संकष्टी चतुर्थी — हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को समर्पित मासिक व्रत। प्रत्येक चन्द्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। "संकष्टी" शब्द का अर्थ है "संकट हरने वाली" — यह व्रत समस्त प्रकार के संकटों, बाधाओं, एवं विघ्नों को दूर करता है।
वर्ष में 12-13 संकष्टी चतुर्थी आती हैं। प्रत्येक का अपना नाम एवं विशेष महत्व है — माघी संकष्टी (माघ मास), लम्बोदर संकष्टी (पौष), द्विजप्रिय संकष्टी (माघ), विकट संकष्टी (फाल्गुन), इत्यादि। इस लेख में हम सम्पूर्ण संकष्टी चतुर्थी व्रत — महत्व, विधि, मन्त्र, कथा, एवं 2026 की सभी 12 तिथियों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
✦ संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
पुराणों में संकष्टी चतुर्थी का उल्लेख विभिन्न स्थानों पर मिलता है। गणेश पुराण, स्कन्द पुराण, एवं नारद पुराण में इसकी विस्तृत महिमा वर्णित है। शिव पुराण के अनुसार जब भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया, तो भगवान गणेश ने उन्हें संकष्टी व्रत का उपदेश दिया था।
एक अन्य कथा के अनुसार, माता पार्वती ने पहली बार संकष्टी व्रत पुत्र कार्तिकेय की कुशलता हेतु किया था — कार्तिकेय असुरों से युद्ध में थे। व्रत के प्रभाव से कार्तिकेय विजयी हुए। तभी से यह व्रत संकट-निवारण एवं सन्तान-कल्याण हेतु प्रसिद्ध है।
भगवान गणेश "विघ्नहर्ता" हैं — सभी विघ्नों के नाशक। संकष्टी व्रत से किए गए कार्य निर्विघ्न पूर्ण होते हैं, सन्तान कल्याण होता है, घर में सुख-शान्ति आती है, एवं रोगों से मुक्ति मिलती है। यह व्रत विशेष रूप से गृहिणियों, छात्रों, एवं नये कार्य आरम्भ करने वालों के लिए शुभ माना जाता है।
✦ संकष्टी व्रत विधि — सम्पूर्ण प्रक्रिया
प्रातःकाल: सूर्योदय से पूर्व उठें, स्नान करें (गंगाजल मिलाकर तो श्रेष्ठ), लाल/पीले वस्त्र धारण करें। पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। ब्रह्म मुहूर्त में "ॐ गं गणपतये नमः" मन्त्र का 108 बार जाप करें।
व्रत संकल्प: हाथ में जल, चावल, फूल लेकर संकल्प लें — "मैं _____ (अपना नाम) आज _____ (तिथि) को संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की कृपा हेतु, समस्त संकटों से मुक्ति हेतु, एवं _____ (कोई विशेष इच्छा) हेतु करता/करती हूँ।" जल अर्पण करें।
दिन भर का नियम: निराहार व्रत रखें (जल भी कुछ सम्प्रदायों में नहीं — परंतु अधिकांश में जल, फल, दूध स्वीकार्य)। नमक एवं अन्न (अनाज) पूर्णतः वर्जित। केवल फलाहार स्वीकार्य — फल, दूध, नारियल जल, साबूदाना (फलाहारी)।
