ज्योतिर्लिंग — "प्रकाश का लिंग" — भारत के द्वादश सर्वाधिक पूजनीय शिव-क्षेत्र। शिव पुराण एवं द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र (आदि शंकराचार्य के नाम से) उन्हें नामित एवं उपमहाद्वीप भर में स्थानांकित करते हैं। बारहों का दर्शन महान हिंदू तीर्थ-यात्राओं में से, परंपरागत रूप से जीवन में एक बार।
✦ द्वादश
1. सोमनाथ, गुजरात — सौराष्ट्र तट पर प्रभास पाटण में। "प्रथम ज्योतिर्लिंग"। इतिहास में सात बार ध्वस्त एवं पुनर्निर्मित; वर्तमान मंदिर स्वतंत्रता के पश्चात् पुनर्निर्मित।
2. मल्लिकार्जुन, आंध्र प्रदेश — नल्लामला पहाड़ियों में श्रीशैलम पर। निकट देवी भ्रामराम्बा का क्षेत्र इसे ज्योतिर्लिंग एवं शक्तिपीठ दोनों बनाता है।
3. महाकालेश्वर, मध्य प्रदेश — शिप्रा पर उज्जैन में। 4 बजे प्रातः की भस्म आरती के लिए प्रसिद्ध, जब लिंग पर पवित्र भस्म लेपित — महाकाल के लिए अद्वितीय दर्शन।
4. ओंकारेश्वर, मध्य प्रदेश — नर्मदा में मांधाता द्वीप पर, ॐ अक्षर के आकार का।
5. केदारनाथ, उत्तराखण्ड — गढ़वाल हिमालय में 3,584 मीटर पर। गौरीकुण्ड से 16 किमी पैदल मार्ग। मंदिर शीत में बंद; लिंग प्रत्येक शरद् में ऊखीमठ ले जाया जाता तथा वसन्त में पुनः लाया जाता है।
6. भीमशंकर, महाराष्ट्र — पुणे के निकट सह्याद्रि में। मंदिर भीमा नदी के स्रोत पर घने वन में।
7. विश्वनाथ (काशी), उत्तर प्रदेश — गंगा-तट पर वाराणसी में। समस्त ज्योतिर्लिंगों में सर्वाधिक निरंतर-दर्शनित; काशी कॉरिडोर इसे सीधे नदी-घाटों से जोड़ता है।
8. त्र्यंबकेश्वर, महाराष्ट्र — नासिक के पास, गोदावरी के स्रोत पर। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र — तीन मुख वाला लिंग।
9. वैद्यनाथ (बैद्यनाथ धाम), झारखण्ड — देवघर में। परंपरा रावण की कैलाश से लिंग प्राप्ति की तीव्र तपस्या से सम्बद्ध करती है। यहाँ की श्रावण कांवड़ यात्रा भारत की सबसे बड़ी यात्राओं में से।
10. नागेश्वर, गुजरात — द्वारका के पास, पश्चिमी सौराष्ट्र तट पर। शिव पुराण में दानव दारुक एवं उनकी राक्षसी पत्नी दारुकी से सम्बद्ध।
11. रामेश्वरम्, तमिलनाडु — पम्बन द्वीप पर, जहाँ राम ने लंका-गमन से पूर्व शिव-लिंग की स्थापना की। मंदिर का गलियारा किसी भी हिंदू क्षेत्र में सर्वाधिक लम्बा — एक किलोमीटर से अधिक।
12. घृष्णेश्वर, महाराष्ट्र — औरंगाबाद के पास वेरुल में, एलोरा गुफाओं के निकट। स्तोत्र में "अंतिम" ज्योतिर्लिंग।
✦ भौगोलिक प्रतिमान
मानचित्र पर देखने से, द्वादश ज्योतिर्लिंग प्रभावी रूप से उपमहाद्वीप को आवृत करते हैं: गुजरात में दो (पश्चिम तट), महाराष्ट्र में तीन (दक्कन), म.प्र. में दो (केन्द्र), उत्तराखण्ड में एक (हिमालय), उ.प्र. में एक (गंगा-मैदान), आंध्र में एक (दक्षिण दक्कन), झारखण्ड में एक (पूर्व), तमिलनाडु में एक (दक्षिण-छोर)। प्रतिमान स्पष्ट रूप से सोचा-समझा है — सम्पूर्ण सभ्यता-भूगोल पर शैव-उपासना का जाल।
✦ "ज्योतिर्लिंग" का अर्थ
ज्योति प्रकाश; लिंग शिव का अमूर्त चिह्न (खड़ा स्तम्भ)। शैव सिद्धांत में ज्योतिर्लिंग वह स्थान है जहाँ शिव ने स्वयं को अनादि-अनंत प्रकाश-स्तम्भ रूप में प्रकट किया कहा जाता है। शिव पुराण की लिंगोद्भव-कथा बताती है कि ब्रह्मा ऊपर उड़े एवं विष्णु नीचे डूबे — इस प्रकाश-स्तम्भ के सिरे ढूँढने हेतु; कोई सफल नहीं हुआ। द्वादश भौगोलिक स्थल इस आदि-प्रकटन के विशिष्ट लंगर-स्थल माने जाते हैं।
✦ व्यावहारिक तीर्थ-सूत्र
पूर्ण द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा सड़क-मार्ग से 4-6 सप्ताह, अथवा वायु-सड़क से 10-14 दिन। अधिकांश तीर्थयात्री खण्डों में करते हैं — एक यात्रा में उत्तर भारतीय समूह, अन्य में दक्षिण भारतीय। केदारनाथ एवं रामेश्वरम्, उपमहाद्वीप के विपरीत छोरों पर, दोनों भौतिक रूप से कठिन एवं सर्वाधिक अंत में सहेजे जानेवाले समापन।
बारहों के दर्शन का शास्त्रीय संकल्प — तीर्थयात्री के व्यक्तिगत पुण्य के परे — भारत के अपने भौगोलिक अनुभव को इसके पवित्र भूगोल से बाँधने का साधन है। इस पठन में यात्रा धार्मिक एवं सभ्यतामूलक दोनों है।