गुरुवार — बृहस्पति (गुरु ग्रह), देवों के गुरु, विद्या-श्रद्धा-नीति-धर्म-शिक्षक-उच्चशिक्षा के ग्रह — से नामांकित। गुरुवार व्रत विद्यार्थी, परीक्षार्थी, संतान-कामी, तथा जीवन में स्पष्ट नैतिक दिशा चाहनेवालों द्वारा व्यापक रूप से पालित।
✦ गुरुवार को बृहस्पति क्यों?
शास्त्रीय वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ज्ञान, पुत्र, धर्म एवं गुरु के नैसर्गिक कारक हैं। उनका साप्ताहिक दिवस इन्हीं विषयों के स्मरण एवं संवर्धन को समर्पित।
✦ दैनिक विधि
- 1**प्रात:स्नान**, **पीले वस्त्र** — पीला बृहस्पति का रंग।
- 2**पूजा** — गृह-मंदिर अथवा विष्णु / बृहस्पति-मंदिर में। परंपरागत अर्पण: पीले पुष्प, चना दाल एवं गुड़, पीपल पत्र, हल्दी — केले के पौधे को तिलक रूप में लगाया जाता है क्योंकि केला बृहस्पति को प्रिय है।
- 3**मंत्र** — बृहस्पति बीज मंत्र "ॐ ब्रिं बृहस्पतये नमः" (108 आवृत्ति) अथवा बृहस्पति गायत्री।
- 4**लघु उपवास** — संध्या एक शाकाहारी भोजन, चना दाल एवं पीले चावल सहित। कठोर पालन में नमक त्याग।
- 5**पाठ** — बृहस्पति व्रत कथा (हिंदी लोक-कथा) का पाठ अथवा श्रवण।
- 6**दान** — पीली वस्तुएँ, विद्यार्थी को पुस्तक, शिक्षा हेतु दान, संकटग्रस्त शिक्षक की सहायता। गुरुवार का शिक्षा-दान सर्वाधिक उपयुक्त।
✦ वर्जित
केला — बृहस्पति से सम्बद्ध फल — व्रत-पालक गुरुवार को नहीं खाते (अर्पित किया जाता है, खाया नहीं)। केश एवं नख-कर्तन भी गुरुवार को परंपरागत रूप से वर्जित (यह व्यापक नियम है, केवल व्रती हेतु नहीं)।
✦ व्रत का संवर्धन
विशिष्ट प्रार्थना के परे, व्रत का हृदय है साप्ताहिक रूप से धर्म की ओर मोड़। कुछ घंटे गंभीर पठन, गुरु-स्मरण, विद्यार्थी-सहायता, अपनी नैतिक रेखा के सुदृढ़ीकरण को। बृहस्पति-कृपा शास्त्रीय दृष्टि में उन्हीं की ओर बहती है जो पहले से इस दिशा में झुके हैं।