गणेश पूजन: एक चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएँ। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा अथवा चित्र रखें। पंचोपचार पूजन — गंगाजल से स्नान, सिंदूर तिलक, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पण। मोदक, लड्डू, दूर्वा (21 अथवा 11 पत्ती) विशेष प्रिय।
मन्त्र जाप: संकष्टी पर "ॐ गं गणपतये नमः" का 108 अथवा 1008 बार जाप अत्यंत फलदायी। गणेश गायत्री मन्त्र — "ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्" का भी 11/21/108 बार जाप।
चन्द्र दर्शन एवं अर्घ्य: संकष्टी का व्रत चन्द्र दर्शन के पश्चात् ही खोला जाता है। चन्द्रोदय के समय (रात 8-10 बजे के बीच, स्थान अनुसार) चन्द्रमा को जल, दूध, चावल मिश्रित अर्घ्य दें। "ॐ सोमाय नमः" मन्त्र बोलें। तत्पश्चात् भगवान गणेश को मोदक/लड्डू अर्पण करके स्वयं प्रसाद ग्रहण करें।
संकष्टी कथा: चन्द्र दर्शन के बाद संकष्टी कथा (उस मास की विशिष्ट कथा) सुनें अथवा पढ़ें। प्रत्येक मास की कथा अलग है — माघी संकष्टी की कथा अलग है, द्विजप्रिय संकष्टी की कथा अलग। अंत में आरती करें।
दान: अगले दिन प्रातः ब्राह्मण-भोज एवं दान। तिल, गुड़, गन्ना, कम्बल, गणेश-मूर्ति, दूर्वा अर्पण करें। यह व्रत तब पूर्ण माना जाता है।
✦ भगवान गणेश के 12 रूप — मासिक संकष्टी
प्रत्येक मास की संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के एक विशिष्ट रूप का पूजन होता है। यह 12 रूप हैं:
चैत्र (अप्रैल): विकट महागणपति — विघ्न नाशक, मूषक वाहन। वैशाख (मई): चिन्तामणि गणपति — मनोकामना पूर्तिकर्ता। ज्येष्ठ (जून): गणनायक गणपति — समूह नेतृत्व। आषाढ़ (जुलाई): एकदन्त गणपति — एक दाँत वाले, ज्ञान-दाता। श्रावण (अगस्त): विभुवन गणपति — तीनों लोकों के स्वामी।
भाद्रपद (सितम्बर): वक्रतुण्ड गणपति — टेढ़ी सूँड वाले, दुष्ट-नाशक। (इसी मास में गणेश चतुर्थी का विशेष पर्व — शुक्ल चतुर्थी।) आश्विन (अक्टूबर): विघ्न संकष्टी — विघ्नहर्ता। कार्तिक (नवम्बर): गणाधिप संकष्टी — गणों के अधिपति। मार्गशीर्ष (दिसम्बर): अखूरथ संकष्टी — मूषक रथ पर सवार।
पौष (जनवरी): लम्बोदर संकष्टी — विशाल उदर वाले। माघ (फरवरी): द्विजप्रिय संकष्टी (अथवा सकट चौथ) — ब्राह्मण-प्रिय। फाल्गुन (मार्च): भालचन्द्र संकष्टी (अथवा गणेश जयंती) — भगवान गणेश के मस्तक पर चन्द्र।
प्रत्येक रूप का अपना विशिष्ट मन्त्र, उपाय, एवं फल है। माघी संकष्टी (माघ मास की कृष्ण चतुर्थी, जिसे "सकट चौथ" भी कहते हैं) — विशेषतः उत्तर भारत में सन्तान-कल्याण हेतु प्रसिद्ध। माताएँ अपने पुत्रों की दीर्घायु हेतु इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं।
✦ 2026 के सभी संकष्टी चतुर्थी व्रत
2026 में 13 संकष्टी चतुर्थी हैं (एक मास में अधिक तिथि के कारण):
