गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (ग्रेगोरियन में मई-अंत से जून-मध्य) पर पड़ता है। पुराण-कथा के अनुसार इसी दिन गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुईं।
✦ कथा
वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड एवं भागवत पुराण में कथा है। राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों ने कपिल मुनि को यज्ञ-अश्व चुराने का दोष दिया तो उनके तप से भस्म हो गए। उनकी मुक्ति हेतु दिव्य गंगा का जल भस्म पर पहुँचना आवश्यक था। सगर के वंशजों की पीढ़ियों ने प्रयास किया परंतु केवल भगीरथ ने तपस्या से सिद्धि पाई। पृथ्वी का संरक्षण हेतु शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण किया तथा नियंत्रित धारा में मुक्त किया। जिस दिन गंगा ने पृथ्वी का स्पर्श किया, वही गंगा दशहरा है।
✦ दश-पाप-हारिणी
पर्व का अन्य नाम दश-पाप-हारिणी है। शास्त्रीय सूची:
काय — अदत्तादान, हिंसा, परदारगमन वाक् — असत्य, परुष-वचन, परनिंदा, असम्बद्ध-प्रलाप मन — परधन-स्पृहा, परद्रोह, मिथ्या-दृष्टि
इस दिन गंगा-स्नान, इन प्रवृत्तियों के सजग स्मरण एवं संशोधन-संकल्प सहित, पर्व का आध्यात्मिक हृदय है।
✦ विधि
- 1**स्नान** — गंगा अथवा किसी पवित्र नदी, अथवा किसी प्राकृतिक जलाशय, अथवा अंत में घरेलू जल में गंगाजल की कुछ बूँदें मिलाकर।
- 2**संकल्प** — दिवस-नाम तथा अपने संकल्प का संक्षिप्त मानसिक कथन।
- 3**दान** — दस वस्तुओं का दान: तिल, जल, दूध, घी, दही, चीनी, मधु, फल, ताम्बूल, मुद्रा।
- 4**पूजा** — गंगा, शिव, भगीरथ की संक्षिप्त पूजा; दीपक, पुष्प, गंगा स्तोत्र अथवा सरल हिंदी प्रार्थना।
✦ स्वरूप
गंगा दशहरा शांत भाव से पालित होता है तथा हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज में प्रमुख स्नान-दिवसों में से है। पर्व का स्वभाव चिंतनात्मक है, उसकी कोमल मात्रा अंतर्मुख भाव के अनुकूल है।