शुक्रवार — शुक्र (शुक्र ग्रह) से नामांकित। लोक हिंदू परंपरा में संतोषी माता — संतोष की देवी — को समर्पित। शुक्रवार प्राचीन ग्रंथों में लक्ष्मी, सरस्वती एवं दुर्गा से सम्बद्ध रहा है, परंतु संतोषी माता का विशिष्ट शुक्रवार व्रत बीसवीं शताब्दी में, विशेषकर 1975 की 'जय संतोषी माँ' फिल्म के बाद, व्यापक लोकाचार बना।
✦ व्रत-स्वरूप
शास्त्रीय आचार है सोलह शुक्रवार व्रत — सोलह क्रमिक शुक्रवार। लघु आचार एक से चार शुक्रवार तक भी।
✦ दैनिक विधि
- 1**प्रात:स्नान**, स्वच्छ वस्त्र (पीला अथवा लाल)।
- 2**संकल्प** — पालक संक्षिप्त मानसिक संकल्प में शुक्रवारों की संख्या एवं उद्देश्य घोषित करता है।
- 3**पूजा** — संतोषी माता की छवि स्वच्छ वस्त्र पर। कलश पर नारियल। अर्पण: चना-गुड़ का छोटा ढेर, लाल पुष्प, धूप, दीप, एक मुद्रा।
- 4**कथा-पाठ** — संतोषी माता व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण। कथा सरल हिंदी गद्य में है तथा अनुष्ठान का हृदय है।
- 5**आरती** अंत में।
- 6**प्रसाद** — केवल अर्पित चना-गुड़ प्रसाद-रूप में। एक साथ ग्रहण करने से व्रत-पारणा।
✦ खट्टा-निषेध
व्रत की सबसे विशिष्ट विशेषता: व्रत-दिवस को घर में कोई खट्टा वस्तु ग्रहण नहीं करता, विशेषतः पूजा के पश्चात्। नींबू, इमली, अमचूर, कुछ व्याख्याओं में दही — सब विरत। कथा-दत्त शास्त्रीय कारण: खट्टापन खिन्न मन, असंतोष का प्रतीक है; संतोष-देवी इससे स्वाभाविक रूप से विमुख हैं।
✦ उद्यापन
संकल्पित संख्या पूर्ण होने पर उद्यापन। आठ बालक (कभी-कभी आठ वसुओं के रूप में व्याख्यायित) आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है — परंतु पुनः बिना खट्टे के। तत्पश्चात् व्रत औपचारिक रूप से समाप्त।
✦ व्रत का संवर्धन
भौतिक प्रार्थना के परे, विशिष्ट प्रयोजन (नौकरी, विवाह, ऋण-मुक्ति) हेतु पाला गया व्रत स्वयं संतोष का अनुशासन है। सोलह सप्ताह का खट्टा-निषेध दैनिक छोटी शिकायतों के अंकुश का छोटा परंतु वास्तविक अभ्यास है।