7 जनवरी (बुधवार): लम्बोदर संकष्टी (पौष कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 8:43 PM। 5 फरवरी (गुरुवार): द्विजप्रिय/सकट चौथ संकष्टी (माघ कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 8:35 PM। उत्तर भारत में सबसे प्रसिद्ध। 7 मार्च (शनिवार): भालचन्द्र संकष्टी (फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:15 PM।
5 अप्रैल (रविवार): विकट महागणपति संकष्टी (चैत्र कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:25 PM। 5 मई (मंगलवार): चिन्तामणि गणपति संकष्टी (वैशाख कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:50 PM। 3 जून (बुधवार): गणनायक संकष्टी (ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 10:05 PM।
3 जुलाई (शुक्रवार): एकदन्त संकष्टी (आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:45 PM। 1 अगस्त (शनिवार): विभुवन गणपति संकष्टी (श्रावण कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:30 PM। 31 अगस्त (सोमवार): वक्रतुण्ड संकष्टी (भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:15 PM।
29 सितम्बर (मंगलवार): विघ्न संकष्टी (आश्विन कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 9:00 PM। 29 अक्टूबर (गुरुवार): गणाधिप संकष्टी (कार्तिक कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 8:45 PM। 27 नवम्बर (शुक्रवार): अखूरथ संकष्टी (मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 8:30 PM। 27 दिसम्बर (रविवार): लम्बोदर संकष्टी (पौष कृष्ण चतुर्थी)। चन्द्रोदय 8:15 PM।
✦ संकष्टी व्रत के लाभ
पारम्परिक रूप से माना जाता है कि संकष्टी व्रत से अनेक लाभ मिलते हैं। प्रमुख फल: समस्त प्रकार के संकट निवारण, बाधाओं एवं विघ्नों का नाश, सन्तान कल्याण एवं लम्बी आयु, आर्थिक सम्पन्नता, स्वास्थ्य लाभ, गृह-सुख एवं वैवाहिक सुख। नये कार्य आरम्भ करने से पूर्व यह व्रत विशेष फलदायी।
विशेष फल हेतु विशेष संकष्टी: माघी संकष्टी (सकट चौथ) — पुत्र-कल्याण। चैत्र संकष्टी — स्वास्थ्य लाभ। श्रावण संकष्टी — व्यवसाय में सफलता। मार्गशीर्ष संकष्टी — विद्या प्राप्ति। पौष संकष्टी — धन प्राप्ति। प्रत्येक मास की संकष्टी का अपना विशेष "क्षेत्र" है।
आधुनिक संदर्भ में संकष्टी व्रत का महत्व बढ़ रहा है — तनाव, आर्थिक चिंताओं, करियर-दबाव से मुक्ति हेतु लोग इस व्रत का सहारा ले रहे हैं। महिलाओं, छात्रों, उद्यमियों के बीच विशेष लोकप्रिय।
📊12 मासिक संकष्टी-चतुर्थी 2026 — पूर्ण-तालिका
| मास | दिनांक | विशेष-नाम | विशेष-फल |
|---|---|---|---|
| माघ | 11 जनवरी 2026 (रवि) | सकट-चौथ / तिलकुटी | पुत्र-कल्याण, सबसे-बड़ा-व्रत |
| फाल्गुन | 9 फरवरी (सोम) | द्विजप्रिय | द्विज-कल्याण |
| चैत्र | 11 मार्च (बुध) | भालचन्द्र | स्वास्थ्य-वृद्धि |
| वैशाख | 10 अप्रैल (शुक्र) | विकट | भयंकर-समस्या-निवारण |
