प्रदक्षिणा — परिक्रमा का अभ्यास

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प्रदक्षिणा — परिक्रमा का अभ्यास

हिंदू मंदिरों, देवों एवं पवित्र वृक्षों की दक्षिणावर्ती परिक्रमा क्यों करते हैं — प्रदक्षिणा का अर्थ, विभिन्न देवों हेतु निर्धारित संख्याएँ, तथा अनुष्ठान का अंतर्भाव।

2026-05-02

लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम

पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ

✦ प्रकाशित: समीक्षित:

मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित

प्रदक्षिणा — परिक्रमा — किसी देव, मंदिर, पवित्र वृक्ष अथवा पवित्र वस्तु के चारों ओर औपचारिक चलना, सदा अपना दाहिना पक्ष केन्द्र की ओर रखते हुए। यह हिंदू पूजा के सर्वाधिक सार्वभौमिक कर्मों में से, मंदिर की लगभग प्रत्येक यात्रा में किया जाता है। अभ्यास के बाह्य अनुष्ठानिक रूप एवं आन्तरिक अर्थ दोनों हैं।

शब्द

प्रदक्षिणा प्र (आगे) तथा दक्षिण (दाहिना पक्ष, "दक्षिण" भी) से बनी। प्रदक्षिणा करना अर्थात् केन्द्र को अपने दाहिने रखना। अंग्रेजी समकक्ष — circumambulation — तकनीकी एवं अमूर्त; संस्कृत सक्रिय अभिमुखता, देव के सम्बन्ध में शरीर के निरंतर मोड़ को पकड़ती है।

दक्षिणावर्ती (दाहिना-पक्ष-अन्दर) क्यों

अनेक व्याख्याएँ संगत:

सौर संगति। सूर्य दक्षिणावर्ती गति करता है (उत्तरी गोलार्द्ध-दृष्टि में)। प्रदक्षिणा साधक की गति को सूर्य के दैनिक मार्ग से संरेखित करती है, व्यक्तिगत पूजा को ब्रह्माण्डिक लय में एकीकृत।

दाहिने पक्ष का सम्मान। शास्त्रीय हिंदू चिंतन में दाहिना पक्ष शुभ, धार्मिक है; बायाँ निष्क्रियता एवं (कुछ सन्दर्भों में) अशुद्धता से सम्बद्ध। केन्द्र को दाहिने रखना उसे साधक का बेहतर पक्ष अर्पित करता है।

हृदय-सिद्धांत। हृदय शरीर के बाएँ ओर है। जब केन्द्र साधक के दाहिने हो, हृदय वस्तुतः देव से दूर मुख करता है — जो प्रतिकूल लगता है। शास्त्रीय व्याख्या है कि साधक का दाहिना पक्ष क्रिया-शक्ति वहन करता है, तथा इस सक्रिय पक्ष का अर्पण (देव की ओर मोड़) उचित संकेत है।

निर्धारित संख्याएँ

भिन्न देवों एवं सन्दर्भों की भिन्न परंपरागत संख्याएँ:

  • **विष्णु** — 4 (अथवा 5)
  • **शिव** — अर्ध-प्रदक्षिणा (साधक गोमुखी — जिसके माध्यम से अभिषेक-जल बाहर बहता है — को नहीं पार करता, अतः नाली तक जाकर लौटता है)
  • **देवी** — 1
  • **सूर्य** — 7
  • **गणेश** — 3
  • **हनुमान** — 11 (अथवा 21)
  • **पीपल वृक्ष** — 7 (अथवा विशेष प्रयोजनों हेतु 108)
  • **आत्म-परिक्रमा** (स्थान पर दक्षिणावर्ती मुड़ना) — 1, प्रायः तब जब दीर्घ प्रदक्षिणा संभव न हो।

मंदिरों में

अधिकांश प्रमुख मंदिरों में निर्दिष्ट प्रदक्षिणा-पथ — गर्भ-गृह (आन्तरिक मंदिर) के चारों ओर पक्की पगडंडी। पथ दो व्यक्तियों के लिए पर्याप्त चौड़ा। तीर्थयात्री प्रायः मौन रूप से, हाथ जोड़े, कभी-कभी अंगुलियों पर अथवा माला से गिनते हुए, प्रदक्षिणा करते हैं।

