कर्म का शास्त्रीय हिंदू सिद्धांत "जो बोओगे वही काटोगे" से अधिक सूक्ष्म है। योग सूत्र एवं वेदान्त भाष्य कर्म को तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत करते हैं — संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण — तथा यह अंतर महत्त्वपूर्ण है कि कोई अपने जीवन को कैसे देखे।
✦ संचित — संगृहीत कर्म
संचित का शाब्दिक अर्थ "ढेर लगाया गया"। यह सब जन्मों में संगृहीत कर्म का पूर्ण भण्डार — व्यक्तिगत आत्मा द्वारा कभी निष्पादित प्रत्येक कर्म, जिसके फल अभी भी प्रतीक्षित। यह अव्यक्त बकाया है। अधिकांश संचित कर्म वर्तमान जीवन में प्रकट नहीं होते; संचित में रहते हैं, प्रतीक्षारत।
✦ प्रारब्ध — फल देने लगा कर्म
प्रारब्ध का शाब्दिक अर्थ "आरंभ किया हुआ"। यह संचित का वह भाग जो वर्तमान जीवन हेतु "मुक्त" किया गया — वह कर्म जो इस जन्म को विशिष्ट परिवार, शरीर, काल, स्थान, अवसर एवं सीमाएँ देता है। प्रारब्ध इस जीवन में निश्चित है: कोई अपने माता-पिता, जन्म-परिस्थितियाँ, अथवा शरीर की मूल प्रकृति नहीं बदल सकता। शास्त्रीय भाष्य प्रारब्ध को "छोड़ा गया तीर" कहता है — एक बार छोड़ा, उसका मार्ग पूर्ण होना चाहिए।
✦ क्रियमाण — अब बनाया जा रहा कर्म
क्रियमाण (आगामी भी कहा जाता) वह कर्म जो अभी, वर्तमान कर्मों से, बनाया जा रहा है। प्रत्येक चयन, कर्म, विचार क्रियमाण में जुड़ता है। अधिकांश क्रियमाण इस जीवन में फल नहीं देगा; वह संचित-भण्डार में मिलकर किसी भविष्य जन्म में प्रकट होगा।
✦ व्यावहारिक महत्त्व
त्रिविध विभाजन कर्म-सिद्धांत के तनाव को सुलझाता है। यदि सब पूर्व कर्म से निर्धारित है, तो वर्तमान प्रयास का क्या उपयोग? शास्त्रीय उत्तर सटीक:
- ✦प्रारब्ध निश्चित है — कोई प्रयास इस जीवन की मूल परिस्थितियाँ नहीं बदलता।
- ✦क्रियमाण पूर्णतः स्वतंत्र — अभी के चयन वस्तुतः स्वयं के हैं।
- ✦संचित आत्म-ज्ञान से समाप्त हो सकता है — महान आध्यात्मिक शाखाएँ (विशेष वेदान्त) मानती हैं कि आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान सम्पूर्ण संचित भण्डार को जला देता है।
अतः व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रारब्ध की सीमाओं में संचालित होती है, क्रियमाण से बेहतर अथवा बदतर भविष्य गढ़ती है, जबकि आध्यात्मिक अभ्यास — अनेक जन्मों में अथवा इसी में — बड़े संचित भण्डार को जला सकता है।
✦ सामान्य भ्रम
कर्म दैवी हिसाब-किताब रखनेवाले द्वारा भेजा गया दण्ड नहीं। शास्त्रीय समझ है कि कर्म कारण-प्रभाव का प्राकृतिक नियम है जो सूक्ष्म एवं स्थूल दोनों स्तरों पर काम करता है। गलत कर्म परिणाम उत्पन्न करता है इसलिए नहीं कि कोई गिनती रख रहा है, बल्कि इसलिए कि कर्म स्वयं, अपनी प्रकृति से, कर्ता के मन, शरीर, सम्बन्धों एवं परिस्थितियों में कुछ प्रभाव गति में लाता है। सिद्धांत न्यायालय-न्याय से अधिक भौतिकी के निकट है।