; ग्रहण काल में निद्रा; देवालय में मूर्ति-पूजा; काटने-सिलने का कार्य।
✦ आधुनिक सावधानी
आंशिक ग्रहण में नंगी आँख से सूर्य की ओर कभी न देखें। ISO-12312-2 प्रमाणित ग्रहण-चश्मा या पिनहोल प्रोजेक्टर का प्रयोग करें।