महामृत्युंजय — "मृत्यु पर महान विजेता" — सर्वाधिक पाठ किए जानेवाले हिंदू मंत्रों में से। मूल ऋग्वेद (7.59.12) में, वसिष्ठ ऋषि के सूक्त में। यजुर्वेद एवं श्री रुद्रम् में भी वही श्लोक। त्र्यम्बक — त्रि-नेत्र, शिव के नाम — को सम्बोधित।
✦ मंत्र
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥"
✦ पद-दर-पद
- ✦**ॐ** — आदि-अक्षर; सभी मंत्रों का बीज।
- ✦**त्र्यम्बकं यजामहे** — "हम त्रि-नेत्र की पूजा करते हैं"। त्रि-अम्बकं सम्बोधन; यजामहे "हम पूजा करते हैं"।
- ✦**सुगन्धिं** — "सुगंधमय" — शिव का विशेषण, सम्भवतः अर्पणों की सुगंध, अथवा धर्म की रूपकीय सुगंध।
- ✦**पुष्टिवर्धनम्** — "जो पुष्टि / कल्याण / पूर्णता बढ़ाते हैं"। पुष्टि स्वस्थ-वृद्धि; वर्धनम् वृद्धि।
- ✦**उर्वारुकमिव** — "उर्वारुक (खीरे) के समान"।
- ✦**बन्धनात्** — "अपने डंठल / बंधन से"।
- ✦**मृत्योर्मुक्षीय** — "मृत्यु से मुक्त हो जाऊँ"।
- ✦**माऽमृतात्** — "अमृत से नहीं"।
✦ अर्थ
संगठित अनुवाद: "हम त्रि-नेत्र की उपासना करते हैं, सुगंधमय, सर्व-कल्याण-वर्धक की। जैसे पका खीरा अपने डंठल से स्वयं छूट जाता है, वैसे मैं मृत्यु से मुक्त हो जाऊँ — किन्तु अमृत से नहीं।"
रूपक सूक्ष्म है। पका खीरा बेल से बल-रहित अलग होता है; माली खींचता नहीं। श्लोक उसी गुण की मुक्ति माँगता है — हिंसक पलायन नहीं, समय आने पर स्वाभाविक ढीला होना; कार्य पूर्ण होने पर शरीर को संघर्ष-रहित त्यागना; चेतना का उस बड़े जीवन में मुक्त होना जो समाप्त नहीं होता। "माऽमृतात्" — "अमृत से नहीं" — आवश्यक है। प्रार्थना जीवन से पलायन नहीं माँगती; मृत्यु से मुक्ति माँगती है (कष्टप्रद, अकाल समाप्ति) — परंतु शाश्वत-जीवन से वियोग नहीं।
✦ शास्त्रीय प्रयोग
गंभीर रोग में — परिवार अथवा रोगी दिनों तक दीर्घ जप। सूचित संख्या: 11, 108, 1,008, 10,008 अथवा 1,25,000 (पुरश्चरण)।
ग्रहण-काल में — ग्रहण-खण्ड मंत्र हेतु सर्वाधिक फलप्रद; अनेक गृह सूतक-घंटों में प्रारम्भ करते हैं।
प्रात:कालीन नित्य अभ्यास हेतु — अनेक 11 अथवा 21 आवृत्तियों से दिवस आरंभ करते हैं, प्रायः गायत्री के पश्चात्।
✦ अभ्यास-विधि
- 1**स्नान**, स्वच्छ वस्त्र, स्वच्छ आसन पर पूर्व अथवा उत्तर-मुख बैठें।
- 2**संक्षिप्त संकल्प** — किसके लिए अभ्यास अर्पित कर रहे हैं नाम लें।
- 3**धीमा पाठ** — प्रत्येक शब्द बोलें, शीघ्रता न करें। मंत्र सामान्य धीमी श्वास की गति पर सर्वोत्तम खुलता है।
- 4**गणना** — 108 मनकों की माला, अथवा दाहिने हाथ की पोरों पर अंगुली-गणना।
- 5**समापन** — एक मिनट मौन बैठें, उछलकर न उठें।
✦ व्यावहारिक अपेक्षा पर सूत्र
मंत्र जादू नहीं। इसका कार्य — शास्त्रीय रूप से समझा गया — मन को स्थिर करना, गहरी प्रार्थना को ईमानदारी से व्यक्त करना, तथा साधक को उससे सम्पर्क में लाना जो वह पहले से जानता है। दीर्घ-कालिक स्थिर अभ्यास रोग अथवा मृत्यु के भय के समक्ष ध्यान-योग्य स्थिरता उत्पन्न करता है — जो शास्त्रीय समझ में मृत्युंजय का वस्तुत: अर्थ है: जैविक अंत से पलायन नहीं, मन पर उसकी पकड़ से मुक्ति।