*वास्तु शास्त्र* — शाब्दिक रूप से "निवास का शास्त्र" — शास्त्रीय भारतीय स्थापत्य एवं स्थानिक-संरचना सिद्धान्तों का एक संग्रह है। इसका मूल अन्तर्ज्ञान यह है कि दिन भर सूर्य की स्थिति किसी भवन में ऊर्जा-ढाल बनाती है — एवं उस ढाल के अनुसार कक्ष-संरेखण निवास-अनुभव को सुधारता है। यह लेख आठ दिशाओं, उनके शास्त्रीय सम्बन्धों, एवं प्रत्येक प्रिस्क्रिप्शन के व्यावहारिक अर्थ का परिचय देता है।
✦ अन्तर्निहित तर्क — सौर संरेखण
उत्तरी गोलार्ध में — जहाँ वास्तु विकसित हुआ — सूर्य पूर्व में उगता है, दक्षिण में शिखर पर, पश्चिम में अस्त, उत्तर में अनुपस्थित। अतः भिन्न दिशाएँ दिन भर भिन्न गुणवत्ता की रोशनी एवं ऊष्मा प्राप्त करती हैं:
- ✦**पूर्व**: प्रात:कालीन सूर्य-प्रकाश — उष्ण, शुद्धिकारी, जीवाणु-निरोधक। प्रात:काल लाभ देने वाले कार्यों हेतु आदर्श।
- ✦**दक्षिण**: मध्याह्न का प्रखर सूर्य — सर्वाधिक उष्ण, ग्रीष्म में सर्वाधिक तीव्र। निवास-स्थलों हेतु सामान्यतः न्यूनीकृत।
- ✦**पश्चिम**: अपराह्न एवं सन्ध्या का सूर्य — उष्ण परन्तु दक्षिण से कम कठोर। दिन के उत्तरार्ध में प्रयुक्त कक्षों हेतु अच्छा।
- ✦**उत्तर**: कोई प्रत्यक्ष सूर्य-प्रकाश नहीं — सर्वाधिक शीतल, स्थिरतम तापमान। भण्डारण एवं अध्ययन हेतु अच्छा।
चार मुख्य दिशाओं के साथ चार "कोणीय" (कोने की) दिशाएँ — *ईशान* (उत्तर-पूर्व), *आग्नेय* (दक्षिण-पूर्व), *नैऋत्य* (दक्षिण-पश्चिम), *वायव्य* (उत्तर-पश्चिम) — प्रत्येक दो मुख्य दिशा-प्रभावों का संयोजन। आठ मिलकर वास्तु की *अष्ट दिशा*।
✦ आठ दिशाएँ विस्तार से
1. पूर्व — सूर्य सूर्य-शासित। जीवन-शक्ति, विद्या, अधिकार से सम्बन्धित। शास्त्रीय अनुशंसाएँ: मुख्य द्वार पूर्वाभिमुख हो सकता है (प्रवेश पर प्रात:कालीन प्रकाश); पूजा-कक्ष यहाँ शुभ; पूर्व-मुखी कक्षों की खिड़कियाँ शुद्धिकारी प्रात:प्रकाश ग्रहण करती हैं।
2. आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) — अग्नि अग्नि-शासित। रसोई शास्त्रीय रूप से यहाँ। पाक-कर्ता पूर्व-मुख होकर पकाये — प्रात:कालीन उष्ण प्रकाश ग्रहण करते हुए, अग्नि-तत्त्व दिशा पीठ की ओर। आधुनिक फ्लैट-रूप-रेखाएँ इसे पूर्णतः शायद ही प्राप्त कर सकें — परन्तु पूर्व-मुख खाना पकाने का स्थान एक उत्तम डिफ़ॉल्ट बना रहता है।
3. दक्षिण — यम यम-शासित। शास्त्रीय वास्तु में दक्षिण दिशा से सावधानी — क्योंकि सर्वाधिक तीव्र मध्याह्न-सूर्य यहाँ टकराता है। भारी संरचनाएँ — मोटी दीवारें, भण्डारण-अलमारियाँ, पूर्वज-गृह — प्रायः दक्षिणी दीवारों के विरुद्ध रखी जाती हैं ताकि वे ऊष्मा अवशोषित करें — निवास-क्षेत्र की रक्षा करते हुए।
4. नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) — निरृति निरृति-शासित (विघटन की असुरिक देवी)। शास्त्रीय रूप से *मुख्य शयन-कक्ष* यहाँ। तर्क के अनेक पहलू: यह स्थिरतम कोना (दिन भर न्यूनतम सौर परिवर्तन), कोई प्रात:प्रकाश नहीं (निद्रा हेतु अच्छा), एवं गुरुत्वाकर्षणीय रूपक — सबसे भारी ऊर्जा (गृह-स्वामी) को सर्वाधिक स्थिर कोने में रखना।
5. पश्चिम — वरुण वरुण-शासित (जल-स्वामी)। बाल-कक्ष एवं भोजन-कक्ष को पश्चिम-स्थान का लाभ — अपराह्न एवं सन्ध्या-प्रकाश। भोजन-कक्ष सन्ध्या में सर्वाधिक उपयोगी — जब यह दिशा प्रकाशित हो।
6. वायव्य (उत्तर-पश्चिम) — वायु वायु-शासित। अतिथि-कक्ष, कुछ परम्पराओं में स्त्रियों के शयन-कक्ष, एवं वातायन-निर्भर स्थल (उपयोगिता-कक्ष, सीढ़ियाँ) यहाँ शास्त्रीय रूप से। इस कोने में *वायु* — गतिमान वायु — परिसंचरण-भारी क्षेत्रों हेतु प्राकृतिक स्थान।
