पुरुषार्थ-सिद्धांत — महाभारत में प्रथम व्यक्त, धर्मशास्त्रों में विकसित — मानव जीवन के चार वैध लक्ष्य नामित करता है: धर्म (सम्यक् आचरण, नैतिक व्यवस्था), अर्थ (भौतिक सुरक्षा, आजीविका, धन), काम (वैध सुख, प्रेम, सौन्दर्य), तथा मोक्ष (मुक्ति, आध्यात्मिक लक्ष्य)। चारों वैध हैं; कोई अकेला पर्याप्त नहीं।
✦ धर्म
धर्म वह है जो वस्तुओं को एक साथ धारण करता है — व्यक्ति एवं समाज दोनों के लिए। व्यक्ति के लिए यह "मुझे क्या करना चाहिए?" का उत्तर है — मेरी भूमिका, उत्तरदायित्व, समय एवं स्थान को देखते हुए। समाज के लिए यह पारस्परिक उत्तरदायित्वों का अकथित संग्रह है जो सामूहिक जीवन को कार्यशील रखता है। शास्त्रीय ग्रंथ (मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति) धर्मों का विस्तार से वर्णन करते हैं; भाव विवरण के नीचे एक है: ऐसे आचरण करो जो अपनी विशिष्ट भूमिका का सम्मान करते हुए बड़ी व्यवस्था बनाए रखे।
✦ अर्थ
अर्थ भौतिक पक्ष: आजीविका, सम्पत्ति, राजनैतिक एवं आर्थिक सुरक्षा। शास्त्रीय रवैया सकारात्मक है — अर्थ आवश्यक है, लज्जाजनक नहीं। महाभारत के भीष्म युधिष्ठिर को सिखाते हैं कि अर्थ-रहित न धर्म टिक सकता है न काम; भूखा मनुष्य नीति नहीं सम्भाल सकता, निर्धन व्यक्ति वैध सुख का पीछा नहीं कर सकता। कौटिल्य का अर्थशास्त्र इस लक्ष्य का शास्त्रीय ग्रंथ है। पकड़: अर्थ धर्म की सेवा करे, विपरीत नहीं।
✦ काम
काम इच्छा, सुख, कला, संगीत, प्रेम — जीवन के वे आयाम जो सौन्दर्य, आनन्द एवं भावात्मक पूर्ति से सम्बद्ध हैं। वात्स्यायन का कामसूत्र शास्त्रीय ग्रंथ; शास्त्रीय संस्कृत काव्य, नाटक एवं वास्तुकला काम को समृद्ध रूप से विकसित मानते हैं। हिंदू परंपरा, इस दृष्टि से, संन्यासी से अधिक संसार-समर्थक है — काम जीवन के वैध लक्ष्यों में से एक है, बचने की प्रलोभना नहीं।
✦ मोक्ष
मोक्ष मुक्ति है — जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म-चक्र से तथा अहंकार-बद्ध तादात्म्य जो दु:ख को संचालित करता है, उससे रिहाई। विभिन्न हिंदू दर्शन (वेदान्त, योग, सांख्य, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक) सभी अंततः मोक्ष को लक्ष्य करते हैं, यद्यपि भिन्न मार्गों से। मोक्ष अंतिम लक्ष्य है — वह जो शेष तीन को अर्थ देता है।
✦ क्रम महत्त्वपूर्ण
शास्त्रीय सूत्रीकरण इसी क्रम में धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष है। क्रम अर्थपूर्ण है:
- ✦धर्म अर्थ एवं काम दोनों को सीमित करता है। सम्यक् आचरण की मर्यादा में सम्पत्ति एवं सुख।
- ✦अर्थ एवं काम, धर्म-धारित पीछा करने पर, परस्पर सहायक। स्थिर आजीविका स्थिर परिवार की अनुमति देती है; वैध सुख जीवन के कार्य को धारणीय बनाता है।
- ✦मोक्ष प्रथम तीन के विरोध में नहीं, उन्हें पूर्ण करता है। शास्त्रीय गृहस्थ धर्म का सम्मान, पर्याप्त अर्थ का संग्रह, वैध काम का उपभोग — एवं जीवन के परिपक्व होने पर — मोक्ष की ओर बढ़ने की अपेक्षा।
✦ चारों के विकृत होने की दिशाएँ
धर्म-रहित अर्थ — नीति-रहित सम्पत्ति। शास्त्रीय नाम अधर्म; महाभारत मूलतः इस भ्रष्टाचार के परिणामों का दीर्घ अध्ययन है।
धर्म-रहित काम — संयम-रहित सुख। पारिवारिक विघटन, सामाजिक संघर्ष, व्यक्तिगत थकान।
मोक्ष-रहित धर्म — कर्तव्य-अनुक्रम के रूप में जीवन, बड़ा प्रश्न पूछे बिना। शास्त्रीय परंपराएँ इसे अपूर्ण मानती हैं।
पलायन-रूप मोक्ष — धर्म एवं अर्थ टालने हेतु आध्यात्मिक लक्ष्य। भगवद् गीता मूलतः इस स्थिति का खण्डन है; कृष्ण अर्जुन से वन को नहीं, अपना समुचित युद्ध लड़ने को कहते हैं।
✦ गृहस्थ का पठन
पुरुषार्थ-ढाँचा संसार के धर्मों में असामान्य है — भौतिक सुरक्षा एवं वैध सुख को पूर्ण वैधता प्रदान करने में। युवा गृहस्थ से लौकिक संलग्नता एवं आध्यात्मिक लक्ष्य के बीच चयन की अपेक्षा नहीं — एकीकरण की अपेक्षा। शास्त्रीय समझ है कि चारों एक सुयोजित जीवन के पक्ष हैं, तथा जीवन की बुद्धिमत्ता उन्हें संतुलन में रखने में है, एक में संकुचित करने में नहीं।