दशावतार — विष्णु के दस अवतरण — हिंदू पुराण-कथा के सर्वाधिक स्थायी ढाँचों में से। शास्त्रीय सूची, पुराणों (विशेषतः भागवत, गरुड़ एवं अग्नि) में, अवतारों को सृष्टि के आरंभिक चरणों से प्रारंभ होकर भविष्य के अवतार पर समाप्त होनेवाले अनुक्रम में व्यवस्थित करती है।
✦ दस अवतार
1. मत्स्य (मीन) — विष्णु ने ब्रह्माण्डिक प्रलय से मनु एवं सप्तर्षियों को बचाने हेतु मीन-रूप धारण कर उनकी नौका को अपने सींग पर सुरक्षित खींचा। मत्स्य ने गहराइयों से लुप्त वेद पुनः प्राप्त किए।
2. कूर्म (कच्छप) — समुद्र मंथन में मन्दार पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करने हेतु। पर्वत कच्छप-कवच पर टिका, देव-असुर मंथन करते रहे; मंथन से दिव्य रत्न एवं स्वयं लक्ष्मी प्रकट हुईं।
3. वराह (शूकर) — असुर हिरण्याक्ष द्वारा ब्रह्माण्डिक समुद्र की तलहटी में खींची गई पृथ्वी (देवी भूमि) के उद्धार हेतु शूकर-रूप। वराह ने उन्हें अपने दन्तों पर उठाया।
4. नरसिंह (नर-सिंह) — असुर हिरण्यकशिपु को मारने हेतु, जिसके वर के अनुसार वह मनुष्य, पशु, दिवस, रात्रि, अन्दर, बाहर — किसी से भी अवध्य था। विष्णु ने न पूर्ण मनुष्य न पूर्ण पशु (नर-सिंह), संध्या में (न दिवस न रात्रि), द्वार-देहली पर (न अन्दर न बाहर) प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का अंत किया — भक्त-पुत्र प्रह्लाद की रक्षा।
5. वामन (बौना) — असुर-राजा बलि के त्रिलोक-शासन को तीन-पग सौदे से सीमित किया (देखें ओणम लेख)।
6. परशुराम — ब्राह्मण-क्षत्रिय, जिन्होंने महाभारत के अनुसार, पिता-वध के पश्चात् भ्रष्ट क्षत्रियों से पृथ्वी को इक्कीस बार रहित किया। वे चिरंजीवियों — परंपरा के अनुसार आज भी पृथ्वी पर विद्यमान अमरों — में से।
7. राम — अयोध्या के राजकुमार, रामायण के नायक, मर्यादा-पुरुषोत्तम (धर्म के पूर्ण धारक)।
8. कृष्ण — द्वारका के राजकुमार, अर्जुन के सारथी, भगवद् गीता के वक्ता, महाभारत एवं भागवत पुराण के केन्द्रीय व्यक्तित्व।
9. बुद्ध — लगभग 6वीं शताब्दी ई. से अधिकांश वैष्णव सूचियों में सम्मिलित। शास्त्रीय पठन: बुद्ध एक विशिष्ट युग के लिए उपयुक्त करुणा-मार्ग सिखाने हेतु विष्णु के अवतार थे। कुछ बौद्ध परंपराएँ स्वाभाविक रूप से इस ढाँचे का अनुमोदन नहीं करतीं।
10. कल्कि — आगामी अवतार। भागवत के अनुसार कल्कि कलि युग के अंत में, श्वेत अश्व पर सवार, खड्ग-धारी, वर्तमान पतन-युग का अंत कर अगले सत्य युग का आरम्भ करेंगे।
✦ अनुक्रम का प्रतिमान
साथ पढ़ने पर, अवतार पहचानने योग्य अनुक्रम बनाते हैं:
- 1**जलचर** (मत्स्य — मीन)
- 2**उभयचर** (कूर्म — कच्छप)
- 3**स्तनपायी** (वराह — शूकर)
- 4**संकर** (नरसिंह — आधा मनुष्य, आधा सिंह)
- 5**खरबा मनुष्य** (वामन — बौना)
- 6**वन-निवासी आदिवासी योद्धा** (परशुराम)
- 7**सभ्य धार्मिक राजा** (राम)
- 8**राजनयिक-दार्शनिक** (कृष्ण)
- 9**संन्यासी शिक्षक** (बुद्ध)
- 10**भविष्य का ब्रह्माण्डिक योद्धा** (कल्कि)
अनेक आधुनिक पाठकों ने (अत्यंत संकुचित) क्रमविकास-कथा से समानता पर टिप्पणी की है। प्राचीन संकलकों ने यह अर्थ चाहा हो या न, समुद्र से भूमि से वन-जन तक स्थापित सभ्यता तक की संरचनात्मक यात्रा प्रभावी है।
✦ दशावतार का संदेश
सिद्धांत विशिष्ट धार्मिक संदेश वहन करता है: ईश्वर समय के बाहर खड़ा नहीं रहता। जब धर्म खतरे में हो, ब्रह्माण्डिक सिद्धांत समय के अन्दर रूप धारण कर कार्य करता है। अवतार ईश्वर का खेल-हेतु अवतरण नहीं; क्षण की आवश्यकता के स्तर पर वही परम सिद्धांत उपस्थित।
सूची मात्रा का शिक्षण भी है। विष्णु की संकट-प्रति प्रथम प्रतिक्रिया जल के नीचे मीन; अंतिम प्रतीक्षित प्रतिक्रिया काल के अंत में अश्वारूढ़ योद्धा। समान सिद्धांत जो भी आवश्यकता हो उसमें ढलता है। कोई अवतार धारण करने हेतु अति-लघु नहीं।