लेखक: मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम
पंचांग एवं मुहूर्त सन्दर्भ
✦ प्रकाशित: • समीक्षित:
✦ मुहूर्त चौघड़िया सम्पादकीय टीम द्वारा संकलित ✦
अनन्त-चतुर्दशी — भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी। अनन्त-भगवान विष्णु की पूजा। 14-गाँठ-वाला अनन्त-सूत्र (रक्षा-सूत्र) पुरुष-दायीं, स्त्री-बायीं भुजा पर बाँधा।
साथ ही गणेश-विसर्जन का दिन (10-दिन-गणेश-चतुर्थी का समापन)।
अनन्त-चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला वह महाव्रत है जिसमें भगवान् श्रीहरि की पूजा उनके 'अनन्त' अर्थात् शेषनाग-शायी स्वरूप में की जाती है। यह व्रत न केवल गणेशोत्सव की पूर्णाहुति का दिन है, अपितु यह वह तिथि भी है जब महाभारत के वन-पर्व के अनुसार स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को द्वादश-वर्षीय वनवास के दुःख-निवारणार्थ इस व्रत का उपदेश दिया था।
इस व्रत का केंद्र-बिन्दु है 'अनन्त-सूत्र' — कुङ्कुम से रञ्जित, चौदह ग्रन्थियों (गाँठों) से युक्त रेशम या कपास का पवित्र डोरा, जिसे चतुर्दश-लोकों का प्रतीक मानकर पुरुष दक्षिण-भुजा में और स्त्री वाम-भुजा में धारण करती हैं। भविष्योत्तर-पुराण की कौण्डिन्य-सुशीला कथा से लेकर हेमाद्रि के चतुर्वर्ग-चिन्तामणि तक, समस्त स्मार्त-निबन्ध इस व्रत को 'अनन्त-फलप्रद' घोषित करते हैं।
✦ 2026 अनन्त-चतुर्दशी
तिथि: 25 सितम्बर 2026 (शुक्रवार)।
गणेश-विसर्जन-दिन।
उज्जैन, मुम्बई, पुणे में विशेष।
✦ अनन्त-सूत्र
कपास, रेशम या ऊन का धागा।
हल्दी से रंगा (पीला)।
14 गाँठें (14 लोकों के प्रतीक)।
पूजा-समय बाँधा।
पुरुष: दायीं भुजा। स्त्री: बायीं।
14 दिन तक धारण। फिर बहती-नदी में।
14 वर्ष की प्रतिज्ञा सर्व-मनोकामना-पूर्ति हेतु।
✦ पूजा-विधि
प्रातः-स्नान।
विष्णु-प्रतिमा।
कलश-स्थापना।
पीला-वस्त्र, पीले-फूल।
तुलसी, चन्दन।
14 दीपक।
14 प्रकार के फल और मिठाई।
अनन्त-कथा-श्रवण: कौण्डिन्य ऋषि की कथा।
सूत्र-पूजा।
सूत्र-धारण।
भोग-वितरण।
✦ 14 लोक
ऊर्ध्व-7: भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्।
अधो-7: अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, पाताल।
✦ व्रत की पौराणिक कथा — कौण्डिन्य और सुशीला का आख्यान
भविष्योत्तर-पुराण के उत्तर-पर्व में वर्णित अनन्तव्रत-कथा के अनुसार, सुमन्त नामक ब्राह्मण की पुत्री सुशीला का विवाह कौण्डिन्य ऋषि से हुआ। मार्ग में यमुना-तट पर उसने स्त्रियों को अनन्त-व्रत करते देखा, उनसे विधि सीखी और स्वयं चौदह-ग्रन्थि-युक्त अनन्त-सूत्र धारण किया। इसी सूत्र के प्रभाव से कौण्डिन्य का दरिद्र-गृह अकूत वैभव से भर गया।
किन्तु अहंकार-वशीभूत होकर कौण्डिन्य ने एक दिन यह कहकर कि 'यह सब मेरे तप का फल है, सूत्र का नहीं', सुशीला के हाथ का अनन्त-सूत्र छीनकर अग्नि में डाल दिया। तत्क्षण उनका सर्वस्व नष्ट हो गया, गृह में दारिद्र्य व्याप्त हो गया, और तब वे पश्चात्ताप-विह्वल होकर वन-वन भगवान् अनन्त को खोजने निकले।