7. उत्तर — कुबेर कुबेर-शासित (धन-स्वामी)। शास्त्रीय "धन-दिशा।" नकद-पेटी, तिजोरी, खाता-बहियाँ उत्तरी दीवारों के विरुद्ध रखी जाती हैं। व्यावहारिक तर्क: उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-मुखी दीवारें कोई प्रत्यक्ष सूर्य-प्रकाश नहीं पातीं — अतः उनके विरुद्ध रखी सामग्री स्थिरतम तापमान का अनुभव करती है — कागज़ी अभिलेख एवं धातु-मूल्यवस्तुएँ स्थिर तापमान पर सर्वोत्तम सुरक्षित।
8. ईशान (उत्तर-पूर्व) — ईश्वर ईश्वर-शासित (शिव)। सर्वाधिक शुभ कोना। पूजा-कक्ष यहाँ जब भी सम्भव हो। उत्तर-पूर्व प्रात:कालीन पूर्व-प्रकाश पाता है — दक्षिणी-ग्रीष्म-ऊष्मा के बिना — दिन भर सर्वाधिक सुखद प्राकृतिक प्रकाश वाला कोना। यहाँ जल-स्रोत (कुआँ, जल-भण्डारण) भी शास्त्रीय रूप से अनुशंसित।
✦ वास्तु पुरुष मण्डल
दिशाओं के परे — वास्तु एक भवन-स्थल को एक प्रतीकात्मक शरीर — *वास्तु पुरुष* — के रूप में संगठित करता है। एक पुरुष आकृति स्थल-ग्रिड पर अध्यारोपित — शिर ईशान में, चरण नैऋत्य में। शरीर का प्रत्येक भाग 9×9 (अथवा 8×8 या 7×7) मण्डल के एक भिन्न कोष्ठ में बैठता है — एवं प्रत्येक कोष्ठ के अधिष्ठाता देवता हैं। शुभ देवताओं पर रखे गये कक्ष समृद्ध; अशुभ कोष्ठों पर वाले उपायों की माँग करते हैं।
व्यवहार में आधुनिक फ्लैट-स्वामी वास्तु पुरुष के चारों ओर भवन का पुनर्निर्माण नहीं कर सकते। सिद्धान्त अब भी दो व्यावहारिक प्रश्नों में अनुवादित होते हैं: 1. आपकी इकाई में कौन सा कक्ष कौन से कोने पर है? 2. प्रात:कालीन सूर्य-प्रकाश कहाँ प्रवेश करता है — एवं कौन से स्थल इसका उपयोग करते हैं?
✦ आधुनिक व्यावहारिक वास्तु — संक्षिप्त चेकलिस्ट
समकालीन अपार्टमेंट-निवास के लिए अनुकूलित — सर्वाधिक उपयोगी वास्तु सिद्धान्त:
- 1**पूजा-कक्ष अथवा ध्यान-कोना ईशान में** — यदि रूप-रेखा अनुमति दे।
- 2**मुख्य शयन-कक्ष नैऋत्य कोने में** — सर्वाधिक स्थिर, कोई प्रात:चकाचौंध नहीं।
- 3**रसोई — कार्यशील सतह पूर्व-मुख** यदि कोई भी रसोई-स्थिति अनुमति दे।
- 4**भारी अलमारियाँ/भण्डारण दक्षिणी एवं पश्चिमी दीवारों पर** — वे ऊष्मा अवशोषित करते हैं एवं कक्ष की रक्षा करते हैं।
- 5**केन्द्र में खुला स्थान (ब्रह्मस्थान)** — कक्ष अथवा तल के ज्यामितीय केन्द्र में स्तम्भ अथवा भारी फर्नीचर रखने से बचें — शास्त्रीय रूप से केन्द्र *ब्रह्मा* — खुले सिद्धान्त — का है। आधुनिक भाषा में: स्थान के आर-पार स्पष्ट दृष्टि-रेखाएँ शान्त लगती हैं।
- 6**प्रवेश पूर्व अथवा उत्तर पर** जब सम्भव हो। प्रवेश पर प्रात:प्रकाश एक मापन-योग्य मनोदशा-अन्तर बनाता है।
✦ वास्तु क्या है — एवं क्या नहीं
वास्तु कोई पूर्ण भौतिकी नहीं। एक उत्तर-मुखी रहन-कक्ष दुर्भाग्य "उत्पन्न" नहीं करेगा; न ही नैऋत्य में पूजा-कक्ष "सुनिश्चित" समस्या उत्पन्न करेगा। वास्तु सूर्य-संरेखण, वातायन एवं मानवीय गति के निर्मित स्थानों के साथ अन्योन्यक्रिया के अवलोकन से उत्पन्न एक विचारशील ढाँचा है। इसके प्रिस्क्रिप्शन अनेक मामलों में आधुनिक स्थापत्य-सर्वोत्तम-व्यवहार से मेल खाते हैं (सबसे चमकीले पक्ष पर प्रवेश; उष्णतम दीवारों पर भण्डारण; सर्वाधिक स्थिर कोने पर निद्रा) — एवं कुछ मामलों में भिन्न (जहाँ शास्त्रीय वर्जनाएँ अब लागू नहीं)।
एक उचित दृष्टिकोण: वास्तु को मानव-निवास पर सावधानी से विचार करने वाली परम्परा से डिज़ाइन-सलाह के रूप में व्यवहार करें। ऊपर के चार-पाँच व्यावहारिक सिद्धान्त लें। एक पूर्णतया अच्छे अपार्टमेंट को इसलिए न तोड़ें क्योंकि इसकी रसोई आग्नेय में "नहीं" है — यह अति-व्याख्या है, वास्तु नहीं।