कुछ मंदिरों में भिन्न संकेन्द्रित स्तरों पर अनेक प्रदक्षिणा-पथ — अन्तः-प्रदक्षिणा (आन्तरिक, मंदिर के चारों ओर), मध्य (केन्द्रीय भवन के चारों ओर), तथा बाह्य (सम्पूर्ण मंदिर परिसर के चारों ओर)। तीनों करना सर्वाधिक पूर्ण पूजा।

आन्तरिक अभ्यास पर सूत्र

प्रदक्षिणा अपने सरलतम पर शारीरिक कर्म है। गहरे स्तर पर, यह वर्तुलता पर ध्यान भी है: साधक अनुभव करता है कि वह केवल देव की नहीं, अपनी पूर्व-धारणाओं, जीवन-प्रतिमानों एवं स्थिर तादात्म्यों की भी परिक्रमा कर रहा है। अर्थ-केन्द्र के चारों ओर सोच-समझकर, पूर्ण ध्यान सहित घूमना स्वयं मन का अनुशासन है। अधिकांश साधक इसे व्यक्त किए बिना अनुभव करते हैं; कुछ परंपराएँ (योगिक वैष्णवदर्शन, विशेषतः) इसे स्पष्ट करती हैं।

प्रमुख प्रदक्षिणाएँ

मंदिर-अभ्यास के परे, कुछ प्रदक्षिणाएँ प्रमुख क्षेत्रीय तीर्थयात्राएँ हैं:

  • **गोवर्धन परिक्रमा** — वृन्दावन में गोवर्धन पर्वत की 21 किमी परिक्रमा।
  • **नर्मदा परिक्रमा** — पैदल सम्पूर्ण नर्मदा नदी की परिक्रमा, लगभग तीन वर्ष लेती है।
  • **काशी परिक्रमा** — वाराणसी पवित्र नगर की भिन्न लम्बाइयों की परिक्रमाएँ।
  • **अरुणाचल परिक्रमा** — अरुणाचल पर्वत (तिरुवण्णामलै) की 14 किमी परिक्रमा, रमण महर्षि से प्रसिद्ध।
  • **कैलाश परिक्रमा** — तिब्बत में कैलाश पर्वत की 52 किमी परिक्रमा, महान प्रदक्षिणाओं में सर्वाधिक श्रमसाध्य एवं पूज्य।

ये बड़ी प्रदक्षिणाएँ मंदिर-परिक्रमा के सिद्धांत को सम्पूर्ण भू-दृश्यों तक विस्तारित करती हैं — साधक एक पूर्ण पर्वत अथवा नदी के चारों ओर चलता है, उसे जीवित पवित्र केन्द्र मानते हुए।

📝सम्पादकीय टिप्पणी

इस लेख की रचना हमारी सम्पादकीय टीम ने मूल संस्कृत ज्योतिष ग्रन्थों — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, मुहूर्त चिन्तामणि, सूर्य सिद्धान्त — से प्रत्यक्ष अध्ययन के पश्चात् की है। हमने आधुनिक खगोलीय गणनाओं से इन सिद्धान्तों का सत्यापन भी किया है। यदि आपको कोई त्रुटि मिले अथवा कोई सुझाव हो तो कृपया हमें muhuratchoghadiya@gmail.com पर ईमेल करें। हम आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।

सत्यापन स्रोत: Wikipedia: Hindu CalendarPanchangamSurya SiddhantaLahiri Ayanamsa

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यदि स्थान की कमी से उचित प्रदक्षिणा संभव न हो?

आत्म-प्रदक्षिणा — स्थान पर एक अथवा तीन बार धीरे से दक्षिणावर्ती मोड़ — शास्त्रीय रूप से विकल्प के रूप में स्वीकार्य। अनेक भीड़भाड़ वाले मंदिर-गर्भगृहों में यह आवश्यक है। भाव महत्त्वपूर्ण है; रूप परिस्थितियों के अनुसार।

शिव को केवल अर्ध-प्रदक्षिणा क्यों?

अभिषेक का जल गोमुखी नाली से बाहर बहता है, संगृहीत अशुद्धियों से अनुष्ठानिक रूप से युक्त परंतु पवित्र धारा बनाता है। उसे पार करना उन अशुद्धियों को मंदिर में पुनः ले जाएगा। इस पठन में अर्ध-प्रदक्षिणा अनुष्ठानिक रूप से सजग है, धार्मिक रूप से न्यून नहीं।

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