नाग पंचमी — सर्प-पूजा

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नाग पंचमी — सर्प-पूजा

श्रावण शुक्ल पंचमी — ब्रह्माण्डिक सर्पों का दिवस। पौराणिक पृष्ठभूमि, दूध-पुष्प के साथ सरल गृह-विधि, तथा कृषि भारत में पर्व की पारिस्थितिक प्रासंगिकता।

2026-05-02

लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम

पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ

✦ प्रकाशित: समीक्षित:

मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित

नाग पंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी (ग्रेगोरियन में जुलाई-अंत से अगस्त-मध्य) पर। पर्व नागों — हिंदू ब्रह्माण्ड-विद्या के सर्प-जीव, प्रायः मानव-मस्तक एवं सर्प-शरीर सहित चित्रित, पाताल-निवासी, बुद्धि एवं प्रचुर शक्ति के स्वामी — को समर्पित।

पौराणिक पृष्ठभूमि

अनेक कथाएँ पर्व-मूल में संगत। गरुड़ पुराण एवं महाभारत — दोनों — राजा जनमेजय (अर्जुन के प्रपौत्र) के नाग-यज्ञ की कथा कहते हैं, जिन्होंने तक्षक के दंश से मृत पिता परीक्षित का प्रतिशोध लेने हेतु संसार से सर्पों के विनाश का प्रयास किया। ऋषि आस्तीक ने श्रावण शुक्ल पंचमी पर हस्तक्षेप कर यज्ञ रोका। दिवस, इस पाठ में, वह है जब सर्प बचे एवं मनुष्य-सर्प के बीच पारस्परिक अहिंसा की संधि हुई।

द्वितीय कथा भागवत पुराण से: कृष्ण ने यमुना को विषाक्त करनेवाले सर्प कालिय को पराजित कर वशीभूत किया। कुछ समुदाय इस घटना के स्मरण में नाग पंचमी मनाते हैं।

सरल गृह-विधि

  1. 1**स्नान, स्वच्छ वस्त्र** प्रात:।
  2. 2**नौ सर्पों का चित्र** स्वच्छ दीवार पर, अथवा कागज पर, गृह-मंदिर में। परंपरागत सामग्री: गोबर की रेखाएँ एवं हल्दी-कुमकुम की रूपरेखा।
  3. 3**अर्पण**: दूध का पात्र, श्वेत पुष्प (आदर्श कमल; चमेली अथवा चम्पा विकल्प), हल्दी, कुमकुम, श्वेत चावल, दूर्वा, प्रज्ज्वलित दीप।
  4. 4**मंत्र** — "अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्। शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥ एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्॥" (नौ प्रमुख नागों के नाम; इनका पाठ गृह-पूजा का हृदय)।
  5. 5**खुदाई-वर्जन** — गृह परंपरागत रूप से इस दिन खुदाई, हल-चलन अथवा भू-कार्य से बचता है, क्योंकि सर्प पृथ्वी-निवासी हैं तथा पर्व का भाव अव्यवधान है।
  6. 6**दान** — दूध, अन्न अथवा द्रव्य का लघु दान। कुछ समुदाय इस दिन सर्प-रक्षण संस्थाओं को दान करते हैं।

जीवित सर्पों पर सूत्र

भारत के कुछ भागों में — विशेषतः महाराष्ट्र एवं बंगाल — नाग पंचमी पर ऐतिहासिक रूप से पकड़े गए जीवित सर्पों को सीधे दूध-अर्पण होता रहा। आधुनिक वन्यजीव चिकित्सक इसे अत्यधिक हतोत्साहित करते हैं। सर्प जैविक रूप से दूध पचाने में अक्षम हैं तथा प्रायः बलात् नियंत्रित एवं विष-दन्त-निष्कासित कर प्रदर्शित किए जाते हैं। अनेक भारतीय राज्य अब इसे विधिक रूप से प्रतिबंधित करते हैं, तथा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम जंगली सर्पों के पकड़ने एवं प्रदर्शन को निषिद्ध करता है। नाग पंचमी का परंपरागत भाव — सर्पों को न-हानि तथा आस्तीक की संधि का पालन — वस्तुतः सर्पों को जंगल में छोड़कर एवं दूध को गृह में सर्प-छवि को सांकेतिक रूप से अर्पित करके बेहतर पालित होता है।

पारिस्थितिक पाठ

कृषि भारत में सर्प चूहों एवं फसल-नाशक कुतरनेवालों के प्राथमिक प्राकृतिक शिकारी हैं। स्वस्थ सर्प-जनसंख्या वाले खेत में चूहे कम तथा अनाज-संरक्षण बेहतर। नाग पंचमी की उस दिवस के रूप में स्थापना जिस पर सर्पों को हानि नहीं — शताब्दियों से सामुदायिक पारिस्थितिक समझौते के रूप में काम करती आई है — वर्ष में कम-से-कम एक दिन भय-प्रेरित हत्या से विराम, सांस्कृतिक स्मृति व्यापक सहिष्णुता तक ले जाती है। पर्व, इस पाठ में, धार्मिक आचार में निहित जैव-विविधता संरक्षण का प्राचीन स्वरूप है।

📝सम्पादकीय टिप्पणी

इस लेख की रचना हमारी सम्पादकीय टीम ने मूल संस्कृत ज्योतिष ग्रन्थों — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, मुहूर्त चिन्तामणि, सूर्य सिद्धान्त — से प्रत्यक्ष अध्ययन के पश्चात् की है। हमने आधुनिक खगोलीय गणनाओं से इन सिद्धान्तों का सत्यापन भी किया है। यदि आपको कोई त्रुटि मिले अथवा कोई सुझाव हो तो कृपया हमें muhuratchoghadiya@gmail.com पर ईमेल करें। हम आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।

सत्यापन स्रोत: Wikipedia: Hindu CalendarPanchangamSurya SiddhantaLahiri Ayanamsa

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या मुझे वस्तुतः नाग पंचमी पर बगीचे में खुदाई से बचना चाहिए?

परंपरागत नियम कोमल है। इस एक दिन बड़े भू-व्यवधान कार्य से बचें; सामान्य सिंचन अथवा हल्की बागवानी ठीक है। भाव पृथ्वी में निवासी का सम्मान है, पूर्ण अकर्मण्यता नहीं।

क्या पत्थर की सर्प-छवि को दूध-अर्पण प्रभावी है?

हाँ — तथा यह वस्तुतः अनुष्ठान का अधिक प्रामाणिक हिंदू स्वरूप है। शास्त्रीय पूजा सदा देव-छवि की रही है, जीवित पशुओं की नहीं; जीवित-सर्प प्रथा लोक-विकल्प है जिसने वास्तविक पशु-कल्याण-हानि की है। मंदिरों एवं गृह-वेदियों पर पत्थर की नाग-छवियाँ पूजा का परंपरागत माध्यम।

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