मौनी अमावस्या माघ मास की अमावस्या है (ग्रेगोरियन में जनवरी-अंत से फरवरी-मध्य)। नाम मौन + अमावस्या से बना है। यह माघ मेला एवं प्रयागराज कुम्भ का प्रमुख स्नान-दिवस है।
✦ मौन क्यों?
मन का अपना गुरुत्व-चक्र — अमावस्या पर ज्वार-भाटे पर चंद्र-खिंचाव चरम पर, रात्रि अंधतम, अनेक संस्कृतियाँ इसे चक्र का निम्न-ऊर्जा बिंदु मानती हैं। इस दिन का मौन प्रकृति के मौन से मेल खाता है।
वाणी सूक्ष्मतम कर्म है — एक दिन का मौन दिखाता है कि सामान्य वाणी कितनी अशांत है — अनावश्यक, पुनरावृत्त, प्रदर्शनात्मक। कुछ घंटों का मौन भी दर्पण बन जाता है।
माघ मनु-मुनि से सम्बद्ध है — मौनी का व्युत्पत्तिक संबंध मुनि शब्द से है। इस दिन का मुनि-व्रत मुनि के मौन को आदर्श बनाता है।
✦ विधि
- 1**प्रात:पूर्व-स्नान** — सूर्योदय से पूर्व नदी अथवा पवित्र जल में स्नान। प्रयाग में त्रिवेणी-स्नान; अन्यत्र गंगाजल-छिड़क सहित स्वच्छ जल पर्याप्त।
- 2**मौन** — प्रात: से दोपहर तक, अथवा यथासम्भव अधिक। सुरक्षा-सेवा हेतु आवश्यक वाणी अनुमत; अनावश्यक वार्तालाप, सामाजिक माध्यम, दूरदर्शन स्थगित।
- 3**मंत्र-जप** — मौन मंत्र-जप; गायत्री मंत्र (108 आवृत्ति) सामान्य चयन।
- 4**उपवास या सात्विक भोजन** — दिन भर का व्रत, संध्या में सात्विक भोजन से पारणा। जहाँ संभव न हो, दोपहर का एकल लघु भोजन।
- 5**दान** — काले तिल, गर्म वस्त्र (माघ शीत-काल), अन्न।
✦ व्यावहारिक सूत्र
यदि पूर्ण-दिन मौन परिस्थिति के अनुकूल न हो, प्रात:काल का 90-मिनट का मौन — फोन बंद, वाणी विराम, मंत्र-जप अथवा मौन-आसन — पर्व का भाव सहेजता है।