वट सावित्री व्रत — वट-वृक्ष का व्रत

🌳
त्योहार6 मिनट पठन

वट सावित्री व्रत — वट-वृक्ष का व्रत

विवाहित स्त्रियों द्वारा ज्येष्ठ अमावस्या (उत्तर भारत) अथवा ज्येष्ठ पूर्णिमा (पश्चिम भारत के भागों) पर पाला जानेवाला व्रत — सावित्री द्वारा सत्यवान को यम से छुड़ाने की कथा, वट-वृक्ष की परिक्रमा, तथा अनुष्ठान का गहन भाव।

2026-05-02

लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम

पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ

✦ प्रकाशित: समीक्षित:

मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित

वट सावित्री व्रत — हिंदू कैलेंडर के सर्वाधिक प्राचीन सुहागिन व्रतों में से, उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या एवं महाराष्ट्र-गुजरात के भागों में ज्येष्ठ पूर्णिमा पर पालित। महाभारत के आरण्यक पर्व में वर्णित — सावित्री द्वारा यम से सत्यवान को छुड़ाना — का स्मरण-पर्व।

सावित्री-कथा

राजकुमारी सावित्री ने नारद की चेतावनी (विवाह के ठीक एक वर्ष बाद सत्यवान की मृत्यु) के विरुद्ध सत्यवान को पति चुना। सावित्री ने एक-वर्षीय तप किया। नियत-दिवस पर, सत्यवान के साथ वन में जाकर वट-वृक्ष के नीचे उनके मूर्च्छित होने पर, यम के आगमन पर, उसने न रोना न प्रार्थना — यम के पीछे चलकर धर्म-संवाद किया। यम प्रसन्न होकर तीन वर मांगे; पति का जीवन वर नहीं बन सकता था। सावित्री की बुद्धिमत्ता-पूर्ण वर-चयन (तृतीय: "मेरे पति से मुझे अनेक संतान प्राप्त हों") ने यम को तार्किक रूप से बाँध लिया — सत्यवान को पुनर्जीवित किए बिना तृतीय वर पूर्ण नहीं हो सकता था। यम पराजित होकर सत्यवान को पुनर्जीवित किया।

कथा सावित्री को बुद्धि, भक्ति एवं मौन दृढ़ता से पति-रक्षा करनेवाली पत्नी का आदर्श बनाती है।

वट-वृक्ष क्यों?

वट-वृक्ष जिसके नीचे सत्यवान पुनर्जीवित हुए, व्रत का स्वाभाविक केन्द्र बना। वट के सांकेतिक भाव पर्व के विषय से मेल खाते हैं:

  • यह भारत के दीर्घजीवी वृक्षों में से — कुछ वट-वृक्ष सहस्र वर्ष से अधिक प्राचीन।
  • एकल वृक्ष जो वन बन जाता है — अवरोही जड़ें तने बनकर बहुगुणित होती हैं।
  • विष्णु एवं ब्रह्मा से सम्बद्ध (प्राचीन ग्रंथों में ब्रह्मा वट के नीचे निवास।)

जो पत्नी वट की परिक्रमा करती है तथा सूत्र बाँधती है — वह पति की आयु को वट के समान दीर्घ, गहन-मूल एवं बहुगुणित होने की प्रार्थना करती है।

दैनिक विधि

  1. 1**प्रात:स्नान**, **परंपरागत वस्त्र** — लाल अथवा पीला; अनेक विवाह-वस्त्र भी।
  2. 2**थाली** में धूप, दीप, रोली, अक्षत, फल (विशेष आम), चना, मिठाई, नया लाल सूत्र।
  3. 3**वट-वृक्ष-दर्शन** — वास्तविक वट संभव हो; नहीं तो गमले का फिकस, पीपल, अथवा वट-छवि।
  4. 4**अर्पण** — मूल पर जल अर्पित; थाली रखें; पुष्प अर्पित।
  5. 5**सूत्र-परिक्रमा** — पत्नी लम्बे लाल सूत्र को वृक्ष-तने पर लपेटते हुए परिक्रमा करती है (कठोर पालन में 108, व्यावहारिक में 7 अथवा 11)।
  6. 6**कथा-पाठ** — वट सावित्री व्रत कथा।
  7. 7**उपवास** — अनेक पूर्ण-दिवस उपवास, चन्द्र-दर्शन (अथवा अमावस्या पर सूर्यास्त) के पश्चात् पारणा।
  8. 8**पति का आशीर्वाद** — अंत में पत्नी पति का आशीर्वाद लेती है, परिवार साथ भोजन करता है।

समानता पर सूत्र

आधुनिक पाठक प्रायः प्रश्न उठाते हैं कि वट सावित्री जैसे व्रत क्या एकपक्षीय वैवाहिक धारणा को सुदृढ़ करते हैं। दो उत्तर: प्रथम, मूल महाभारत-कथा सावित्री को सक्रिय कर्ता बनाती है, निष्क्रिय पीड़िता नहीं — यम से उनका धर्म-संवाद ही विजय का आधार है। द्वितीय, आधुनिक अनेक गृहों में पति भी इसी दिन समानांतर पुरुष-व्रत पाल रहे हैं — यह प्रथा बढ़ रही है।

📝सम्पादकीय टिप्पणी

इस लेख की रचना हमारी सम्पादकीय टीम ने मूल संस्कृत ज्योतिष ग्रन्थों — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, मुहूर्त चिन्तामणि, सूर्य सिद्धान्त — से प्रत्यक्ष अध्ययन के पश्चात् की है। हमने आधुनिक खगोलीय गणनाओं से इन सिद्धान्तों का सत्यापन भी किया है। यदि आपको कोई त्रुटि मिले अथवा कोई सुझाव हो तो कृपया हमें muhuratchoghadiya@gmail.com पर ईमेल करें। हम आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करते हैं।

सत्यापन स्रोत: Wikipedia: Hindu CalendarPanchangamSurya SiddhantaLahiri Ayanamsa

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेरे घर के पास वट-वृक्ष नहीं है — कैसे पालन करूँ?

गमले का फिकस अथवा पीपल विकल्प है, अथवा पूजा-कक्ष में रखी वट की मुद्रित छवि। अनेक नगर-निवासी एक छोटा सूत्र लेकर छवि की सात परिक्रमा करते हैं। शास्त्रीय सिद्धांत भाव है, विशिष्ट वृक्ष नहीं।

क्या विधवा अथवा अविवाहित स्त्रियाँ यह व्रत रख सकती हैं?

परंपरागत रूप से व्रत सुहागिन हेतु है। सुयोग्य वर-कामी अविवाहिता कभी-कभी संशोधित स्वरूप पालती हैं। विधवा शास्त्रीय रूप से नहीं पालतीं परंतु कथा का चिंतनशील पाठ कर सकती हैं। आधुनिक आचार में विविधता है तथा व्यक्तिगत चयन का आदर।

संबंधित लेख

॥ ॐ शुभं भवतु ॥