| ज्येष्ठ | 9 मई (शनि) | एकदन्त | ज्ञान-वृद्धि |
| आषाढ़ | 8 जून (सोम) | कृष्णपिंगल | पाप-मोचन |
| श्रावण | 7 जुलाई (मंगल) | गजानन | व्यापार-सफलता |
| भाद्रपद | 6 अगस्त (गुरु) | हेरम्ब | शत्रु-नाश |
| आश्विन | 5 सितम्बर (शनि) | विघ्नराज | विघ्न-नाश |
| कार्तिक | 4 अक्टूबर (रवि) | वक्रतुण्ड | सब-कार्य-सिद्धि |
| मार्गशीर्ष | 3 नवम्बर (मंगल) | गणाधिप | विद्या-प्राप्ति |
| पौष | 3 दिसम्बर (गुरु) | अखुरथ | धन-प्राप्ति |
सकट-चौथ (माघी) सबसे-बड़ा। चन्द्रोदय बाद ही पारण।
📊संकष्टी-व्रत — विभिन्न-कामना के अनुसार चयन
| कामना | मास | विशेष-गणपति-नाम | जप-संख्या |
|---|---|---|---|
| सन्तान-कल्याण | माघ (सकट-चौथ) | सकट-गणेश | 11 बार सकट-चौथ-व्रत |
| धन-प्राप्ति | पौष (अखुरथ) | अखुरथ-गणेश | 21 बार ॐ श्रीं नमः |
| विद्या-प्राप्ति | मार्गशीर्ष (गणाधिप) | गणाधिप-गणेश | 11 बार सरस्वती-गणेश-स्तोत्र |
| व्यापार-सफलता | श्रावण (गजानन) | गजानन-गणेश | 21 बार लक्ष्मी-गणेश-स्तोत्र |
| स्वास्थ्य-वृद्धि | चैत्र (भालचन्द्र) | भालचन्द्र-गणेश | 21 बार महामृत्युञ्जय |
| विवाह-योग | फाल्गुन (द्विजप्रिय) | द्विजप्रिय-गणेश | 11 बार पार्वती-गणेश-स्तोत्र |
| शत्रु-नाश | भाद्रपद (हेरम्ब) | हेरम्ब-गणेश | 11 बार दुर्गा-गणेश-स्तोत्र |
| पाप-मोचन | आषाढ़ (कृष्णपिंगल) | कृष्णपिंगल-गणेश | 108 बार ॐ गं गणपतये नमः |
📋संकष्टी-चतुर्थी सम्पूर्ण व्रत-विधि — 9-चरण
- 1
तृतीया (एक-दिन पूर्व)
सायं हल्का सात्विक-भोजन। ब्रह्मचर्य। संकल्प-तैयारी।
- 2
चतुर्थी प्रात:
सूर्योदय से पूर्व उठें। स्नान। लाल/केसरी वस्त्र। संकल्प: "मैं [नाम] _____ कामना से संकष्टी-चतुर्थी का व्रत करता/करती हूँ।"
- 3
गणेश-प्रतिमा-स्थापना
पूजा-स्थल पर गणेश-मूर्ति/चित्र। दूर्वा (दूब-घास), मोदक, सिन्दूर, फूल, दीपक।
- 4
दिन-भर व्रत
निर्जला (कठोर — सकट-चौथ में) या फलाहारी। चावल-दाल-नमक वर्जित। फल, दूध, मेवे।
- 5
दिन-भर मन्त्र-जप
"ॐ गं गणपतये नमः" 108 बार × कई-बार। गणेश-चालीसा 11 बार। संकटनाशन-गणेश-स्तोत्र।
- 6
मासिक-कथा-श्रवण
उस-मास की संकष्टी-कथा (12 अलग-अलग कथाएँ)। बच्चों को विशेष शामिल करें।
- 7
चन्द्रोदय का इन्तजार
दिल्ली में रात्रि 8-9 PM (मास-वार)। चन्द्रोदय का सटीक-समय पंचांग में देखें।
- 8
चन्द्रोदय पर अर्घ्य
चन्द्रमा को दूध-चावल-जल मिलाकर अर्घ्य दें। "ॐ सोम सोमाय नमः" 21 बार। फिर गणेश को नमस्कार।
- 9
पारण
चन्द्रार्घ्य के बाद — मोदक, दूध, फल से व्रत खोलें। ब्राह्मण-भोज + दान। फिर स्वयं भोजन।
⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें
✗ चन्द्रोदय से पहले व्रत खोलना
क्यों: संकष्टी-व्रत = "चन्द्र-दर्शन-व्रत"। चन्द्रोदय से पूर्व पारण = व्रत-दोष। पुण्य आधा।