वन में आम्र-वृक्ष, गौ, गज, और वृद्ध-ब्राह्मण के रूप में स्वयं भगवान् अनन्त ने उन्हें दर्शन दिए, उनके अहंकार का नाश किया, और चौदह वर्ष पर्यन्त निरन्तर इस व्रत के अनुष्ठान का आदेश दिया। तभी से चतुर्दश-वर्ष-पर्यन्त चतुर्दश-ग्रन्थि-युक्त सूत्र-धारण की परम्परा प्रचलित हुई।
✦ पूजा-विधि — षोडशोपचार और अनन्त-सूत्र-बन्धन
प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर साधक शुद्ध स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर संकल्प करे — 'मम सर्वापन्निवृत्ति-पूर्वक-शुभ-फल-प्राप्तये अनन्तव्रतमहं करिष्ये'। तदनन्तर कलश-स्थापन कर उस पर अष्ट-दल-कमल-युक्त मण्डल बनाकर शेषशायी विष्णु की प्रतिमा या दर्भ-निर्मित सप्त-फण अनन्त की प्रतिष्ठा की जाती है।
षोडशोपचार पूजन में पञ्चामृत-स्नान, पीताम्बर, यज्ञोपवीत, चन्दन, तुलसी-दल, धूप-दीप, नैवेद्य तथा चौदह पुष्प-पुञ्ज अर्पित किए जाते हैं। कुङ्कुम से रञ्जित नूतन अनन्त-सूत्र को भगवान् के समक्ष रखकर 'अनन्त संसार-महासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव। अनन्त-रूपे विनियोजयस्व ह्यनन्त-सूत्राय नमो नमस्ते॥' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित किया जाता है।
अभिमन्त्रित सूत्र पुरुष दक्षिण-बाहु में और स्त्री वाम-बाहु में धारण करते हैं। पूर्व-वर्ष का सूत्र उतारकर जल में विसर्जित किया जाता है। ब्राह्मण-भोजन, चौदह ब्राह्मणों को दक्षिणा, तथा अनन्त-व्रत-कथा का श्रवण — ये तीनों इस दिन अनिवार्य अंग माने गए हैं।
✦ तिथि-निर्णय और काल-व्यवस्था
धर्म-सिन्धु एवं निर्णय-सिन्धु के अनुसार अनन्त-चतुर्दशी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की उस चतुर्दशी को किया जाता है जो मध्याह्न-काल में व्याप्त हो। यदि चतुर्दशी दो दिन मध्याह्न-व्यापिनी हो तो पूर्व-विद्धा को ग्रहण किया जाता है; यदि एक भी दिन मध्याह्न-व्यापिनी न हो तो परा-दिन को मान्यता दी जाती है।
पूजा का सर्वोत्तम काल मध्याह्न (लगभग प्रातः ११ बजे से अपराह्न १ बजे तक) माना गया है, क्योंकि यही 'अभिजित्' और 'विष्णु-कालक' संधि है। प्रदोष-व्यापिनी चतुर्दशी होने पर भी मध्याह्न-पूजन की ही प्रधानता है — यह व्रत प्रदोष-व्यापिनी नहीं, अपितु मध्याह्न-व्यापिनी तिथि-प्रधान है।
इसी दिन दश-दिवसीय गणेशोत्सव की पूर्णाहुति-स्वरूप गणेश-विसर्जन सम्पन्न होता है, तथा जैन-परम्परा में दश-लक्षण-पर्व का समापन भी इसी तिथि को होता है — अतः यह त्रि-सम्प्रदाय-संगम-तिथि कहलाती है जो अपने आप में एक अद्वितीय सांस्कृतिक विशेषता है।
✦ अनन्त-सूत्र का दार्शनिक रहस्य — चौदह ग्रन्थियों का तात्पर्य
