शंख — हिंदू पूजा की सर्वाधिक विशिष्ट वस्तुओं में से। विष्णु के हाथ में लगभग प्रत्येक प्रतिमा-निरूपण में प्रकट होता है, प्रत्येक शास्त्रीय पूजा के आरंभ एवं अंत पर ध्वनित होता है, तथा कुछ दिनों पर लक्ष्मी के भ्राता के रूप में स्वयं पूज्य (दोनों समुद्र मंथन से प्रकट हुए)।
✦ पौराणिक मूल
भागवत पुराण शंख को ब्रह्माण्डिक समुद्र-मंथन से प्रकट रत्नों में से एक के रूप में अभिलिखित करता है। विष्णु ने इसे अपना बनाया तथा अपने विशिष्ट शंख का नाम पाञ्चजन्य रखा। महाभारत-युद्ध के आरंभ पर बजाया गया कृष्ण का पाञ्चजन्य हिंदू साहित्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध ध्वनि-घटनाओं में से।
✦ दो प्रकार
दक्षिणावर्ती — दाहिनी ओर खुलता है (दक्षिणावर्ती सर्पिल)। अत्यन्त शुभ माना जाता; प्रकृति में अत्यंत दुर्लभ; मिलने पर महँगा। पूजा-वेदी पर रखा जाता परंतु बजाया नहीं।
वामावर्ती — बाईं ओर खुलता है (वामावर्ती सर्पिल)। सामान्य प्रकार। अधिकांश गृहों में यही, अनुष्ठान में बजाने हेतु यही।
दोनों आसानी से पहचाने: मुख स्वयं की ओर रखें; यदि सर्पिल दक्षिणावर्ती है, यह दक्षिणावर्ती है।
✦ नित्य पूजा में
शास्त्रीय पूजा में शंख के तीन प्रयोग:
- 1**ध्वनिकरण** — पूजा के आरंभ एवं अंत पर बजाया जाता ताकि अनुष्ठान-स्थल "खुले" एवं "बंद" हो। शास्त्रीय ग्रंथ कैसे पकड़ें (दोनों हाथों से, चौड़ा मुख ऊर्ध्वाभिमुख), तथा कैसी ध्वनि उत्पन्न करें — सतत निम्न स्वर, न कि तीक्ष्ण फूट — पर विस्तृत निर्देश देते हैं।
- 1**जल-पात्र** — अभिषेक (देव-स्नान) में शंख जल से भरा जाता। शंख से ढलाया जल विशेष शुद्ध माना जाता है।
- 1**पूज्य वस्तु** — विशिष्ट दिनों पर (वैष्णवों हेतु विशेष मंगलवार) शंख स्वयं चन्दन, सिंदूर एवं पुष्पों से पूजित।
✦ ध्वनि
शंख की ध्वनि असामान्य है: सतत, निम्न-आवृत्ति, हार्मोनिक्स-समृद्ध। आधुनिक ध्वनिकी अध्ययन देखते हैं कि शंख का सर्पिल कक्ष विशिष्ट प्रतिध्वनि-प्रतिमान उत्पन्न करता है जो मानव श्रवण के गहरे स्तर को सक्रिय करता है। शास्त्रीय दावा — कि ध्वनि तत्काल परिवेश को विघटनकारी ऊर्जाओं से शुद्ध करती है — आधुनिक दृष्टि में निकट के श्रोताओं में निम्न-आवृत्ति सतत स्वरों की मापनीय परानुकम्पी प्रतिक्रिया से मेल खाता है।
✦ व्यावहारिक सूत्र
गृह-वेदी पर रखा शंख स्वच्छ वस्त्र पर हो, सीधे धातु अथवा काष्ठ पर नहीं। समय-समय पर सफाई (बहता जल, कोई साबुन नहीं)। पुराने शंख कभी-कभी चन्दन-तेल से उपचारित; आधुनिक गृह केवल शुष्क एवं स्वच्छ रखते हैं।
टूटा शंख — हल्के से भी — परंपरागत रूप से पूजा में प्रयोग नहीं होता। बहती जल (नदी, सरोवर, अथवा नदी-पहुँच रहित गृहों में आदर सहित स्वच्छ बगीचे में दफनाना) में कोमलता से रखा जाता है।
✦ स्रोत-सूत्र
समुद्री-शंख स्थायित्व-चिन्ता हैं। अधिकांश अनुष्ठानिक रूप से व्यापार-योग्य शंख हिंद महासागर से, विशेषतः तमिलनाडु तट से, आते हैं। तीर्थ-श्रेणी दक्षिणावर्ती शंख कभी-कभी दावा किए जाते परंतु प्रायः गलत-पहचाने जाते हैं — सस्ते "दक्षिणावर्ती" प्रस्तावों पर क्रेताओं को संशय रखना चाहिए। वास्तविक दक्षिणावर्ती मंदिर-निधियों में उल्लेखनीय वस्तु होने जितना दुर्लभ।