✓ सही उपाय: चन्द्रोदय का सटीक-समय पंचांग में देखें। उसके बाद ही पारण। बादल हो — समय-अनुसार चन्द्र-स्मरण।
✗ गणेश-भोग पर तुलसी-पत्र
क्यों: तुलसी कृष्ण-प्रिया, गणेश-नहीं। पुराण-कथा: तुलसी ने गणेश-विवाह-प्रस्ताव दिया, गणेश ने मना — तुलसी-श्राप।
✓ सही उपाय: गणेश-भोग पर दूर्वा (दूब-घास)। 21 दूर्वा-दल अनिवार्य। तुलसी कभी न।
✗ दिन-भर "हल्की चाय/कॉफी" लेना
क्यों: व्रत-दिन उत्तेजक-पदार्थ वर्जित। चाय-कॉफी मन-चंचल करते। उपवास-स्थिति-विरुद्ध।
✓ सही उपाय: पानी, दूध, फल-रस, नारियल-पानी अनुमत। चाय-कॉफी-पेय व्रत-दिन छोड़ें।
✗ सकट-चौथ में सामान्य-व्रत-नियम
क्यों: सकट-चौथ (माघी संकष्टी) = सबसे-कठोर। निर्जला-व्रत आदर्श। पुत्र-कल्याण-व्रत — विशेष-निष्ठा।
✓ सही उपाय: सकट-चौथ में निर्जला (बिना-जल) सर्वश्रेष्ठ। यदि स्वास्थ्य-समस्या — केवल जल। चन्द्रोदय बाद पारण।
✗ 12 लगातार संकष्टी छोड़कर बीच में रोकना
क्यों: विशेष-कामना के लिए 12 लगातार संकष्टी = अनुष्ठान। बीच में टूटे = फल नहीं। शास्त्र-नियम।
✓ सही उपाय: 12 लगातार संकष्टी का संकल्प पूरा करें। यदि किसी मास में रोग/अनिवार्य-कारण — मानसिक-व्रत+मन्त्र-जप।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
- ▪सूर्य सिद्धान्त — शास्त्रीय संस्कृत खगोलशास्त्र ग्रन्थ (~5वीं सदी ईसवी)
- ▪बृहत् पाराशर होरा शास्त्र — महर्षि पराशर रचित वैदिक ज्योतिष का मूल-ग्रन्थ
- ▪मुहूर्त चिन्तामणि — राम दैवज्ञ रचित (16वीं सदी), मुहूर्त-शास्त्र का मानक-ग्रन्थ
- ▪Astronomical Algorithms — Jean Meeus (Willmann-Bell, 1998); इस साइट के सभी खगोलीय गणनाओं का आधार
- ▪लाहिरी अयनांश — भारतीय कैलेण्डर सुधार समिति (1955) द्वारा अंगीकृत मानक सायन-निरयण रूपान्तरण
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या संकष्टी व्रत में जल पी सकते हैं?▼
विभिन्न शाखाओं में अलग नियम हैं। कठोर निर्जला व्रत — जल भी नहीं (विशेषतः सकट चौथ में)। साधारण व्रत — जल, फल, दूध स्वीकार्य; अन्न, नमक वर्जित। अधिकांश परिवारों में दूसरा नियम। आपकी स्वास्थ्य स्थिति देखकर निर्णय लें।
क्या स्त्री-पुरुष दोनों संकष्टी व्रत कर सकते हैं?▼
हाँ। कोई भी कर सकता है। पारम्परिक रूप से माताएँ पुत्र-कल्याण हेतु, छात्र विद्या-प्राप्ति हेतु, उद्यमी सफलता हेतु करते हैं। मासिक धर्म के समय व्रत न रखने का परम्परागत नियम है।
चन्द्र दर्शन न हो तो क्या करें?▼
यदि बादल अथवा बारिश के कारण चन्द्र दर्शन न हो, तो पंचांग के अनुसार चन्द्रोदय का समय देखकर मानसिक चन्द्र-दर्शन से अर्घ्य दे सकते हैं। चन्द्रमा की ओर दिशा (पूर्व-उत्तर) करके अर्घ्य अर्पण करें।
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सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।