अनन्त-सूत्र की चौदह ग्रन्थियाँ शास्त्रानुसार चतुर्दश-भुवनों (सात ऊर्ध्व-लोक — भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् तथा सात अधो-लोक — अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल) की प्रतीक हैं। साधक इन ग्रन्थियों को धारण कर समस्त ब्रह्माण्ड-व्यापी अनन्त-तत्त्व का स्मरण करता है।
कतिपय आचार्य इन्हें चौदह विद्याओं (चार वेद, चार उपवेद, छह वेदाङ्ग) का प्रतीक भी मानते हैं। शेषनाग, जिन पर भगवान् विष्णु शयन करते हैं, अनन्त-काल और अनन्त-आकाश के मूर्तरूप हैं — अतः 'अनन्त' पूजा वस्तुतः निर्गुण-निराकार ब्रह्म की सगुण-उपासना है।
अग्नि-पुराण के १९६वें अध्याय में इस व्रत को 'अनन्त-फल-प्रद' कहा गया है — अर्थात् जो फल अन्य व्रतों से सीमित मिलते हैं, वे इस व्रत से अनन्त-गुणित होकर प्राप्त होते हैं। यह व्रत विशेषतः ऋण-मोचन, सम्पत्ति-प्राप्ति और पारिवारिक क्लेश-निवारण के लिए प्रशस्त है।
✦ उद्यापन-विधि और चतुर्दश-वर्षीय संकल्प
हेमाद्रि-कृत चतुर्वर्ग-चिन्तामणि के व्रत-खण्ड में स्पष्ट विधान है कि अनन्त-व्रत का संकल्प न्यूनतम चौदह वर्षों के लिए किया जाता है। चौदहवें वर्ष में उद्यापन-कर्म सम्पन्न किया जाता है, जिसमें स्वर्ण या रजत-निर्मित शेष-नाग-प्रतिमा, चौदह प्रकार के फल, चौदह मोदक, तथा चौदह ब्राह्मणों को सपत्नीक भोजन कराया जाता है।
उद्यापन के दिन विशेष होम — 'अनन्ताय नमः' मन्त्र से १०८ आहुतियाँ — सम्पन्न की जाती हैं। आचार्य को गोदान, वस्त्र-दान, और अनन्त-सूत्र-सहित स्वर्ण-शेष-प्रतिमा का दान दिया जाता है। यदि साधक चौदह वर्ष पूर्व ही मार्ग छोड़ दे तो इसे व्रत-भंग-दोष माना जाता है, जिसका प्रायश्चित्त कृच्छ्र-चान्द्रायण से बताया गया है।
जो साधक चौदह-वर्षीय संकल्प असम्भव समझें, वे प्रति-वर्ष यथा-शक्ति अनन्त-पूजन कर 'जीवन-पर्यन्त' का संकल्प कर सकते हैं — यह विकल्प भी शास्त्र-सम्मत है तथा अनन्त-फल-प्रद माना गया है। वर्तमान युग में अधिकांश गृहस्थ साधक इसी जीवन-पर्यन्त-संकल्प का अनुसरण करते हैं।
📊अनन्त-चतुर्दशी पूजन-सामग्री सूची
| सामग्री | मात्रा / प्रकार | प्रयोजन |
|---|---|---|
| अनन्त-सूत्र (कुङ्कुम-रञ्जित) | चौदह ग्रन्थि-युक्त | मुख्य धारण-वस्तु |
| शेष-शायी विष्णु-प्रतिमा | धातु / दर्भ-निर्मित | मुख्य आराध्य |
| कलश | १ ताम्र-कलश, जल-सहित | देवाह्वान |
| पञ्चामृत | दूध-दही-घृत-मधु-शर्करा | अभिषेक |
| पुष्प | चौदह कमल या तुलसी-दल | अर्चन |
| नैवेद्य | चौदह मोदक / पूरण-पोली | भोग |
| दीप | घृत-दीप, यथासंभव चौदह | आरती |
| दक्षिणा-द्रव्य | चौदह ब्राह्मणों हेतु | उद्यापन-दान |
⚠️सामान्य भूलें — क्या न करें
✗ अनन्त-सूत्र को प्रदोष-काल में अभिमन्त्रित करना
क्यों: यह व्रत मध्याह्न-व्यापिनी तिथि-प्रधान है; प्रदोष-काल में पूजा करने से शास्त्रोक्त फल की प्राप्ति नहीं होती।
✓ सही उपाय: मध्याह्न-काल (लगभग ११ बजे से १ बजे) में पूजा सम्पन्न कर सूत्र-धारण करें — यही अभिजित्-कालिक विष्णु-प्रिय मुहूर्त है।
✗ पुराने सूत्र को बिना विसर्जित किए नया धारण करना
