सोमवार — सोम (चंद्र) से नामांकित, हिंदू परंपरा में शिव-समर्पित (जिनके मस्तक पर चंद्र-कला विराजमान है)। सोमवार व्रत साप्ताहिक व्रतों में सर्वाधिक प्रचलित है, तीन प्रमुख रूपों में पालित।
✦ तीन रूप
1. सामान्य सोमवार व्रत किसी भी सोमवार को एक-दिवसीय व्रत। सूर्योदय से संध्या तक उपवास; शिव-आरती से पारणा एवं एक सात्विक भोजन। बच्चे, वृद्ध, अस्वस्थ — सभी संशोधित रूप (फल-दूध दिनभर, एक भोजन) में रख सकते हैं।
2. सोलह सोमवार व्रत सोलह क्रमिक सोमवार। प्रायः श्रावण अथवा आषाढ़ शुक्ल पक्ष में आरंभ, अंत में सोलह वस्तुओं (सोलह दीप, सोलह पुष्प आदि) के अर्पण सहित संक्षिप्त उद्यापन। परंपरागत रूप से अविवाहित स्त्रियों द्वारा सुयोग्य जीवन-साथी हेतु, परंतु निरंतर अनुशासन-साधक कोई भी रख सकता है।
3. श्रावण सोमवार श्रावण मास के चार (कभी-कभी पाँच) सोमवारों का विशेष व्रत। श्रावण शिव-मास है तथा अनुशासन गंभीरता से पालित — एक के बाद एक सोमवार, विस्तृत शिव-मंदिर गमन सहित।
✦ दैनिक विधि
- 1**प्रात:पूर्व स्नान**, स्वच्छ वस्त्र (श्वेत अथवा गेरुआ)।
- 2**संकल्प** — संक्षिप्त मानसिक कथन: "इस सोमवार मैं परिवार के कल्याण एवं शिव-भाव की गहराई हेतु यह व्रत स्वीकार करता हूँ।"
- 3**शिव-पूजा** — गृह-मंदिर अथवा शिवालय में लिंग पर अभिषेक; जल, दूध, मधु; बिल्व पत्र, श्वेत पुष्प, धूप, दीप।
- 4**मंत्र-जप** — ॐ नमः शिवाय (108 आवृत्ति)। महामृत्युंजय जो अभ्यस्त हों।
- 5**दिनभर उपवास** — जल, दूध, फल, सबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा अनुमत। अनाज, नमक, लहसुन-प्याज वर्जित।
- 6**संध्या-आरती**, सात्विक भोजन से पारणा।
✦ व्रत का अंतर्भाव
आहार-नियम महत्वपूर्ण हैं — परंतु गहरा नियम है वाक्-तप: एक दिन का वाणी-संयम। कटु वचन, परनिंदा एवं तीखी वार्ता व्रत के भाव को नष्ट करती हैं चाहे उपवास तकनीकी रूप से पालित हो। सोमवार व्रत — शास्त्रीय रूप से — अल्पकालिक तपस्या का अभ्यास है: यह पूछने का कि वस्तुतः क्या चाहिए तथा किसके बिना संभव है।