ॐ नमः शिवाय शैव परंपराओं का सर्वाधिक पाठ किया जानेवाला मंत्र। मूल — न-म-शि-व-य — पाँच अक्षर, अतः नाम पंचाक्षरी मंत्र। ॐ जोड़ने पर पूर्ण मंत्र छह अक्षरी। मूल यजुर्वेद के श्री रुद्रम् सूक्त में (कृष्ण यजुर्वेद 4.5)।
✦ मंत्र
"ॐ नमः शिवाय"
अनुवाद: "ॐ — शिव को प्रणाम।"
नमः — "प्रणाम, नमन"। शिवाय — "शिव को", शिव का चतुर्थी विभक्ति।
✦ पाँच अक्षर एवं पाँच तत्व
शैव व्याख्या का केंद्रीय अंश: प्रत्येक अक्षर पाँच महाभूतों, पाँच शिव-मुखों, तथा पाँच शुद्धियों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है।
| अक्षर | तत्व | दिशा | गुण |
|---|---|---|---|
| न | पृथ्वी | पश्चिम | स्थिरता |
| म | जल | उत्तर | संयोजन |
| शि | अग्नि | दक्षिण | परिवर्तन |
| व | वायु | पूर्व | गति |
| य | आकाश | ऊर्ध्व | विस्तार |
न-म-शि-व-य का पाठ, इस दृष्टि में, भौतिक अस्तित्व के समस्त वर्णक्रम का परिक्रमण है तथा उसके प्रत्येक सिद्धांत के समक्ष नमन। मंत्र संसार को बायपास नहीं करता; उसे स्वीकार करता है तथा प्रत्येक स्तर पर शिव को पाता है।
✦ श्री रुद्रम् में
पाँच अक्षर पृथक रूप से, यजुर्वेद के रुद्र-प्रश्न में निहित। प्रसिद्ध मध्य-मंत्र — "नमः शिवाय च शिवतराय च" — श्लोक को संक्षिप्त शक्ति देता है। परंपरा ने न-मः-शि-व-य को इस बड़े संदर्भ से निकालकर सबको सुलभ स्वतंत्र मंत्र बनाया, जबकि पूर्ण रुद्रम् मंदिर-पुरोहित का अनुशासन बना रहा।
✦ अभ्यास-विधि
- 1**स्नान, स्वच्छ वस्त्र**, स्वच्छ आसन पर पूर्व अथवा उत्तर-मुख।
- 2**संकल्प** — संक्षिप्त मानसिक भाव-कथन।
- 3**धीमा पाठ** — रुद्राक्ष माला पर 108 आवृत्ति शास्त्रीय संख्या। नित्य अभ्यास हेतु 11, 21 अथवा 108 सब प्रचलित।
- 4**गति** — एक पूर्ण आवृत्ति प्रति धीमी श्वास-निःश्वास चक्र सहज गति; तीव्र गति भी प्रयुक्त। शास्त्रीय जप सामान्यतः ध्यानात्मक, उत्तेजित नहीं।
- 5**मौन में समाप्ति** — एक मिनट शान्त बैठें।
✦ माला बिना
चलते समय, यात्रा में, किसी भी असहज क्षण में — मंत्र मन में मौन रूप से बिना गणना के दोहराया जा सकता है। वर्षों के अभ्यास से अनेक साधक पाते हैं कि वह स्वयं उच्चरित होने लगा है, ध्यान के प्रत्येक क्षण में उभरता हुआ। यह अजपा-जप (बिना-जप का जप) है तथा शैव परंपराओं में मंत्र-अभ्यास के उच्चतम रूपों में से एक माना जाता है।
✦ मंत्र-वहन
पंचाक्षरी छोटा है। यही उसकी शक्ति का अंश है — इतना छोटा कि अभी-अभी पैर के अंगूठे से ठोकर लगा मन भी इसे धारण कर सकता है, फिर भी सम्पूर्ण शैव भार वहन करता है: पाँच तत्व, पाँच शिव-मुख, स्थूल से सूक्ष्म तक यात्रा, तथा यह गहरी पहचान कि यथार्थ का प्रत्येक स्तर अंततः वही शिव है। मंत्र — शास्त्रीय शैव समझ में — छह अक्षरों में संकुचित पूर्ण शिक्षण है।