क्यों: पूर्व-वर्ष के सूत्र को यथास्थान न रखकर सीधे फेंक देना अथवा घर में रख छोड़ना दोषावह माना गया है।
✓ सही उपाय: पुराने सूत्र को सादर उतारकर बहती नदी या पवित्र जलाशय में विसर्जित करें, तत्पश्चात् नूतन सूत्र अभिमन्त्रित कर धारण करें।
✗ केवल एक वर्ष व्रत करके छोड़ देना
क्यों: शास्त्रानुसार अनन्त-व्रत न्यूनतम चौदह वर्ष का संकल्प है; मध्य में त्यागने से व्रत-भंग-दोष लगता है।
✓ सही उपाय: प्रारम्भ में ही चौदह-वर्षीय अथवा जीवन-पर्यन्त संकल्प स्पष्ट करें; उद्यापन-कर्म चौदहवें वर्ष में अवश्य सम्पन्न करें।
✗ अनन्त-कथा-श्रवण के बिना केवल सूत्र-धारण
क्यों: कौण्डिन्य-सुशीला आख्यान का श्रवण व्रत का अनिवार्य अंग है; इसके बिना केवल सूत्र-धारण फलहीन कहा गया है।
✓ सही उपाय: पूजा के पश्चात् सपरिवार बैठकर भविष्योत्तर-पुराणोक्त अनन्त-व्रत-कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें।
✗ चतुर्दशी-तिथि न देखकर रविवार-शनिवार के अनुसार पर्व मनाना
क्यों: अनन्त-चतुर्दशी सूर्य-वार से नहीं, अपितु मात्र भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी से निर्धारित होती है।
✓ सही उपाय: पञ्चाङ्ग में मध्याह्न-व्यापिनी भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्दशी देखकर ही व्रत-तिथि सुनिश्चित करें।
📚स्रोत एवं सन्दर्भ-ग्रन्थ
इस लेख की सामग्री निम्नलिखित शास्त्रीय एवं आधुनिक प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित है। पाठक मूल-स्रोतों से स्वतन्त्र-सत्यापन कर सकते हैं।
- ▪भविष्योत्तर पुराण — अनन्तव्रत-कथा एवं अनन्तव्रत-माहात्म्य (उत्तर-पर्व, व्रत-दान प्रकरण); भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को कौण्डिन्य-सुशीला आख्यान एवं चतुर्दश-ग्रन्थि सूत्र-बन्धन विधि का मूल स्रोत।
- ▪अग्नि-पुराण — अध्याय 196 (नक्षत्र-व्रत प्रकरण), श्लोक 8–22: अनन्त-व्रत का विधान, मार्गशीर्ष-मृगशीर्ष-नक्षत्र-योग में भगवान् हरि (अनन्त-शेष-रूप) की पूजा तथा 'अनन्त-फल' प्राप्ति का वर्णन।
- ▪महाभारत — वन-पर्व (आरण्यक-पर्व) अन्तर्गत श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद: द्वादश-वर्षीय वनवास-काल में भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को राज्य-प्राप्ति एवं दुःख-नाश हेतु भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को अनन्त-व्रत के अनुष्ठान का उपदेश दिया।
- ▪हेमाद्रि-विरचित चतुर्वर्ग-चिन्तामणि — व्रत-खण्ड (खण्ड 2, भाग 1): स्मार्त-निबन्ध परम्परा में अनन्त-चतुर्दशी-व्रत का तिथि-निर्णय, पूजा-विधि, चतुर्दश-ग्रन्थि-सूत्र-धारण एवं उद्यापन-कल्प का प्रामाणिक संकलन।
- ▪भविष्य पुराण [संस्कृत संस्करण] — विस्डमलिब् द्वारा प्रकाशित मूल संस्कृत पाठ; उत्तर-पर्व में भाद्रपद-मास के व्रत-कथन के अन्तर्गत अनन्त-व्रत-कथा (कौण्डिन्य-आख्यान) एवं उद्यापन-विधि का विस्तृत वर्णन।
- ▪विकिपीडिया — 'अनन्त चतुर्दशी' लेख: भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को अनन्त-रूप (शेष-नाग) विष्णु की पूजा, गणेश-विसर्जन एवं जैन परम्परा में दशलक्षण-पर्व-समापन का संक्षिप्त आधुनिक संदर्भ।
✦ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अनन्त-चतुर्दशी पर गणेश-विसर्जन क्यों?▼
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश-चतुर्थी) से शुरू 10-दिन गणेश-स्थापना। 10वाँ-दिन = अनन्त-चतुर्दशी = विसर्जन।
सूत्र कितने दिन पहनें?▼
14 दिन न्यूनतम। आजीवन भी पहन सकते। टूट जाये तो उसी-दिन नया। बहती-नदी में पुराना-विसर्जन।
अनन्त-चतुर्दशी और गणेश-विसर्जन में क्या सम्बन्ध है?▼
दश-दिवसीय गणेशोत्सव भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से प्रारम्भ होकर शुक्ल चतुर्दशी अर्थात् अनन्त-चतुर्दशी को सम्पन्न होता है। इसी दिन गणपति-विसर्जन की परम्परा है। अनन्त-व्रत मुख्यतः मध्याह्न में और गणेश-विसर्जन उसके पश्चात् अपराह्न-सायं किया जाता है।
क्या अनन्त-सूत्र को स्नान के समय उतारना चाहिए?▼
नहीं, शास्त्रानुसार अनन्त-सूत्र को धारण करने के पश्चात् वर्ष-पर्यन्त अथवा अगले अनन्त-चतुर्दशी तक नहीं उतारा जाता। यदि स्वाभाविक रूप से टूट जाए या मलिन हो जाए तो जल में विसर्जित कर नूतन सूत्र पुनः अभिमन्त्रित कर धारण करने का विधान है।
स्त्रियाँ अनन्त-सूत्र किस भुजा में धारण करें?▼
शास्त्र-विधान के अनुसार पुरुष दक्षिण (दाहिनी) भुजा में और स्त्रियाँ वाम (बाँयीं) भुजा में अनन्त-सूत्र धारण करती हैं। कुछ क्षेत्रों में स्त्रियाँ इसे गले में भी धारण करती हैं, परन्तु बाहु-धारण ही मुख्य विधि मानी जाती है।
क्या अनन्त-चतुर्दशी का व्रत निर्जल रखना अनिवार्य है?▼
नहीं, यह व्रत निर्जल नहीं है। साधक प्रातःकाल से मध्याह्न-पूजन तक उपवास रखकर पूजा-पश्चात् फलाहार या एक-समय हविष्यान्न-भोजन ग्रहण कर सकते हैं। वृद्ध, रोगी, गर्भिणी और बालकों को यथा-शक्ति फलाहार की छूट है।
अनन्त-व्रत के देवता विष्णु हैं या शेषनाग?▼
मुख्य आराध्य भगवान् विष्णु ही हैं, परन्तु उनके 'अनन्त-शायी' अर्थात् क्षीर-सागर में शेषनाग पर शयन करते हुए स्वरूप की पूजा होती है। शेषनाग स्वयं भगवान् विष्णु की ही विभूति हैं, अतः दोनों अभिन्न रूप से पूजे जाते हैं।
यदि किसी वर्ष व्रत छूट जाए तो क्या करना चाहिए?▼
यदि अनिवार्य कारणवश व्रत छूट जाए तो अगले वर्ष द्विगुण-दान, द्विगुण-ब्राह्मण-भोजन और चौदह अतिरिक्त आहुतियों के होम से प्रायश्चित्त करना चाहिए। केवल आलस्य या प्रमाद से छोड़ने पर हेमाद्रि ने व्रत-भंग-दोष का स्पष्ट उल्लेख किया है।
🔗सम्बन्धित विषय
सूचना: यह सामग्री शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ हेतु प्रकाशित है। व्यक्तिगत धार्मिक/ज्योतिषीय निर्णयों के लिए कृपया योग्य पंडित अथवा ज्योतिषी से परामर्श लें।